गंभीर अड्डा

फर्जी खबरों का मकडजाल और पत्रकारिता भाग 2

नवंबर 24, 2018 कमल पंत

एक उदाहरण के रूप में 2016 का एक केस बहुत लोकप्रिय है. जब एक वेबसाईट ने 2000 के नोट के अंदर चिप और ट्रेकिंग डिवाईस होने की बात अपनी साईट में पब्लिश कर दी,ये खबर इतनी पोपुलर हुई कि कुछ  नामी न्यूज चैनल ने इस पर एक घंटे का प्राईम टाईम शो भी बना डाला. नोटबंदी के चलते ज्यादातर डिजिटल आडियंस नोटबंदी से जुडी हर खबर पढने में इंटरेस्ट ले रही थी. नए नोट आने वाले थे मगर मार्केट में अभी आये नहीं थे.

एसे में गूगल में बार बार ‘नोटबंदी’ ,’नए नोट’,’न्यू करंसी‘ जैसे कीवर्ड चल रहे थे. वेबसाईटस हर नयी खबर को सबसे पहले अपनी साईट में पब्लिश करने को लेकर पागल हो रही थी .नैनो जीपीएस चिप को लेकर अचानक किसी वेबसाईट में एक खबर पब्लिश हुई . जिसके मुताबिक़ 2000 के नए नोटों में एक एसी चिप लगी है जिससे नोट को ट्रेक किया जा सकता है.देखते ही देखते सोशल मीडिया में ये खबर आग की तरह फ़ैल गयी. सब जगह इस नैनो जीपीएस चिप के चर्चे होने लगे थे. करीब सौ से ज्यादा वेबसाईट ने इसको लेकर ख़बरें पब्लिश की थी.और किसी ने भी एक छोटा सा क्रास चेक करने की जरूरत महसूस नही की.

आरबीआई की साईट में इस नैनो जीपीएस चिप का कोइ जिक्र नहीं था. मगर आरबीआई की साईट में क्रास चेक करने की किसी को फुर्सत नहीं थी.डिजिटल आडियंस को अपने से जोड़े रखने के लिए सभी कंटेट जनरेटर खबर को कापी या रिराईट करने में लगे हुए थे.

ये बस एक छोटा सा उदाहरण है जो बताता है कि किस तरह से ख़बरें फ़ैल रही हैं. इसके बहुत से उदाहरण और भी हैं,डिजिटल मीडिया के अंदर ये पता कर पाना कि खबर को किसने पहले प्रकाशित किया थोड़ा सा मुश्किल हो जाता है क्योंकि ख़बरें एक न्यूज पोर्टल से दुसरे न्यूज पोर्टल में आग की तरह कापी या रीराईट होती हैं.

जैसे ये 2000 के नोट की खबर को मेरी याद के अनुसार डीएनए ने या डीएलएफ नाम के पोर्टल ने पहले चलाया था 10 नवम्बर 2016 को. हालांकि अब लगभग सभी पोर्टल्स ने ये खबर अपने यहाँ से हटा ली है.मगर ये इतनी पोपुलर खबर थी कि अब भी सबके ध्यान में है.

हम अधिकतर ख़बरों को इग्नोर कर जाते हैं,जैसे 2017 में आया अम्बानी के बेटे का वो वेडिंग कार्ड, अन्तरिक्ष से ली गयी दिवाली के दिन की भारत की तस्वीर, प्रथम प्रधानमंत्री के सम्बन्ध में फ़ैली असंख्य ख़बरें, पाकिस्तान के सम्बन्ध में आयी ख़बरें,देश के अंदर जगह जगह हो रहे फर्जी घटनाक्रमों की ख़बरें. ये इतनी ज्यादा हैं कि हम अक्सर ध्यान देते ही नहीं कि न्यूज पोर्टल सही खबर दे रहे हैं या खबर.

हमारे व्हाटसप में आयी न्यूज हम पढकर इग्नोर कर देते हैं.जैसे आजकल महात्मा गांधी के सम्बन्ध में और भगत सिंह के सम्बन्ध में खबरें बनाकर न्यूज लिंक व्हाट्सप फेसबुक पर सर्कुलेट किये जा रहे हैं.इन खबरों में ज्यादातर में भगत सिंह को ना बचाए जाने को आधार बनाकर महात्मा गांधी को एक तुच्छ और बेकार आदमी घोषित किया जा रहा है.

जारी है …………………………………

नोट-लेख को डिजिटल मीडिया और फर्जी खबरों का बड़ता दायरा नाम के रिसर्च पेपर से लिया गया है.आगे और भी अंश प्रकाशित किये जायेंगे.

इस लेख के पिछले हिस्से को यहाँ देखें 

फर्जी खबरों का मकडजाल और पत्रकारिता

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