गंभीर अड्डा

फर्जी खबरों का मकडजाल और पत्रकारिता भाग 5

दिसंबर 5, 2018 कमल पंत

ख़बरों का क्या असर पड़ता है

हम मीडिया से जुड़े लोग भी कई बार असली और फर्जी खबर पहचानने में धोखा खा जाते हैं तो सोचिये उस आदमी का क्या होता होगा जो दिन भर किसी और काम में लगा रहता है बस खाली टाईम में एक झलक ख़बरों को देखता है. उसके पास जब एसी ख़बरें पहुंचेंगी तो वो क्या रिएक्ट करेगा. क्या वो असली फर्जी ख़बरें पहचान सकता है ? जबकि दस दस वेबसाईट उसे एकसी ख़बरें सुना रही हैं.

सस्ते इंटरनेट ने फर्जी ख़बरों के बाजार को बहुत बड़ा दिया है. भारत में फिलहाल डिजिटल जर्नलिज्म के लिए कोइ लाईसेंसिंग प्रणाली शुरू नहीं हुई है, वेबसाईट का नाम गो डैडी जैसी साईट में 99 रूपये में मिल जाता हैं. वर्ड प्रेस जैसी साईट वेबसाईट डिजाइन करने में पूरी पूरी मदद करते हैं और घर बैठे लोग आसानी से बीबीसी सरीखी वेबसाईट डिजाइन कर लेते हैं. इसे चलाने के लिए कुल जमा आठ से दस हजार का खर्चा भर आता है एक साल में. अगर कंटेंट आप बनाना जानते हों तो.

लेकिन ये सस्ते इंटरनेट ने आम आदमी के दिमाग में फर्जी ख़बरों की जंग लगा दी है. एक तरह जहाँ लोग एक काल्पनिक फर्जी दुनिया में जीने लगे हैं जहाँ कुछ भी संभव है,जहाँ कैलाश में हनुमान जी की लाईव फुटेज दिख जाती है,फोटोशाप से बनी हुई भारत की रोशन तस्वीर दिख जाती है.टोकियो के बिल्डिंग के नक्शे भारत के बनारस में दिख जाते हैं. वहीं दूसरी तरफ असली और सच्ची ख़बरों को जनता के सामने लाना बहुत मुश्किल होता जा रहा है.

इन ख़बरों से आम आदमी अपने इतिहास से तो भटकता ही जा रहा है साथ ही साथ व्हाट्सअप के फैलते दायरे ने इसको व्यापक स्तर पर फैला भी दिया है. पहले भले ही आम आदमी को अपने इतिहास की सही जानकारी नहीं रहती थी मगर जितनी भी जानकारी उसे अखबार या रेडियो से मिला करती थी कम से कम वो लगभग सही जानकारी होती थी. लेकिन डिजिटल फार्मेट में खबरों की सत्यता पर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है.कुछ नामी संस्थानों को छोड़ दें तो अधिकतर डिजिटल न्यूज वेब पोर्टल अभी तक पब्लिक का भरोसा ही नहीं जीत पाए हैं.(यहाँ जनता के भरोसे से मतलब है स्टेबलिशमेंट आफ न्यूज वेब पोर्टल)

निष्कर्ष

इस पूरी स्टडी के दौरान एक बात जो सामने आयी वह ये थी कि ख़बरों के फेक प्रूफ हो जाने के बाद अधिकतर बड़ी नामी न्यूज वेबसाईट इस खबर के लिंक को अपने पोर्टल से हटा लेती हैं,जैसे जी न्यूज के पोर्टल पर चली 2000 के नोट वाली खबर का न्यूज लिंक उसमे नहीं मिला,और ना ही किसी और वेबसाईट का लिंक मौजूद था,इसी तरह अधिकतर फेक न्यूज के न्यूज लिंक खबर की प्रमाणिकता के बाद सम्बन्धित संस्थान द्वारा हटा लिए गए. जेएनयू काण्ड के अधिकतर न्यूज लिंक सभी वेबसाईट ने अपने अपने पोर्टल से हटा लिए.अब वहां सिर्फ वही न्यूज लिंक हैं जिनमे जेएनयू प्रकरण की पुख्ता जानकारी है.ये न्यूज लिंक हटा लेने से सबंधित संस्थान फर्जी ख़बरों के मामले में बरी नहीं माना जा सकता.क्योंकि इनकी ख़बरों के कारण जनता के बीच जो गलत प्रचार उस निश्चित टाईम पीरियड में हो गया होता है उसके लिए आखिर किसी की तो जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए.

अख़लाक़ मामले के बाद लगातार बीफ बैन को सपोर्ट किया जाने लगा,देश भर में ट्विटर फेसबुक के माध्यम से अनेक टिप्पणी आयी और उन पर फर्जी ख़बरों के अम्बार लग गए.कहीं बताया गया कि बीफ काटने पर सजा ए मौत देगी सरकार तो कहीं बोला गया कि देश से अब पूरी तरह से बीफ हटा लिया जायेगा. जबकि सबको पता है आज भी कई राज्यों में बीफ मिलता है.इन न्यूज लिंक ने क्या किया?इन्होने जनता के बीच एक माहौल तैयार किया कि बीफ को पूरे देश में बैन किया जाना चाहिए,अपने मकसद में ये कितना कामयाब हुए ये तो पता नहीं लेकिन महीने दो महीने के अंदर सबने अपने अपने न्यूज लिंक हटा लिए.

अखबार अगर होता तो पुराने अखबार निकाल कर प्रमाण के रूप में पेश किया जाता मगर ये न्यूज वेब्साईट अपने न्यूज लिंक हटा लेती है जिन्हें आप बाद में नहीं ढूंढ सकते.प्रमाण के रूप में या तो स्क्रीन शाट रखिये या फिर भूल जाइए कि एसा भी कुछ हुआ था.

आज देश भर में सोशल मीडिया में इन फर्जी न्यूज लिंक की बाड़ सी आयी है. कोइ राजनैतिक पार्टियों के सोशल मीडिया विंग के लिए न्यूज लिंक बना रहा होता है तो कोइ खुद के व्यूज पाईंट बडाने के लिए इनको हवा दे रहा होता है.खबरों की प्रमाणिकता के लिए ये जिम्मेदारी नहीं लेते. रिफरेन्स के तौर पर ना तो किसी न्यूज एजेंसी का हवाला दिया जाता है और नाही किसी आफिसियल की बाईट ली जाती है.(कुछ केस में आफिसियल की फर्जी बाईट लिखी जरूर जाती है ). इसके कारण रीडर अब फर्जी खबरों पर ज्यादा भरोसा करने लग गए हैं.वैसे भी जनता की मेमोरी बहुत कम होती है.सुबह की घटना शाम को भूल जाती है तो इन न्यूज लिंक का ध्यान उन्हें क्यों रहेगा.मगर ये न्यूज लिंक जब लगातार ख़बरों से छेड़ छाड़ करके जनता को गुमराह कर रहे हो तब इन पर किसी न किसी तरह से नकेल कसा जाना जरूरी है.

नोट-लेख को ‘डिजिटल मीडिया और फर्जी खबरों का बड़ता दायरा’ नाम के रिसर्च पेपर से लिया गया है.

समाप्त

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