गंभीर अड्डा

फर्जी खबरों का मकडजाल और पत्रकारिता भाग 3

नवंबर 28, 2018 कमल पंत

अभी कुछ दिन पहले एक सरफिरे ने एक मुस्लिम व्यक्ति को मार डाला,और उसका वीडियो बनाकर बकायदा सोशल मीडिया में अपलोड भी किया,वो जैसे ही वाईरल होने लगा,संस्थानों में काम कर रहे हमारे कंटेंट जनरेटर मित्रों ने उसके सम्बन्ध में कुछ बहुत जानकारी उठायी और बाकी उसकी प्रोफाईल से देखकर एक खबर बना दी जिसके मुताबिक़ वो हिंदुत्व का रक्षक बताया गया. हालांकि कुछ जिम्मेदार न्यूज पोर्टल्स ने उसके बारे में पूरी जांच पड़ताल करके खबर डाली.मगर जांच पड़ताल में जो समय लगा उतने समय में वो व्यक्ति सोशल मीडिया हीरो बन चुका था.उसे बचाने के लिए फंड्स की मांग की जा रही थी चंदा जमा करवाया जा रहा था. उसके अच्छाई को साबित करने के लिए विभिन्न सोशल मीडिया साईट्स में उन वेबसाईट का रेफरेंस दिखाया जा रहा था जिन्होंने उसे हीरो साबित किया हुआ था. हालांकि बाद में कुछ जिम्मेदार पोर्टल्स ने अपनी जांच में ये पता लगा लिया था कि वह व्यक्ति एक महिला से सम्बन्ध रखता था और उन सम्बन्धों को छिपाने के लिए उसने उस व्यक्ति की हत्या की ,मामले को दूसरा रंग देने के लिए ये सब ड्रामा रचा गया.इसी तरह एक केस सिफूजी का भी है.

शिफूजी खुद को कमांडो ट्रेनर के रूप में पेश कर रहे थे,उनकी खुद की निजी वेबसाईट में उनका नाम कमांडो ट्रेनर के रूप में दर्ज था. शिफूजी यानी शौर्य भारद्वाज के वीडियो बहुत एग्रेसिव होते थे,इनके भडकाओ वीडिओ में अक्सर सेना की तारीफ़ और देश के बुरे हाल पर चर्चा रहती थी,बिलकुल एक उत्तेजित सेना कमांडर की तरह ये अपने वीडिओ में अपील करते पाए जाते थे, इनके वीडिओ उ=इतने पोपुलर होने लगे कि बहुत सारी न्यूज वेबसाईट ने इनके ऊपर फीचर स्टोरी कर डाली ,जिसकी सभी डीटेल इनकी निजी वेबसाईट से ली गयी थी. शिफूजी को एक आदर्श देशभक्त और देश का सच्चा हितैषी फ़ौजी के रूप में पेश किया जाने लगा. व्हाट्सप फेसबुक पर शिफूजी के वीडिओ वायरल होने लगे. न्यूज वेबसाईट ने इनकी तारीफों में इतनी कहानियां बना डाली कि खुद शिफूजी को नहीं पता कि कौन कौन से काण्ड उन्होंने खुद किये हैं. लाल बहादुर शास्त्री की नदी तैर कर स्कूल जाने वाली स्टोरी भी शिफूजी के नाम से प्रसारित होने लगी. फिर आज तक की वेबसाईट द लल्लन टाप के केतन बुकरेत ने शिफूजी की डीटेल स्टोरी पता कि और उसे अपने पोर्टल पर पब्लिश किया .जैसे ही पता चला कि शिफूजी फर्जी आदमी है उसकी ख़बरों के लिंक अचानक गायब होने लगे.और शिफूजी की खुद की वेबसाईट में भी उसके नाम के आगे से कमांडो ट्रेनर हटा लिया गया.

शिफूजी के बाद उपदेश राणा दीपक शर्मा जैसे बहुत से लोग सुपर हीरो बनने के चक्कर में सामने आये जिनकी फीचर स्टोरी न्यूज वेबसाईट में पब्लिश होने लगी,और आखिर में उनका हाल भी वही हुआ जो शिफूजी का हुआ .

इस तरह की दर्जनों ख़बरें रोज डिजिटल मीडिया परोसता है. एक उदाहरण के रूप में इसे समझिये मान लीजिये ये घटना है वर्ष 2016 की . उस दिन गूगल में सबसे ज्यादा सर्च किया जाने वाला शब्द था ‘यूनेस्को’. अब यूनेस्को अपने किसी कार्यक्रम या किसी अन्तराष्ट्रीय वजह से चर्चा में था जिसका भारत से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं था. लेकिन कंटेंट जनरेटर यूनेस्को शब्द को भुनाना चाहते थे,  ताकि उनकी वेबसाईट में व्यूवर की संख्या बड जाए तो उन्होंने एक खबर बना दी ‘यूनेस्को ने माना नरेंद्र मोदी हैं सर्वश्रेष्ठ’ अचानक एक पोर्टल में उठी ये खबर देखते ही देखते वायरल हो गयी. सोशल मीडिया में नरेंद्र मोदी की फेन फोलोइंग जबर्दस्त है इसलिए इस खबर को वायरल होने में बस कुछ मिनट लगे. अचानक गूगल में सर्च किया जाने वाला शब्द हो गया नरेंद्र मोदी. ज्यादातर पोर्टल फिर यूनेस्को छोड़कर मोदी पर खबर बनाने लगे. कई लोगों ने इस यूनेस्को ने माना वाली खबर को ही रीराईट कर दिया.तमाम व्हाट्सप ग्रुप सोशल मीडिया ग्रुप में यह खबर वाईरल हो गयी.

एसे ही एक खबर बनी थी कि यूनेस्को ने माना जन गन मन को सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रगान. ये एक सर्चिंग वर्ड के चक्कर में यूनेस्को ने भारत में न जाने किस किस चीज को नम्बर वन माना ये बस सोशल मीडिया ही बता सकता है. सोशल मीडिया में वायरल हो रही कई चीजें ख़बरें बना दी जाती हैं. जैसे पाकिस्तानी क्रिकेटर उमर अकमल की मौत की खबर सोशल मीडिया में इतना ज्यादा वाईरल हो गयी कि यहाँ डिजिटल मीडिया के कंटेंट जनरेटर ने उसे ही खबर बना डाला और घोषणा कर दी कि उमर अकमल नहीं रहे. हालांकि खबर पूरी तरह फर्जी थी.

जारी है …………………….

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फर्जी खबरों का मकडजाल और पत्रकारिता भाग 2

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