यंगिस्तान

दूरदर्शन के दौर का इतवार

सितंबर 18, 2017 Girish Lohni

बात तब की है जब कुछ ना मिलने पर तागे में चप्पल बांद कर ही हवा में उड़ती पतंग को लंगड़ से चुनौती दी जाती थी. तब ख़ुशी कैसेट के दोनों साईड दस-दस गाने भर जाने के बाद एक और गाने की जगह बच जाने में मिल जाती थी. हैलीकाप्टर का मतलब भी तब पतंगे के पीछे तागा बाद दौड़ लगाने से था. इन सब के बीच कुछ घरों में सुंदर कड़ाई किये हुए कपड़े से ढका एक काला डब्बा हुआ करता था. किसी के घर में दहेज़ तो किसी के घर में धन-तेरस तो किसी के घर में ईद के मौके पर ख़रीदे जाने वाले इस काले डिब्बे का पूरा नाम था तो टेलीविजन पर हमारे लिए हमेशा टीवी ही रहा.

आज के लोगों के लिए महज एक सरकारी चैनल बन चुका दूरदर्शन तब भारतीय मौहल्ले को जोड़ कर रखने वाला एक चैनल हुआ करता था. दूरदर्शन ने भारतीय गली मौहल्ले के इतवार का रंग ही बदल दिया था. अंतिम समय तक गृहकार्य न करने वाले बच्चे शनिवार देर रात तक बैठ कर भी अपना काम पूरा करने लगे. सास के तानों से दिन की शुरुआत करने वाली बहुए तड़के जागकर सारा काम निपटाने लगी. बिस्तर पर सुबह की तीन चाय पीकर उठने वाले चचा सुबह ही गुसलखाने में दिख्नने लगे. दूरदर्शन ने भारत के इतवार का चित्र ही बदल दिया था.

इतवार की सुबह का मतलब था रंगोली से शुरुआत. सुबह सात बजे से पुराने गानों से शुरु होने वाली रंगोली नये गानों के साथ खत्म हुआ करती थी. फिर आता था चंद्रकांता का याक्कू-याक्कू करने वाला क्रूरसिंह. क्रूरसिंह हमारा निजी दुश्मन कब बन चुका था हमें खुद ही नहीं पता चला. फिर जंगल-जंगल चड्डी पहन-पहन कर एक जंगली बच्चा मोगली हमें अपने चातुर्य और सादगी से दीवाना बना जाता था. इस बीच टीवी पर हल्की सी झिलमिल ही हमारी साँसें बढ़ाने को काफी थी. इतवार के दिन टीवी पर पंद्रह मिनट की झिलमिल सरकार को सात लाख सात सौ पिच्चहत्तर गलियाँ दिला देने को काफी थी.

इस बीच जानकारी के तौर पर रेखा,जया और सुषमा की पसंद निरमा को बताया जाता तो घड़ी का विज्ञापनहमारी परम्परा के उलट एक व्यवहारिक सन्देश यह देता की पहले इस्तेमाल करे फिर विश्वास करें. आज अत्याधुनिक तकनीक के बावजूद कोई भी धार्मिक टीवी सीरियल भारतीय जानमानस पर वह अमिट छाप नहीं छोड़ पाया है जो तब के श्री कृष्णा, रामायण और जय हनुमान ने छोड़ी थी. इनमें रामायण व श्री कृष्णा अलग-अलग दौर के धारावाहिक हैं. सुबह की इनकी प्रस्तुति के बाद एक घंटा टीवी को आराम दिया जाता था. वो क्या है कि टीवी की एक प्रमुख सहायिका जिसका नाम स्टेपलाइजर हुआ करता था गर्म हो जाया करती थी.

इसके बाद अदभुत-अदम्य-साहस-की-परिभाषा वाले शक्तिमान का समय हो जाता था. तमराज किलविस का चेहरा तसल्ली से ना देख पाने का अफसोस आज भी कई दिलों को होगा. खैर इसके बाद घर के बच्चों को ब्लैकमेल किया जाता था. शाम चार बजे की फिल्म देखनी हो तो अब किताब खोलना अनिवार्य था. ख़ैर हम भी मन में याक्कू-याक्कू और स-स-स-शक्तिमान की धुन लिये शाम की फिल्म के इंतजार में बैठ जाते थे.

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