यंगिस्तान

डियर X- गर्लफ्रेंड पार्ट-2

अक्टूबर 15, 2017 Girish Lohni

डियर X- गर्लफ्रेंड

तुम्हारा जवाब पढ़ा. पढ़कर वही फिलिंग आयी जो दूध में अंडा और चीनी डाल तुम्हारे हाथों के बने ब्रैड के विदेशी ब्रेक-फास्ट को खा कर आयी थी. कच्चा कड़वा और बदबूदार. लेकिन मैंने उतने ही चाव और खुशी से उसे पढ़ा जितने चाव और ख़ुशी से मैंने उस विदेशी ब्रेकफास्ट को खाया था.

ख़ैर शुरुआत जादूगर से करूँगा. मुझे तुमसे बेहतर और कौन जान सकता है. मेरी बन-टिक्की मैक-आलू-टिक्की में बदल गयी, दो मिनट में बनने वाली मेरी मैगी घंटो में बनने वाले वाईट-सौस पास्ता में बदल गया, मेरा भुजा हुआ अलुआ फ्रेंच-फ्राईस में बदल गया, मंडी के कटे प्याज-टमाटर का सलाद सब-वे का चौपड-कुकुम्मर-ग्रीन-टमेटो-पी सेलेड विद वाईट बेस मियोनी बन गया, ओल्ड-मोंक का पानी संग प्लास्टिक के ग्लास में बनने वाला मेरा पैग कांच के मौटे ग्लासों में कैन-बेरी संग वाईट-रम के पैग में बदल गया, आयोडीन नमक में बना मेरा अंडे और प्याज का मेरा चकना क्रन्ची-पीनट विद चिकन लालीपाप बन गया. ये सब जादू नहीं तो और क्या है? बांकि जादूगर कौन हुआ अब तय तुम करो.

जिम्मेदारी निभाने में मैं बड़ा गैर-जिम्मेदार आदमी हूँ. देखो ना रात के ग्यारह बजे कौन जिम्मेदार इंसान लड़की संग इण्डिया गेट घुमने का प्लान बनाता है, वो भी ऑटो से. कौन जिम्मेदार आदमी दिल्ली की सड़कों पर रात के एक बजे लड़की को पराठे खिलाने ले जाता है, वो भी पैदल. तुम्हें तो मेरी इन सब गैर-जिम्मेदारियों से प्यार था उतना ही जितना मुझे तुम्हारे आजाद रहने के ख्याल से है.

जानती हो क्यों तुम प्यार तो कर सकती हो लेकिन रिश्ता नहीं बना सकती क्योंकि प्यार करने से पहले तुमने किसी ने नहीं पूछा था. रिश्ता बनाने के लिए तुम्हें हर किसी की हामी चाहिये. प्यार करने से तुम खुश थी. रिश्ता बनाकर तुम हर किसी को खुश रखना चाहती हो. प्यार आजाद है जिसे रिश्ते के पंखो की जरूरत है, रिश्ते की जंजीर मंजूर नहीं.

छ बाई आठ के कमरे की दीवार में खिड़की बनाने वाली तुम, कमरे के धुए को हटाने वाली तुम, जंगली को इंसान बनाने वाली तुम, तो अब चौराहों पर दीवार बनाने के लिए पूछती क्यों हो. तुम्हारा चौराहा तुम्हारी दीवार फिर डर किस बात का? जिन नजरों को तुम्हारी आजादी ही सबसे प्यारी है वो कैसे तुम्हे कैद कर पायेंगी. मेरी मानो तो दीवार ऊँची और मोटी बनाना क्योंकि यादें दीवारों की मौहताज नहीं.

बाकि बस एक शिकायत ये है कि मैं अपने आपको अभी आशिकों की केटेगरी मे रख नहीं पाउँगा. ना मुझमे डर के शारुख जैसी हक्क्ल्लाहट छायी है ना ही धड़कन के सुनील शेट्टी सी जवानी. रान्झाना और तेरे नाम जैसे अखण्ड चूतियापे से तो अभी कोसो दूर हूँ. हाँ चाहो तो मुझे जंगली कह सकती हो जिसे तुम्हारे सभ्य समाज की समझ नहीं है.

काश की तुम्हारा समाज थोडा असभ्य होता, थोड़ा गैर-जिम्मेदार होता तो किसी को फर्क नहीं पड़ता कि लड़का काम पर जाता है या लड़की, किसी को फर्क नहीं पड़ता की लड़की लड़के से ज्यादा कमा लेती है, किसी को फर्क नहीं पड़ता कि लड़की की उम्र लड़के से ज्यादा है, किसी को फर्क नहीं पड़ता कि लड़का हिन्दू और लड़की मुस्लिम.

बांकि अच्छा आप भी खेल लेती हैं तालिया बजती रहनी चाहिये.

तुम्हारा

Xबॉयफ्रेंड

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *