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आंदोलन वान्दोलन की दिल्ली में कोई जगह नहीं

अक्टूबर 3, 2018 ओये बांगड़ू

देखो आंदोलन वान्दोलन करने हों कहीं और जाओ। विरोध की दिल्ली में कोई जगह नही है। जंतर मंतर गुजरे जमाने की बात है।

तब लोकतंत्र जिंदा है इसका आभास रोज होता था, सबसे पिछड़े आदमी को अपनी बात रखने का हक है इसका आभास जंतर मंतर देता था। एक् पागल सा बुड्ढा जंतर मंतर में दो कागज लेकर बैठ जाता था और कहता था मुझे मेरे गांव में आश्रम बनाना है, पीएम को बताओ। और एलआईयू सीआईडी के लोग रोज उसकी रिपोर्ट मंत्रालय भेजते थे। वो बुड्ढा जो खाना बंगला साहब से खाता था और नहाना पब्लिक टैंक से, उसकी बात भी सरकार का बाशिंदा रोज सुनता था क्योंकि वह भारत का लोक था जिससे लोकतंत्र है।

जंतर मंतर पर पत्रकार रोजाना कई मामलों को इग्नोर करके आगे बढ़ जाते थे मगर वह सरकार का बाशिंदा हर व्यक्ति की रिपोर्ट मंत्रालय को भेजता था, उनकी मांगें कहीं सुनी जा रही हैं ऐसा झूठा ही सही मगर विश्वास दिलाता था।

मैंने जंतर मंतर में 8 साल बिताए हैं। रोजाना कई लोग अजीब अजीब मांग लेकर पहुंच जाते थे, और सरकार का आदमी उन्हें नोट करता था, ये वह भी जानता था कि मांग पूरी नही होगी, मगर सिर्फ लोकतंत्र के विश्वास को बनाये रखने के लिए सबकी बातें नोट करके रिपोर्ट आगे भेजना उसकी ड्यूटी थी।

आंदोलनकारी महीनों सालों बैठकर अपनी असली मांग ही भूल जाया करते थे, कई पागल हो गए, कई डिप्रेशन में चले गए।मगर फिर भी उस अवस्था मे भी उनकी बातें एक आंदोलनकारी के रूप में नोट की गई।अनशन करने वालों का हेल्थ चेकअप सरकार कराती थी इससे पता लगता था कि कि सरकार की नजर में उस एक आदमी की भी वेल्यू है।

आज कहीं ऐसा नजर नही आता।

कोई एक जगह बता दो जहां उस पागल डिप्रेशन में गए आदमी की बात नोट करने वाला सरकार का बाशिंदा बैठा हो ? पुलिस कहती हट पागल साले, ये भी कोई मांग हुई गांव में आश्रम बनवा दो । सरकार क्यों सुनेगी बे तेरी।

जंतर मंतर के खत्म होने से सच मे मुझे एहसास हुआ है कि सरकार तक बात पहुंचाने का एक रास्ता बंद हुआ है। या गरीबो और खुद की लड़ाई लड़ रहे सिंगल लोगों का इकलौता रास्ता बंद हुआ है।

नोट– कोर्ट ने भले ही आदेश दे दिए हैं मगर आज भी जंतर मंतर पर प्रदर्शन नही होते उसके बैकसाइड में सिर्फ सामूहिक बडी बडी भीड़ वाली रैली होती है।

 

 

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