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दिल्ली को दिल से अपनाना पड़ता है :विनोद

दिसंबर 22, 2018 कमल पंत

दिल्ली में बाहर से आकर बसने वालों की तादात दिल्ली में बचपन से रह रहे लोगों से ज्यादा है,यहाँ आकर यहाँ की लाईफस्टाईल में ढल जाना कोइ मामूली बात नहीं है , वह भी तब जब आप एसी जगह से आते हैं जहाँ एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए बस या ऑटो नहीं मिला करते, ऑटो और रिक्शे तो वहां चलन में ही नहीं हैं. अपनी जिन्दगी में पहली बार ऑटो और रिक्शे दिल्ली आकर देखने वाले विनोद पन्त के लिए ये एक दूसरी दुनिया थी. इस दूसरी दुनिया में खुद को एडजस्ट करना इसकी दौड के साथ खुद के कदमों को मिलाना अपने आप में एक बड़ा काम था.

उत्तराखंड के सुदूरवर्ती गाँव ग्वीर में पले बड़े विनोद ने दो दुनियाओं में एक साथ सरवाईव करना सीखा,पहली दुनिया उनका घर थी जहाँ आज भी रिक्शे और ऑटो चलन में नहीं हैं,कई कई किलोमीटर की यात्राएं पैदल करनी पड़ती हैं(पहाड़ों में लगभग सभी जगह यही हालात हैं,लोकल ट्रांसपोर्ट के नाम पर कुछ भी नहीं है). एसे ठेठ पहाडी गाँव से आने वाले विनोद को जब अपनी पढाई के बीच में ही दिल्ली आना पडा तो उन्होंने किस तरह से यहाँ के जीवन के साथ एडजस्ट किया वह अपने आप में एक प्रेरणाप्रद कहानी है.

वह बताते हैं कि पढाई में मन नहीं लगता था इसलिए ढंग से पढाई नहीं करी तो जिन्दगी को आगे बढ़ाने का एक ही विकल्प था ‘दिल्ली’. दिल्ली उस समय पहाड़ के सभी बेरोजगारों की जन्न्नत हुआ करती थी. दिल्ली शब्द सुनते ही एसा लगता था मानो नौकरी पक्की. लेकिन दिल्ली थी क्या ये अभी भी दूर के ढोल ही थे.जब पहली बार दिल्ली आया तो देखा कि हर जगह ऑटो,टेक्सी,रिक्शा,बस की भीड़ है. पहले के तीन साधन थोड़े महंगे होते थे मगर बस अपने बजट में थी.लेकिन उसके लिये बस का सही नम्बर पता होना बेहद जरूरी था. अब कौनसी बस किधर जायेगी ये पता करना भी एक बड़ा काम था और उस नम्बर को हमेशा के लिए याद कर लेना उससे भी बड़ा काम,क्योंकि कभी भी कहीं भी जाना पड़ सकता था.

यहाँ आते ही सबसे पहले धीरे धीरे सभी टूरिस्ट प्लेस में घूमना शुरू किया,वहां के रस्ते में पड़ने वाली  सभी जगह याद करने की कोशिश करने लगे,पहले घर पहुँचने के लिए कौनसी बस में बैठना है यह याद किया,कहाँ उतरना है,कहाँ से बस बदलनी है किस तरह बस बदलनी है इन सभी में अच्छा खासा समय लगा मगर धीरे धीरे यह हालात हो गयी थी कि पहाड़ से आने वाला कोइ भी आदमी मुझसे ही पूछता था कि फलां जगह जाने के लिए कौनसी बस नम्बर कहाँ से मिलेगी. यह दिल्ली आने की पहली जीत थी,एसा लगता था कि अब दिल्ली आसानी से अपना लेगी.

लेकिन ये तो बस एक शुरुवात भर थी,असल मुश्किलें तो अब आनी थी,बाकी लोग जहाँ इस दिल्ली में अपनी पढाई पूरी करने कोइ एडिशनल ट्रेनिंग लेकर आते थे वहीं मैं सिर्फ हाईस्कूल करके यहाँ पहुँच गया था,हालाँकि बाद में ग्रेजुएशन तक की पढाई धीरे धीरे कर ली,मगर किसी जगह पर काम पाने की बेसिक रिक्वायरमेंट से मैं कोसों दूर था. अपने आप में ये एक बड़ा टास्क था कि किसी कम्पनी में नौकरी करना शुरू कर लूं. नौकरी मिली भी,दिल्ली में सबके लिए कुछ न कुछ रोजगार है और मैंने यहाँ दस से ज्यादा अलग अलग तरह की कम्पनियों में काम किया है और वह भी अलग अलग तरह का. उस समय बहुत ज्यादा चलन में रही फेक्स मशीन से लेकर,शेयर मार्किट,इम्पोर्ट एक्सपोर्ट,सीबीएसई जैसी बड़ी सरकारी संस्था और फोटोस्टेट मशीन तक अलग अलाग तरह की कम्नियों में काम करने का अछा अनुभव प्राप्त किया. इतनी सारी जगह काम करने का फायदा यह हुआ कि हर बार नयी कम्पनी में पुराने के अनुभव को तवज्जो मिली.

दिल्ली में सरवाईव करना तब तक मुश्किल है जब तक आप दिल्ली को अपना नहीं मान लेते,जैसे ही आप दिल्ली को अपना मान लेते हैं तो दिल्ली भी आपको खुली बांहों से अपना लेती है.

सिनेमाहाल मैंने पहली बार दिल्ली में देखे और उसके बाद दिल्ली का शायद ही कोइ सिनेमा हाल बचा होगा जहाँ मैंने फिल्म न देखी हो,हर छुट्टी पर किसी न किसी सिनेमा हाल में फिल्म देखने पहुँच जाया करता था.

विनोद जी ने दिल्ली को जिस तरह से अपनाया उसी तरह से दिल्ली को आप लोगों ने भी अपनाया होगा,आपकी भी अपनी कोइ कहानी रही होगी,अपनी अपनी कहानियां हमारे साथ शेयर करने के लिए हमारी मेल आईडी या हमारे व्हाटस्प नम्बर पर हमसे कान्टेक्ट कर सकते हैं .

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