गंभीर अड्डा

चुनाव से पहले नया शब्द वापस आ गया ‘राजद्रोह’

जनवरी 19, 2019 कमल पंत

9 जनवरी 2016 को जवाहर लाल नेहरू विश्वविधालय अचानक से चर्चा में आ गया,कारण ये बताया गया कि वहां कुछ छात्रों ने हिन्दुस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाए.मामला अचानक सुपर डूपर हिट हो गया और टीवी न्यूज चैनल अखबार इसकी बहसों से भर गए.समय के साथ मामला ठंडा भी हो गया लेकिन जेएनयू की इमेज पर सवाल उठाना शुरू हो गया.आज तीन साल बाद आम चुनाव से कुछ महीने पहले अचानक फिर ये मामला सुर्ख़ियों में आने को लालयित है.कारण यह कि दिल्ली पुलिस की जांच अचानक पूरी हो गयी और उसने बिना दिल्ली सरकार के लीगल डिपार्टमेंट से अनुमति लिए चार्जशीट को कोर्ट में दाखिल कर दिया.बाकायदा मीडिया में इस बात के चर्चे शुरू हो गए कि जेएनयू में नारे लगे थे.पुलिस के पास सबूत हैं.

खैर अचानक आम चुनाव से पहले तीन साल में पूरी हुई यह जांच अपने आप में संदेहास्पद है,क्योंकि ये रेगुलर कार्रवाई कम और पोलिटिकल मकसद से खेली गयी साजिश ज्यादा लग रही है,क्योंकि मुख्य आरोपी बनाया गया कन्हैया कुमार खुद बेगुसराय से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है,और पिछले तीन साल में उसने युवाओं और आम सभाओं में जाकर भाजपा की नीतियों की खूब आलोचना भी की है.छात्र राजनीती से मुख्य राजनीती में कदम रखने जा रहे है कन्हैया से वैसे तो भाजपा को कोइ खतरा नहीं है मगर शायद वह दूसरा केजरीवाल पैदा नहीं करना चाहते.समय रहते कार्रवाई कर उसे दबा देना सही है.

वैसे कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को उसकी इस हडबडी पर फटकार लगा दी है और कहा है कि जाकर पहले दिल्ली सरकार से परमिशन लेकर आओ,वह क्या है कि एसे देशद्रोह वाले मामलों में सरकार की इजाजत जरूरी होती है.

इस चार्जशीट को कई नजरों से देखा जा सकता है,इसमें जो सबूत बताये जा रहे हैं वह पहले दिन से मौजूद हैं,लगभग हर भारतीय के मोबाईल में वह देशद्रोही नारे वाले विडिओ नजर आ जायेंगे लेकिन उनकी जांच में लगा तीन साल का समय अपने आप में  एक प्रश्न छोड़ता है,कि जब सबूत पहले से मौजूद थे तो चार्जशीट में समय क्यों लगा ? चलो मान लिया तसल्ली से चार्जशीट बनाई,तसल्ली से जांच की,मगर क्या दिल्ली पुलिस को चार्जशीट दाखिल करने की हडबडी थी ? परमिशन क्यों नहीं ली गयी.क्या ‘राम मन्दिर’ और ‘गाय’के फेल हो जाने पर ‘देशद्रोह’ को ट्रेंड करवाकर कोइ राजनितिक फायदे के लिए इसे दोबारा शुरू किया.

अंत में हम भारतीय बात बात में अमेरिका और यूरोप को कापी करने की कोशिश करते हैं,मोबाईल से लेकर कपड़ों तक हम वहां के फैशन की देखा देखी अपने फैशन को सेट करते हैं,उनके देश का झंडा वह कमर से नीचे भी इस्तेमाल करते हैं मगर हमने अपने राष्ट्रीय प्रतीकों की एसे अपमान पर सजा मुकर्रर कर रखी है.वह अपने देश को डाउन डाउन बोल देते हैं कुछ गलत होने पर मगर हमें डाउन डाउन या मुर्दाबाद बोलना सख्त मना है क्योंकि इससे हमारी देशभक्ति खतरे में पड़ जाती है.

क्या सिर्फ प्रतीकों या शब्दों से देशभक्ति दिखाई जाती है?भावना क्या सिर्फ बोलकर व्यक्त होती है,डाउन डाउन अमेरिका बोलने वाले जब अपनी संसद में देशभक्ति पर अश्रुपूर्ण भाषण देते हैं तो उन्हें उतनी ही वाह वाही मिलती है,उनसे उनके डाउन डाउन कहने का कारण पूछा जाता है और उस कारण को सुधारकर देश के प्रति उनके सम्मान में इजाफा करवाया जाता है,एक बार डाउन डाउन बोलने वाला दोबारा नही बोलता क्योंकि उसे प्राब्लम से दोबारा दो चार नहीं होना पड़ता,देश के प्रति रिस्पेक्ट बड जाती है.मगर हमारे यहाँ………………………………………जेल ,पोलिटिकल स्टंट ,बस.

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