बांगड़ूनामा

बाजार

दिसंबर 7, 2018 ओये बांगड़ू

एक मान्यता, एक दिखावा

जहाँ होड़ लगी

नीचा , ऊँचा दिखाने की,

और वहाँ दूर जंगल में.

 शव काटता एक आदमी

अपनी मान्यताओं से मजबूर

उसके सपने बादलों में दूर

जाकर छिप जाते हैं,

वो मनपा है जो बेपगार

शव काट

नदी में प्रवाहित कर

अपना कर्तव्य निर्वहन कर रहा

उसके कपडे़ खून से लत,

बदबू से भरे हैं

पर इस बाजार में

कोई ऐसी दुकान नहीं

जहाँ मिल जायें उसे

कुछ पहनने लायक कपडे़

ये बाजार तो व्यस्त है

अपनी अर्थव्यवस्था में

अपने शेयर बाजार में

कहीं मँहगी गाडियां बिक रही

कहीं कपडे़

कहीं जेवर

बस बिक नहीं रहा

दो जून की रोटी,

तन ढकने को कपड़ा

संवेदना क्या है आखिर?

ये बाजार नहीं समझता

पैसा चलता है

और चलते हैं तो विमर्श

स्त्री विमर्श

दलित विमर्श

आदिवासी विमर्श

और इन्हीं सब से

फल फूल रहा है बाजार

इन्हें बादलों के बीच

वो धुँआ नहीं दिखता

बस दिखती है

बादल की सफेदी।       

(लेखिका – दीप्ति शर्मा )

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पिता

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