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उत्तराखंड भर्ती से पहले की धांधली

जून 8, 2018 ओये बांगड़ू

हाल ही में उत्तराखंड सरकार द्वारा ग्राम विकास व पंचायतीराज अधिकारी भर्ती परीक्षा हेतु अहर्ताओ में परिवर्तन किया है. पहले जहां कोई भी भारत सरकार मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक इस परीक्षा में बैठ सकता था अब केवल विज्ञान, कृषि एवं वाणिज्य से स्नातक ही इस परीक्षा को दे सकता है. वर्तमान में उत्तराखंड में 400 ग्राम विकास व पंचायतीराज अधिकारी के पद रिक्त हैं. इसके अतिरिक्त सरकार ने सीसीसी (Course on Computer Concepts) का सर्टिफिकेट भी अनिवार्य कर दिया है.

ग्राम विकास अधिकारी पद पहले ग्राम सेवक कहलाते थे जिसे प्रशासनिक दम देने हेतु ग्राम विकास अधिकारी किया गया. यह सामान्यतः ग्राम्य विकास विभाग व पंचायती राज विभाग के माध्यम से केंद्र व उत्तराखंड सरकार की अधिकतर योजनाएं क्रियान्वित करने का कार्य करता है. जिस सीसीसी सटिफिकेट को अनिवार्य किया गया है वह कम्प्यूटर की सामान्य जानकारी से संबधित एक आनलाईन टेस्ट के बाद दिया जाता है.

कुल मिलाकर राज्य की डबल इंजन सरकार ने राज्य के युवाओ को छलने का प्रपंच रचा है. पहले तो पहाड़ के कितने युवा विज्ञान, कृषि एवं वाणिज्य से स्नातक करते हैं? दुसरा जिस सीसीसी के सर्टिफिकेट को अनिवार्य किया गया है उसकी परीक्षा सामान्यतः किसी भी पहाड़ी जिले में आयोजित ही नहीं कराई जाती. पहाड़ के युवा को जबरन मैदानी जिले पर निर्भर कराने का पर्यत्न सरकार कर रही है.

भर्ती के बाद एक ग्राम विकास व पंचायतीराज अधिकारी अपने कार्यकाल में नायब तहसीलदार के पद तक जा सकता है. नायब तहसीलदार के पद के लिये अहर्ता यदि भारत सरकार मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक है तो फिर ग्राम विकास व पंचायतीराज अधिकारी हेतु विज्ञान, कृषि एवं वाणिज्य से स्नातक शैक्षिक अहर्ता क्या औचित्य रखता है.

दरसल यह पूरा खेल रिक्तियों में देर करने का है. सरकार भी उक्त तथ्य से अवगत है. अतः सरकार चाहती है कि उक्त तथ्य पर बवाल हो और भर्ती प्रक्रिया स्वयं देरी से हो. उत्तराखंड के ही समीप राज्य उत्तर प्रदेश में यही विज्ञप्ति निकली है लेकिन वहां अहर्ता बारहवी पास है. फिर उत्तराखंड को क्या ऐसी आवश्यकता आन पडी की अहर्ता में इतना बड़ा परिवर्तन किया जा रहा है.

देश में एक सुनियोजित तरीके से गरीब पिछड़े समाज को सरकारी पदों से दूर किया जा रहा है. इसकी सबसे पहले शुरुआत आनलाइन परीक्षा आयोजित कर बैंक ने की. कम्प्यूटर के सामने बारह घंटे गुजारने वाले शहरी बच्चे का कम्प्यूटर देख अचम्भित रहने वाला ग्रामीण और पिछड़े परिवेश का बच्चा कैसे समान प्रतियोगी हो सकता है. पिछले कुछ सालों में इस साजिश के तहत केंद्र सरकार की सामान्य प्रतियोगी परीक्षाओ में ग्रामीण परिवेश के बच्चों को प्रतियोगिता से बाहर किया गया है.

उत्तराखंड के पहाडी जिलों के बच्चे केंद्र सरकार की नौकरी से पहले ही हाथ धो बैठे हैं. उत्तराखंड के किसी भी पहाड़ी जिले में केंद्र सरकार द्वारा आयोजित आनलाइन परीक्षा नहीं होती है. प्रत्येक विद्यार्थी को इसके लिये राज्य के मैदानी जिलों पर निर्भर रहना पडता है. परीक्षा आयोजन की तिथि के दौरान बस टैक्सी वाले से लेकर होटल वाला सभी पहाड़ के बच्चों की मजबूरियो का फायदा उठाते हैं. इन सब मानसिक तनावों के चलते कैसे पहाड़ का बच्चा समान प्रतियोगी हो सकता है.

उत्तराखण्ड में भी आयोग द्वारा सरकार को आनलाइन परीक्षा आयोजित किये जाने की सिफारिश कर दी है. इसके कारण पहाड़ एक पूरा युवा वर्ग कभी इन प्रतियोगी परीक्षा में सफल ही नहीं हो पायेगा. पहाड़ का बच्चा आज भी सरकारी स्कूल और सरकारी कालेज में ही पड़ता है. जहां के 90 प्रतिशत स्कूल कालेज में कम्प्यूटर लैब तक नहीं है. फिर यह कैसी समानता आधारित प्रतियोगी परीक्षा हो सकती है. सरकार ट्रकों में गांव-गांव शराब बेचने में सक्षम है लेकिन कम्प्यूटर स्कूलो में पहुचाने में असमर्थ.

भारत में तो बेरोजगारी अपने चरम पर है ही लेकिन उत्तराखंड में वर्तमान में 18 सालों में सबसे ज्यादा बेरोजगार हैं. यही नहीं पलायन की दर भी इस दशक में लगातार बढ़ती जा रही है. ऐसे में सरकार को चाहिये की वह युवाओं की समस्या का समाधान करे ना कि उन्हें भटकाने का प्रपंच रचे.

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