ओए न्यूज़

दाल भात और बंदर

जून 13, 2017 ओये बांगड़ू

विनोद पन्त का लिखा ये व्यंग्य ठेठ हिन्दी पहाडी में लिखा गया है, इसके शब्दों के साथ अगर हिन्दी अर्थ डाले जाते तो वह भाव नहीं आ पाते जो वह असल में पहाडी में हैं .इसलिए इसे एसे ही रहने दिया गया है..हां इच्छुक लोगों को शब्दों का अर्थ बताया जायेगा, बस कमेन्ट बाक्स में पूछ डालें

व्यंगकार विनोद पन्त

जैसे सारे मनुष्य भगवान राम नहीं हो सकते वैसे ही सारे बानर भी हनुमान नहीं हो सकते . सतयुग त्रेता तक तो मान लो और हमारे आम् बुबू के जमाने तक के भी मान लो पर आजकल ..?? ना हो कतई नहीं . ज्यूनै राक्षस ठैरे . अब पिछले दिनों घर गया था . जमन सिंह के नाती का नामकरण था . न्यूत ठैरा तो मानना ही हुवा . दोपहर का खाना था तो रत्तैब्याण(सुबह सुबह) से चाहा तोप(चाय ) के अलावा कुछ भी नहीं खाया पिया था . जमन सिंह ने कहा था गुरू बारेक बजे तक आना . जैसे ही बार बजे होंगे पेट में चूहें साँक का जैसा टुटाट मारने लग गये . जाने की तैयारी की तो घरवाई ने कहा कि – ऐसे ही जाओगे क्या ?
मैने कहा कि – आब भात खाने के लिए दिन बार और पैट अपैट दिखवा के जाऊं क्या ?
स्यैणी ने बनढडुवा के जैसे आंख तांण के कहा – बामण हो बामण .. धोती क टाल पैरौ .
अचानक याद आया,ओहो मैं तो बामण ठैरा . बिना धोती भात कैसे खाऊंगा ? शहर में अलग बात ठैरी . कौन पहचानता है . यहां तो होटल में भी खा लो . पर गाँव में तो टटम करने ही ठैरे .
स्यैणी अन्दर से एक धोती लेकर आई . धोती भी गजब हो रही थी . जगह जगह से कांट जैसे लगे ठैरे . बक्से से एक दो जगह जंग लग कर रंगाई पिछौड जैसा डिजायन बना ठैरा . मैं तो मांची गया घरवाई के लिए . कैसे पहनू ये धोती . हयून जैसी लग रही है .
स्यैणी ने कहा – मच्याट पित्याट क्यों करते हो ? अभी धोकर घाम डाल देती हूं . जेठा म्हैण के घाम हुए . पनर मिनट में सूख जाऐगी .
स्यैणी ने धोती धोकर माल भीड के कनाव में डाल दी . मैं तब तक भ्यैरपन पेट च्याप कर घूमने लगा .
पन्द्रह मिनट बाद देखा तो कनाव से धोती गायब ठैरी . माल भीड के इचाव – कनाव . सब देख लिया पर धोती ठैरी कि मिलने का नाम नहीं .
भूख से बिडौव हो रहे ठैरे . मैने पूरे परिवार को धोती ढूंढने में लगा दिया .बीच बीच में बेचारी घरवाई को भी मैक्या रहा था . होश फाम नहीं रहता तेरे को . अल्ले अल्ले यहीं थी . आब गायब कैसे हो गयी . कहीं मैत तो नहीं पहुंचा दी तूने अपने बाबू के पास .
घरवाई . च्योल चेलि सब धोती ढूढ रहे थे . जब बस नहीं चला तो मैने अपने आसपास के सभी पंचनाम देवों को धात लगानी शुरू कर दी . हे भगवान हे परेमेश्वरौ . हे नैलिंग हे बन्जैणा . हे गोल्ज्यू . हे धौलिनाग . हे फेणिनाग . हे सैम ज्यू … अगर मेरि धोति मिलि जालि तो तुमार थान में ऐबेर एक धोति चढून . सभी देवी देवताओं को कुल मिलाकर मैं बीस बाईस धोती चढाने का प्रण कर चुका था . जेब से पांच सौ रुपये निकालकर उचैण भी धर दिया .
इधर दो बजने को आगये पर मेरी धोती ..
एक बार मन में आया आफि बज्जर पडती है धोती ऐसे ही खाकर आ जाता हूं . कह दूंगा अभी मेरा ब्रतबन्द नहीं हुवा है . फिर याद आया दगाड में मेरा च्योल भी होगा पकडा जाऊंगा . फिर मैं बामण भी ठैरा . ठाकुर लोग क्या कहेंगे . लग रहा था सारे बामणों की इज्जत आज मेरे हाथ ही है . जैसे सभी बामणों का प्रतिनिधित्व मैं ही कर रहा हूं .
घरवाली और नानतिन थक हारकर भीतर चले गये . मेरा आधा मनचित धोती मैं और आधा जमनसिंह के यहां दाल भात में गया था . भूख के मारे पेट उड्यार जैसा हो गया . और ख्वार में रिंगै जैसी लग गयी . सोचा बजर ठसके आज का दिन रत्तै ब्याण किसका मूख देखा होगा .
थक हार कर घर के पास के दिल्ली वाले फगीरू का के बांज गाड के कुंच में चीड के पेड के नीचे आराम करने चला गया .
जैसे ही चीड के पेड के नीचे उतांड होकर सुस्ताने लगा तो देखा कि चीड के पेड के टुक में चार पांच बानर मेरी धोती को एक पेड से दूसरे पेड के बीच धारचूला के काली नदी के जैसा पुल बनाकर अँगाईजित्ती खेल रहे थे . बीच में बानरों के नानतिन धोती से लटक कर खेल रहे थे . धोती मैं बानरों ने जगह जगह इतने छेद कर दिये थे कि लग रहा था मिलट्री वालों ने मेरी धोती पर चाँदमारी की प्रैक्टिस कर रखी है .
मैने पेड के जड से ही बानरों को हट हुट करके ढुग्याने की कोशिस की तो एक दो भिसूण जैसे बानर मेरे ख्यादन पड गये . मैं वहां से ख्वार में खुट धरके सीधा घर की तरफ भागा .
जमन सिंह के यहां की दाल भात का न्यूत बानरों की शरण चला गया .

2 thoughts on “दाल भात और बंदर”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *