यंगिस्तान

पुस्तक समीक्षा – चालीसा का रहस्य

अगस्त 14, 2017 ओये बांगड़ू

सहर करीब दस साल से पढ़ने और लिखने के शौक को काम की तरह करते हैं। तीन साल से अपना ब्लॉग लिख रहे हैं। खुद को अति-प्रैक्टिकल मानते हैं इसलिए इनकी कहानियों में भी प्रैक्टिकल ज्ञान साफ़ झलकता है। फ़िलहाल, प्राइवेट कंपनी में एडमिनिस्ट्रेटर हैं और अपने घर में राइटर। कहानियां लिखते हैं, गज़लें लिखते थे, अब इन दिनों उपन्यास लिख रहे हैं। आगे क्या लिखेंगे इसका क़तई कोई ज्ञान नहीं पर लिखते रहेंगे,इसका भरोसा है।

लेखक सिद्धार्थ अरोड़ा ‘सहर’

 

“सिगरेट पिएगा?” राजू ने तब पूछा जब सिगरेट का सफ़ेद वाला हिस्सा पीले वाले हिस्से को छूने के लिए कब्बडी खेल रहा था। वो मुझे अपने ऑफिस से मेट्रो स्टेशन तक छोड़ने आया था। रास्ते में भूख लग आई थी।

ज़ाहिर तौर पर मैंने न में सिर हिलाया, “इसमें बचा भी क्या था”

“बचा होता तो तू पीता?” राजू ने दूसरी सिगरेट निकाल ली।

मैंने फिर न में सिर हिलाया “आज सीक्रेट ऑफ़ चालीसा पढ़ी! सिगरेट छोड़कर इसपर कुछ चर्चा करें?”

“क्यों नहीं, शुरू कर!” राजू ने आदतन बात शुरू करने से पहले मोबाइल को जेब में डाल लिया और मैंने आदतन अपना मोबाइल जेब से बाहर निकाल लिया।

“कहानी से शुरू करता हूँ। कहानी सस्पेंस थ्रिलर के घिसे-पिटे रूल से ज़रा हट के है” मैंने मोबाइल में बुक खोलते हुए कहा।

“वैरी गुड, आगे!”

“यूँ तो कहानी का मुख्य पात्र एक स्टूडेंट को दर्शाया गया है; कहानी उसके इर्द-गिर्द चलती है पर कहानी की लीड करैक्टर डॉक्टर अंजना ही हैं! सबसे अच्छी बात ये कि कहानी शुरू ही थ्रिल के साथ होती है। और अगर मैं आधे पेज में सिर्फ और सिर्फ मूल कहानी को लिखूं तो एक डॉक्टर हैं, जिसकी रिसर्च कैंसर जैसी बिमारी का इलाज है; जिसमें हनुमान चालीसा के चालीस छंद सहायता करते हैं। जिसमें कुछ लोग उस फोर्मुले को चुरा कर उससे पैसे बनाना चाहते है। लेकिन कहानी इतनी सरल नहीं है, इससे कहीं आगे है।”

“तूने सही कहा” राजू ने सिगरेट का आखिरी कश लिया और उसे फेंकते हुए बोला “साथ ही जिस तरीके से रामायण के सारे पात्रों को शरीर के विभिन्न हिस्से से रीलेट किया गया है वह वाकई काबिल-ए-तारीफ है”

मैंने चिकन मोमोज़ वाले को इशारे से एक प्लेट लगाने के लिए कहा और अपनी बात आगे बढ़ाई “अब मैं बात करता हूँ चरित्र चित्रण की। मैं लेखिका को बधाई देना चाहता हूँ कि डॉक्टर अंजना पर आधारित इस उपन्यास में उन्होंने डॉक्टर अंजना को पहले ही सीन में मरा घोषित करने के बावजूद अंत तक सबके बीच रखा। ये फैसला करना वाकई मुश्किल था कि संजीव नामक रिसर्च करता उनका स्टूडेंट मुख्य भूमिका में है या अंजना खुद”

“तेरी इस बात से भी मुझे इत्तेफ़ाक है। साथ ही पवन कुमार, यानी अंजना के बेटे के करैक्टर ने मुझे बहुत मुतमुइन किया। चालीसा के एक-एक छंद पर उसकी व्याख्या बेहतरीन थी”

“अच्छा भूमिजा, अंजना की भतीजी के बारे में क्या कहोगे? उसके आते ही कहानी की रफ़्तार कुछ कम ज़रूर हुई पर खोजबीन अपने चरम पर पहुँच गयी”

“वो तो पहुँची लेकिन रवि, संजीव का दोस्त, जो की प्रेस रिपोर्टर भी है; का करैक्टर इतना इंटरेस्टिंग होते हुए भी मुझे कम लगा। बीच में अचानक उसका गायब होना भी अखरा। साथ ही बॉलीवुड की थ्योरी की तरह लड़की हमेशा नायक को ही पसंद करेगी वाला पार्ट भी मुझे अजीब लगा। मैं रवि की उम्मीद कर रहा था”

मैं खाते हुए बोला “यार, ये लव स्टोरी नहीं थी। हालाकिं संजीव की तरफ से वो अट्रैक्शन न भी होता तो चलता, पर मुझे मामा जी के रोल से बहुत उम्मीद थी, उसका कम होना बहुत खल गया”

“ओह तेरा मतलब प्रताप? यार एक तो इसमें पात्रों के नाम कितने सटीक रखे गए हैं न”

“हाँ, एक-एक नाम पर काफी सोच विचार किया गया है, फिर भी मुख्य पात्र संजीव की बात करूँ तो वो शुरू से अंत तक थोड़ा घबराया सा रहा, लेकिन कुछ जगह उसने बहुत इम्प्रेस किया। मसलन जब वो पवन के लिए भाग दौड़ करता है” मैंने ढेर चटनी एक ही मोमो पर लगा ली और उसे गप करने लगा तो राजू ने घूर के देखा।

“और ले लेंगे, फ्री है” मैंने सफाई दी, साथ ही जोड़ा “भाषा शैली और संवाद मुझे इस उपन्यास की रीढ़ लगे”

“तूने असल पढ़ी या अनुवादित?”

“मैंने हिंदी एडिशन पढ़ा, जिसका अनुवाद सबा खान साहिबा ने किया है। साथ ही मुझे ख़ुशी है कि मैंने ये उपन्यास ‘आखिरी दांव’ के बाद पढ़ा। क्योंकि ये अनुवाद लगता ही नहीं। हर पात्र की भाषा शैली बहुत अच्छी है। हाँ, कहीं-कहीं सबके एक सी हिंदी बोलने पर खलता है पर…”

“एक मिनट” राजू ने हाथ पोछे “एक सी हिंदी? अबे चार पांच प्रकार की हिंदी होती हैं क्या?”

“मेरा वो मतलब नहीं भाई, मेरा मतलब कि हर शख्स के बात करने का तरीका अलग होता है, जिसे लहजा कहते हैं! मैं हिंदी उर्दू मिक्स बोलता हूँ तो तुम हिंदी इंग्लिश मिक्स बोलते हो तो मनीष हिंदी, इंग्लिश, मैथली, भोजपुरी, स्पैनिश न जाने क्या-क्या मिक्स बोलता है। मैं किताब लेता आऊंगा तो तुम नॉवेल लेते आना और मनीष उपन्यास ले आएगा। समझे फर्क?”

“हाँ समझा, आगे?”

“आगे ये कि इसके बावजूद मुझे संवाद बहुत अच्छे लगे। भाषा शैली बहुत प्यारी लगी। भूत शब्द के दो अर्थ वाला डायलॉग तो बहुत ही बढ़िया लगा”

“करेक्ट! मुझे भी, साथ ही वो सीन भी जब आप पूरी तरह से ये नहीं कह सकते की संजीव और हनुमान जी में आपस में गपशप हुई की नहीं?”

“हाँ, वो संवाद भी जानदार हैं। कुलमिलाकर उम्दा ट्रांसलेशन है!”

“अब आगे? क्लाइमेक्स के बारे में क्या कहेगा?” राजू ने फिर एक सिगरेट को मुखाग्नि देते हुए पूछा

“क्लाइमेक्स बहुत बड़े शोर के बाद कुछ सन्नाटे सा है। जो है वो संतुष्टिजनक है पर मैं इससे बड़े ड्रामे की इच्छा रख रहा था। बाकी जिन्होंने नहीं पढ़ी है उन्हें इस बारे यहाँ बताना ज़्यादती होगी”

“अब तेरा आखिरी जुमला – पढ़ने की वजह और न पढ़ने का बहाना क्या होगा?”

“पढने की वजह है” मैंने सोचने का अभिनय किया – “हनुमान चालीसा को सिर्फ रट्टे मारते आए हैं तो जाने की इसके एक-एक शब्द का अर्थ क्या है। अगर पहले से जानते हैं तो अपनी जानकारी में इजाफ़ा करें। क्योंकि ये सिर्फ अध्यात्म की ओर ही नहीं ले जाती, मेडिकल साइंस में के बारे में भी आपके ज्ञान चक्षु खोलती है।

“और न पढ़ने का कोई बहाना – टाइम न हो तो न पढ़ें, लव स्टोरी की अपेक्षा है तो न पढ़ें। कुटा हुआ स्वादानुसार सस्पेंस के शौक़ीन हैं तो भी परहेज़ करें।

हम मेट्रो स्टेशन के पास आ गए। मैं राजू से विदा लेकर मेट्रो की सीढ़ियाँ उतरने लगा!

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