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भीमा कोरेगांव- अतीत से वर्तमान तक

जनवरी 5, 2018 Girish Lohni

गैर-इतिहास के विद्यार्थियों का एक सवाल हमेशा रहता है कि इतिहास पढ़ाया क्यों जाता है या इतिहास पढ़ा क्यों जाता है. सवाल का बेहद आसान सा उत्तर है ताकि समाज में भीमा कोरेगांव जैसी हालिया घटना ना हो.

बाजीराव पेशवा प्रथम की मृत्यु के बाद मराठा साम्राज्य पतन की ओर बढ़ा.मराठो के मध्य बढ़ता आंतरिक कलह इसका मुख्य कारण था. सही मायने में माधवराव नारायण प्रथम अंतिम पेशवा था जिसने खोयी मराठा प्रतिष्ठा के लिये संघर्ष किया. इतिहास में तीन आंग्ल मराठा युद्ध के बारे में लिखा जाता है जबकि वास्तव में यह युद्ध आंग्ल मराठा युद्ध से ज्यादा मराठा-मराठा युद्ध थे जिसमें किसी एक मराठा  का पक्ष अँगरेजों ने  लिया था.

आज जिस बाजीराव द्वितीय के अपमान से मराठा सवर्ण समाज अपमानित महसूस कर रहा है वह इतिहास के सबसे कायर लोगों में गिना जाता है. यह वही बाजीराव पेशवा है जिसके द्वारा 1802 में बसीन की संधि स्वीकार किये जाने को अन्य सभी पेशवाओ ने मराठों का अपमान समझा था. जिसका परिणाम ही द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध था. यह वही पेशवा है जिसने मराठाओं में पहली बार सहायक संधि स्वीकार की थी.

तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध के नाम पर जिस ब्राह्मण-महार संघर्ष को दिखाया जा रहा है यह पूरा एक मिथक आधारित है. 1818 में हुये इस युद्ध का मिथक 1890 के दौरान अम्बेडकर द्वारा पहली बार गढ़ा गया था. जिन्होंने 1 जनवरी १८१८ को कोरेगांव में अंग्रेजो की कायर पेशवा पर विजय को महारो की ब्रह्मणों पर विजय के रूप में व्याख्यायित किया.  तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध में निश्चित ही महारो का योगदान था. लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर अँगरेजों की जीत मराठा विजय में महारो के शौर्य से अधिक पेशवा की कायरता ने तय की.

यह युद्ध एक ऐसे दौर में लड़ा गया था जब भारत में समाज सुधार आंदोलन का बीज अंकुरित हो रहा था. युद्ध एक कायर और निहायति घटिया शासक के विरुद्ध लड़ा गया युद्ध था जिसमें एक वाह्य आक्रमणकारी ने स्थानीय असंतुष्ट वर्ग को अपनी ओर मिलाया था. इस बात की तथ्यात्मक पुष्टि इस बात से होती है कि युद्ध में हुये शहीदों में केवल महार समुदाय के व्यक्ति ही नहीं थे.

इतिहास की गलत जानकारी के आधार पर वर्तमान मे लोगों को बाजीराव पेशवा प्रथम के साहसपूर्ण किस्से सुनाकर बाजीराव द्वितीय का कद बढ़ाने का प्रयास जारी हैं. इतिहास के दो शासकों के मध्य हुये युद्ध को जबरन हिंदू जातीय संघर्ष के रंग में रंगा जा रहा है.

इतिहास की कमजोर व गलत जानकारी भारत जैसे युवा देश के लिये अत्यंत खतरनाक है. भारतीय युवा शिक्षित है परंतु अधिकांश दसवी से अधिक नहीं पढ़ पाया है और इन युवाओं को सबसे जल्दी आक्रोशित व भ्रमित किया जा सकता है. और फिर जिस देश में बेतहासा युवा बेरोजगार हो वहाँ इसके और भी गंभीर परिणाम हो सकते हैं. इन गलत जानकारी क़े आधार पर ही वर्तमान में छ्दमी युद्ध गढे जाते हैं.

इतिहास की गलत जानकारी के आधार पर लड़े गये वर्तमान के इस छ्दमी युद्ध की प्रमुख विशेषता यह है कि इसे बाजीराव पेशवा जैसा कायर नायक तक नहीं मिल पाता. बस दो पक्ष गिना दिये जाते हैं जो अपनी अपनी मुर्खता सिद्ध करने में तुले हैं. इस छ्दमी युद्ध में सैनिक नहीं होते हैं ना ही युद्ध नियम. हाँ एक नियम जिसका आवश्यक रुप से  के रुप से पालन किया जाना वो है कि प्रहार सबसे कमजोर पर किया जाय. यही छ्दमी युद्ध ही दंगा है.  

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