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दिल्ली को दिल्ली रहने दें

मार्च 7, 2017 Girish Lohni

दिल्ली वालों को ढेरों बधाई। अंततः उनके मुख्यमंत्री की याददाश्त वापस लौट आयी है । मोदीजी का प्रभाव भारत में दिखा न दिखा चर्चा का विषय हो सकता है पर मोदीजी का प्रभाव केजरीवाल पर कितना पड़ा सभी के सामने है। बीते साल में केजरीवाल की खासी से लेकर उनके पेट की गैस तक का एक मात्र कारण मोदीजी रहे हैं। जितना समय मोदीजी का नाम जपने में बर्बाद किया है उसका एक तिहाई भी दिल्ली का लिया होता तो सच में आज दिल्ली लन्दन बन गयी होती। और शायद आज चर्चा का विषय ये होता कि एमसीडी वालों का वेतन पाउंड मे दिया जाय या रुपये में दिया जाय। वैसे लन्दन वाले स्टेटमेंट से लगता है कि साहब का हैंग ओवर उतरने में अभी समय लगेगा। विवादों को अपनी पहली पत्नी बना चुके केजरीवाल से एक समय उम्मीद की जाती थी कि वे भारतीय राजनीति में एक नयी राजनीति की शुरुआत करेंगे लेकिन आज के दिन उनमें और लालू प्रसाद में बस मोटापे का अंतर रह गया है वो भी जल्द खत्म होने को है।
दो साल पूरे कर चुकी सरकार के पास आज उपलब्धि से ज्यादा विवाद अधिक हैं। जैसे किसी सरकारी विज्ञापन में महिला को घर का काम करते दिखाने पर महिला सशक्तिकरण पर एक जोरदार बहस छिड जाना, किसी अन्य देश के राष्ट्रपति से हवाई चप्पल पहन कर चल देना, बालीवुड की फिल्मों का मुख्यमंत्री द्वारा रिव्यू देना, इतने भ्रष्ट अफसर पकड लेना की घोषणा करना और जेल में अपनी पार्टियों के नेता का घुसना आदि आदि। अच्छा, आप पार्टी का घोषणा पत्र पकड इनसे पूछ लो की सर इस वादे का क्या हुआ एक घीसा पिटा जवाब होता है “एल.जी.साहब के आफिस में है।” एल.जी ना हुए टीवी सीरियल की अम्माजी टाईप की सास हो गयी हर काम पर साजिश कर देती है।पहले दिल्ली वालों को जानकारी थी कि दिल्ली का एक एल.जी.होता है “आप” ने एहसास दिला दिया कि दिल्ली में बस एक एल.जी.होता है। दो सालों में दिल्ली सरकार का एक भी ऐसा काम नहीं है जो विवादों में न रहा हो जैसे सरकार का काम योजना की घोषणा करना नहीं विवाद की घोषणा हो।
नायक फिल्म का क्लाइमेक्स सीन याद है ना कैसे अनिल कपूर राजनीति खेल अमरीश पूरी को गोलियों से भूना देता है निश्चित ही अगर इस फिल्म का अगला भाग बनता तो पहले भाग का नायक अगले भाग में खलनायक होता।
खैर फिल्हाल दिल्ली वाले मुख्यमंत्री से एकमात्र निवेदन ये है कि दिल्ली को दिल्ली रहने दें। लन्दन बन जाने से भारत के दिल में जाने का भी वीजा लगेगा, अंग्रेजी बोलने का डर ब्लडप्रेशर बडा कर रखेगा, संसद में वैसे ही शोर करने का इतना पैसा एमपी लेते हैं फिर लंदन से प्रसारण का खर्च पाउंड में उठाने की औकात हमारी नहीं,फिर आज कल बैंक वालो का भी कोई भरोसा नहीं कब खाते की न्यूनतम राशि पाउंड में कर दे। तुम तो अपनी अम्मा सास को बुरा-भला कहकर पॉपकॉर्न चट लोगे। फस जायेगी जनता।

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