ओए न्यूज़

‘धरना’ लव

अक्टूबर 4, 2016 ओये बांगड़ू

फ़िरोज़ाबाद के वासी राहुल मिश्रा के साथ दिल्ली का जंतर मंतर कई यादों को समेटा हुआ है, जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने के दौरान हुए एक दिलचस्प किस्से को अपनी फिरोजाबादी भाषा में वो हमारे साथ शेयर कर रहे हैं-

मार्च- अप्रैल 2014 की बात है! बीजेपी जब जंतर-मंतर पर शोभायमान थी..हमाउं मीडिया के बहाए बयार में बहक के टीवी पर जा पहुँचे थे। उन दिन भूख ही हमाई प्रचंड कमजोरी होत रही, लेकिन तौउ सुबह सै उपवास जारी। घंटे-दर-घंटे फेसबुकिया हवाबाज़ी भी अपने चरम पै, मार फोटू और मार स्टैटस दहला के रखे थे अपई फेसबुकिया दीवार को। वो पगली जाई हवाबाज़ी पर इम्प्रेस हो गयी और बङका क्रांतिकारी समझ बैठी। शामें तब बङी हसीन होत थी। परिणाम जे कि हर शाम को उपवास कनॉट प्लेस में मैक्डोनाल्ड्स के आउटलेट पर बर्गर तोङते टूटन लागो। ऐसी ही एक हसीन शाम थी और बर्गर तोङती क्रांतिकारिता थी। फोन के स्क्रीन पर तभी एक अंजान नं फ्लैश होन लागो। मुँह में भरे बर्गर को जैसे-तैसे निगल फोन उठाओ। दस-बारह सेकेंड के फ़र्ज़ी हैलो-हैलो के बाद पहली बार उस पगली की आवाज़ कानन में उतरी और उतरी भी ऐसी की सीधे दिल में ज़गह कर गई।

बस यहीं से हमारे राह ने मोङ पकङा और ज़िंदगी का वो अध्याय शुरू हुआ जो अभीतक किसी को पढ़ाया नहीं गया।

जे वो दौर था जब ऑर्कुट चिरकूटियाने लगा था और थोक में लोग फेसबुक पर पलायन करने लगे थे। जाही दौर में फेसबुकिया मोहब्बत भी परवान चढ़ा। काली रातें चैट बाॅक्स में उजाला पात रही और नासमझी से समझ की ओर पलायन करते हम अपने पहले सच्चे प्यार को महसूस करन लगे। लेकिन एक बात तौ है कि मोहब्बतें अक्सरहां एकतरफ़ा हुआ करती हैं, खासकर तब जब हम जैसे बेहूदा दीवानगी की हदों तक पहुँच जावें। एकतरफ़ा कब दोतरफ़ा बन गई ना हमें मालूम पड़ो और ना बा पगली को।

दिल्ली के गर्मीन के दिन थे, फ़ोन पर तारीख़ फिक्स की गई। हम थे कि दीदार-ए-परान को बेताब और पगली आई मुँह पर नकाब बाँधे। धङकनें कब धौंकनी बनी, कब हम उसको मंत्रमुग्ध सा फाॅलो करने लगे, कुछ पता नहीं। होश तब आया जब पगली ने लताङते हुए बोला कि ऐसे किसी अंजान लङकी के पीछे आते शरम नहीं आती और होश भी ऐसा आया कि इगो हर्ट हो गया, परिणाम हम एक बीना शक्कर वाली चाय लगाकर के बाइक पर सवार और रूख कर दियो कालीबाडी रोड की ओर। जे बात वो मज़ाक में बोली कै सच में गरियाइ, पता नहीं। लगातार आते फोन को इग्नोरियाते और मन में भीष्म टाइप प्रतिज्ञा करते, घायल दिल लेके घर पहुँचे। पर वो का है न कि हमाउं हर मोहब्बत बङी शिद्दत से किए हैं, शाम को मौसम ठंढाते हुए फोन करके बतियाए और प्रपोज कर दिए।

मोहब्बतें सोचती ना हैं, हमने भी बङी शिद्दत वाली मोहब्बत करी..तो हम कैसे सोचते? पगली को हमारा प्रपोजल फैशनेबुल टाइप का महसूस हुआ, सो सिरे से हमको खारिज़ कर दिया गया। पर फेसबुक का चैटबाॅक्स एकाध दिन के अकाल के बाद फ़िर से गुलजार होन लागो और फोन पर भी बातें लम्बी होन लगी। मुलाकातों का, बेचैनियों का, आकर्षण का, दोतरफ़ा दौर धीरे-धीरे ही सही पर जोर पकङन लागो। मुलाकातें काॅफी हाऊस से, जंतर मंतर, कनॉट प्लेस, रेसकोर्स रिंगरोड होते हुए फ़िर लाजपत नगर पहुँची और वहाँ पहुँचत ही अंदर को गुबार ज्वालामुखी सा फटा और हमने धुआँ उङाके अपनों कलेजा निकाल रख दियो। अपने आदर्शपुरुष नेताजी सुभाष की क़सम, तुम हमें हमारी मिमि(नेताजी एमिली शैंकल को जाही नाम से पुकारा करते थे) लगत हो, अब जे बात तौ है भाई के पवित्रता अपना असर छोङ के रहती है और वैसेउँ हम उसके अंदर घर बना ही चुके थे, सो हम हैप्पिली कमिटेड हो गए।

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