गंभीर अड्डा

बेरोजगारी का आलम प्रादेशिक सेना तक मे हजारों की भीड़

नवंबर 28, 2018 ओये बांगड़ू

प्रादेशिक सेना अर्थात टेरिटोरियल आर्मी, है क्या यह? असल मे उत्तराखण्ड के अखबारों में आजकल टेरियोरियल आर्मी की भर्ती की खबरें बड़े जोर शोर से छप रही हैं। प्रादेशिक सेना में भर्ती के लिए यूपी बिहार और उत्तराखण्ड के कई हिस्सों से लोग कूदते फांदते पिथोरागढ़ पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। इस चक्कर मे खबरनवीसों की नजर खराब यातायात व्यवस्था और बेरोजगारी के आलम में भी चली गयी। खैर बुराई बाद में पहले आपको यह बता दूं कि ये प्रादेशिक सेना आखिर है क्या।

यह असल मे भारतीय सेना की एक इकाई कही जा सकती है मगर इसमे भर्ती लोग स्वयंसेवक होते हैं। इन्हें प्रतिवर्ष कुछ दिनों का सैनिक प्रशिक्षण दिया जाता है तथा आवश्यकता पड़ने पर इनको देश की रक्षा के लिए विभिन्न जगहों पर तैनात किया जाता है।

भारतीय सँविधान सभा द्वारा सितम्बर 1948 में पारित किए गए प्रादेशिक सेना अधिनियम के अंतर्गत अक्टूबर 1948 से इसकी स्थापना मानी जा सकती है।इसमें 18 से 35 साल के वह सभी स्वस्थ लोग शामिल हो सकते हैं जो देश के प्रति कुछ करने की इच्छा रखते हों।

पहले इस सेना में शौकिया आर्मी में जाने के इच्छुक लोग ज्यादा जाया करते थे, लेकिन कम होती नौकरियों और बडती महंगाई में हर बेरोजगार को इसमे एक उम्मीद नजर आती है। वह क्या है न अच्छे प्रदर्शन पर सेना में जाने के चांसेस बढ़ जाते हैं।

इनका काम कुछ ऐसा है कि रेगुलर आर्मी को रेस्ट देना, उनकी जगह उनकी ड्यूटी को बखूबी निभाना,नियमित सेना के लिए अलग अलग स्तरों पर अलग अलग व्यवस्था करना। वैसे ये सोसाइटी में जो मर्जी चाहें काम करें, मगर आह्वाहन होने पर स्वेच्छा से इन्हें उस काम से छुट्टी लेकर सेना में जाना होता है, हां इस दौरान इन्हें इनकी नौकरी से नही हटाया जा सकता, एसा करने पर उसकी पुंगी बजा दी जाती है। खैर ये साल में कुछ ही महीने सेना की नौकरी करते हैं और इन कुछ महीनों में इन्हें सेना का पूरा वेतन मिलता है। एक तरह से टेम्पररी नौकरी है। देश सेवा के इच्छुक युवा या वो लोग जिन्हें आर्मी की वर्दी बहुत अच्छी लगती है वह अधिकतर इसे चुना करते थे।

लेकिन पिथोरागढ़ की भर्ती के लिए गए नवयुवकों को देखकर लगता है कि इन्हें इसी में एक लास्ट होप नजर आ रही है।

ये बढ़ती बेरोजगारी का ही असर है जो प्रादेशिक सेना जैसी टेम्परेरी जॉब के लिए भी दूर दूर से बेरोजगार नवयुवक यूं नवम्बर की ठंड में पहाड़ में पहुंच रहे हैं।

हमारे फेसबुक संवाददाता ने हमें बताया कि किस तरह ठंड में यूपी बिहार से आये लड़के कांप गए, मगर सरकारी नौकरी की चाह उन्हें इतनी दूर खींच लाई, हालांकि उन्हें आधे रास्ते मे पता चल गया था कि ये प्रादेशिक सेना भर्ती है, जो एक टेम्परेरी सरकारी नौकरी है। मगर इन्होंने भविष्य में सेना के ऑप्शन को खुला रखते हुए ठंड में वापस लौटने के बदले भर्ती में जाने की इच्छा दिखाई। वैसे फेसबुक संवाददाता ने यह भी बताया कि नगर पालिका के नवनिर्वाचित अध्यक्ष राजू रावत ने उनके रुकने खाने का फ्री इंतजाम करवा दिया जो एक सराहनीय कदम है।

मगर ये सोचनीय विषय है कि बेरोजगारी का ये आलम हमें और कहां लेकर जाएगा। जब सीमांत की एक प्रादेशिक सेना की भर्ती में यूं हजारों लोग पहुंचेंगे वह भी दूसरे राज्यों के ।

सेना में जाने का जोश सबमे होता है लेकिन टेम्परेरी में हमारे टाइम तो नही होता था। तब लोग टेम्परेरी जॉब के बदले काल सेंटर में चले जाते थे, एयरटेल आइडिया वालों के ।

 

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