बांगड़ूनामा

बारगेनिंग

अक्टूबर 16, 2016 ओये बांगड़ू

स्वर्गीय तारा मोहन पन्त की कहानियाँ वास्तविक दुनिया से ली गयी होती हैं, पहाडी हिन्दी में लिखी ये कहानियाँ पढ़कर आपको लगेगा कि आपके इर्द गिर्द भी एसा हुआ था कभी , आज की कहानी है बारगेनिंग , सामान्य दुकानदार और ग्राहकों के बीच होने वाली बारगेनिंग

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सुबह दूकान खोल, झाड़ू लगा, दिया बाती कर काउंटर वगैरह व्यवस्थित कर भट जी थोड़ा सुस्ता रहे थे । खडी बज़ार में उनकी परचून की दूकान थी, पहले दोनों भाई साथ बैठते थे पर बाद में उनके दाज्यू ने साथ आठ दूकान छोडकर एक नई दूकान खरीद ली थी , वो भी परचून की बड़ी दूकान थी, वहां थोक का भी काम होता था । भट्ट जी स्वभावगत मिलनसार थे, लेकिन दुकानदारी में वे बहुत कृपण थे, बहुत कहने पर भी भाव नहीं गिराते थे , अजीब  – अजीब तर्क देते थे ।

तभी सामने वाली चाय की दूकान से लड़का उन्हें चाय दे गया, वे चाय की चुस्कियां ले ही रहे थे कि तभी एक सूटेड बूटेड आदमी उनकी दूकान पर आया , भट्ट जी की बांछें खिल गईं, जरूर से बाहर का है, इसे जाने नहीं देना है, अच्छी बिक्री हो जायेगी ।

आदमी : गहत(एक पहाडी दाल) होंगे आपके पास ?

भट्ट जी : क्यों नहीं ! गहत, भट्ट, मांइर्, मड़ुवा सब ठैरा हो यहां !

आदमी : नहीं मुझे गहत ही चाहिए , दिखाएँगे ज़रा ?

भट्ट जी : अरे भीतर तो आऒ महाराज , सब दिखाता हूँ

( आदमी अंदर आया और दूकान के बेंच में बैठ गया , भट्ट जी ने एक कटोरे में गहत रख कर आदमी की और दिखाए )

भट्ट जी लियो देखो महाराज एकदम फर्स्टक्लास गहत ठैरे हमारे यहां

आदमी : क्या भाव दे रहे हैं ?
भट्ट जी :पचास रुपए किलो

आदमी : पचास ? बहुत ज्यादा बता रहे हैं आप

भट्ट जी : कस बात कर रे ठैरे , आप सुबह की पहली गाहकी हैं आपसे ज्यादा जो क्या लेने ?

आदमी : नहीं नही ये बहुत ज्यादा हैं , इतना मैं नहीं दे सकता

भट्ट जी : ठीक ही लगाए हैं मैंने , यही भाव चल रहा है

आदमी : पर मुझे तो बताया गया था कि यहां गहत तीस तक मिल जाते हैं

भट्ट जी : अरे भली चलाई लोगों की , कब की बात कर रहे ठैरे

आदमी : और ये गहत की क्वालिटी भी उतनी अच्छी नहीं लग रही

भट्ट जी : कहाँ से सुन के आये ठैरे आप ! अरे ये मुंश्यारी के हैं

आदमी : मुंश्यारी ?

भट्ट जी : हाँ हमारे यहां मुंश्यारी से ही दालें आती हैं ,देख नहीं रहे हैं कितने चमकीले गूदे हैं, साइज थोड़ा छोटा है पर स्वाद में गज़ब के होते हैं , मैंने खुद खाए ठैरे , बेफिक्र ले जाइए

आदमी : पर भाव तो सही लगाइये

भट्ट जी ; सही लगाए हैं मैंने ( बात बदलते हुए ), आप यहां के तो नहीं लग रहे , कहीं बाहर से आये हैं क्या ?

आदमी : जी हाँ में दिल्ली से आया हूँ

भट्ट जी : यहां किसके यहां आये ठैरे ?

आदमी : नीचे जो तिवारी मास्साब हैं न वो मेरे मामा लगते हैं वहीं आया हूँ

भट्ट जी : ( बात बनाते हुए ) तभी में कहूँ कि आप गहत कैसे पहचानते हैं

आदमी : नहीं जी ! मैं इतना कहाँ जानता हूँ, मामी ने मुझे बताया था कि आपकी दूकान में ये चीजें सही मिलती हैं

भट्ट जी : (धूर्तता से मुस्कुराते हुए ) ठीक कहा ठैरा आपकी मामी ने , वो सारा सामान यहीं से ले जाती हैं, उन्हें हमारे सामान की पहचान ठैरी
आदमी : पर भाव सही नहीं बता रहे हैं आप

भट्ट जी : ( सोचने लगे कि दाज्यू कहते हैं कि पहली गाहकी छोड़नी नहीं चाहिए ) अरे ! तस किले कुनछा महाराज, अब त्याड़ज्यू के भांजे हुए , अब आपको ठगेंगे थोड़ी , चार – आठ आने काम दे देना , घर की बात ठैरी, कितने तौल दूँ ?

आदमी : ले तो जाने थे पचास किलो , पर भाव पट नहीं रहा है

( अब भट्ट जी सोचने लगे कि दूकान में तो तीस किलो तक ही होंगे, ये पचास किलो मांग रहा है , गाहकी छोड़नी भी नहीं ठैरी , चालो दाज्यू के यहां भेज देता हूँ , वहां थोक में भरे पड़े हैं , वहीं बरक्कत हो जाय )

प्रकट में बोले : पचाएस क्या ज्यादा ले जाइए, बार बार तो आएंगे नहीं पहाड़, वहां दिल्ली में सबको बाँटिएगा

आदमी : पर भाव तो सही करिये

भट्ट जी :(खीजने का नाटक करते हुए ) अच्छा चलो एक रुपिया काम दे देना हो महाराज

आदमी : ठीक है, मामी के कहने पर में यहां आया हूँ , मुझे अभी निकलना है , जल्दी से तौल दीजिये फिर

भट्ट जी : अरे हाँ पचास किलो के लिए आपको मेरे दाज्यू की दूकान जाना पडेगा , मैं इंतजाम कर देता हूँ , कोई परेशानी नहीं होगी

आदमी : अब आपने यह क्या बबाल कर दिया, अब में आपके दाज्यू के यहां जाऊं, उनसे भी भाव के लिए झिक झिक करूँ, इतना टाइम नहीं है मेरे पास , चलो मैं कहीं और से ले लूँगा

भट्ट जी ( गाहकी हाथ से निकलती देख ) : अरे कोई परेशानी नहीं होगी, मैं इंतजाम किये देता हूँ

आदमी : मुझे झिक झिक नहीं चाहिए, आप एक रुक्का लिख दीजिये उसमें भाव व वजन लिख दीजिये , मैं वहीं से ले लूँगा

भट्ट जी ने उस आदमी को रुक्का लिख कर दे दिया , और वो चला गया , भट्ट जी का दिल बल्लियों उछलने लगा ,एक तो उन्होंने तीस रुपये के गहत उनचास रुपये में बेच दिए वो भी एक – दो नहीं पूरे पचास किलो, अब तो दाज्यू उनकी चतुर सौदेबाजी का लोहा मान लेंगे ।

शाम को दूकान बंद कर वे घर पहुंचे, रात का खाना दोनों भाई परिवार के संग मिलकर खाते थे , खाना खाते हुए बड़े भाई ने उनसे पूछा

बड़े भाई : किले रे देवियाँ , आज त्वील तीस रूपैक गहत उड़ानपंचास में बेचि दी , ततुक अकर बेचण में तिकनी डर नि लागि, कईं ऊ और जाग में पुछि लीन त ?

(अरे देवी , आज तूने तीस रूपये के गहत उनचास रूपये में बेच दिए इतना करने में तुझे डर नहीं लगी , अगर वो कहीं और पूछ लेता तो ?)

भट्ट जी :अरे दाज्यू ऊ आपुन कनि बहुत होशियार समझें लागि रौछी रांडो मैंल ले यस बातन में फंसा , सिद्द तुमर पास भेजी दे, तुमर वां ले कचकचाट त नि कर ऊल ?
(अरे बड़े भाई वो खुद को बड़ा होशियार समझ रहा था मैंने भी बातों में फंसा के सीधे तुम्हारे पास भेज दिया, वहां तो नहीं कर रहा था कुछ  परेशान )
बड़े भाई : किले ? कचकचाट किहूँ करछी ? तवील रुक्क दी भै कि पचास किलो गहत दी दियौ, सौद पक्क है गौछ कबेर , मेल पचास किलो तुलवा दीं , ऊ बिचार कूँण लागि भै केसीके वीक टैक्सी तक पूजै दिना कै बेर , मैल देवानी हाथ पूजै दी , सोचो त्योर गहकी छ कबेर
(क्यों ? परेशान क्यों करता ? तूने लिख के भेजा था कि पचास किलो गहत दे देना पैसे तय हो गए हैं मैंने दे दिए , कह रहा था गाडी में रखवा दो मैंने सोचा तेरी ग्राहकी है तो मैंने गाडी में भी रखवा दिया )
भट्ट जी : कतुक डबल ल्यान तुमूल उथे ? (पैसे कितने लिए तुमने उससे ?)

बड़ेभाई : कस डबल ? सौद त्योर पक्क हई भै , उ ले के नि कैगे ? थैलि लिबेर जाने रॉ (कैसे पैसे ? सौदा तूने पक्का किया था , उसने कुछ नहीं कहा ? थैला पकड़ा चला गया )

भट्ट जी ओ ईजा ! डबल नि ल्यात तुमूल उथे ? (ओइजा ! पैसे नहीं लिए तुमने ?)

बड़े भाई : फिर ऊई बात ? मैं किले लीन्यू डबल , तवील रुक्क में डबलकानाक बार में के लिखी नि भयो ? (फिर वही बात ? मै क्यों लेता पैसा , तूने कागज में पैसे के बारे में कुछ नहीं लिखा था )

इतना सुनते ही भट्ट जी ‘ने कोहराम मचा दिया : ठगी गयो उ कांणी च्योल !!!!!!!!!!!!! (ठग गया वो …गाली के साथ )
दौड़ते हुए तिवारी मास्साब के घर गए उनसे कहा कि उनका भांजा उन्हें ठग गया है , मास्साब बोले ” पागल हो गए हो क्या ! मेरी कोई बहन नहीं है तो भांजा कहाँ से होगा, कोई थूक लगा गया रे तुझे भट्ट ” )

बुझे मन से वो घर वापस आये और धम्म से खाट में गिर पड़े
तब भट्ट जी की ईजा जो सारी बात सुन चुकी थी , वो बाहर आई , और बोली ” मेंल कतुबख्त बते राखौ त देशिन है सावधान रूंण चैंछ (मैंने कितनी बार कहा है तुमसे ये बाहर के लोगों से सावधान रहना चाहिए )
” एक मरी देशी ले सौ ज्यूँन पहाडिंनक बराबर हुन्छ ” (“एक मरा हुआ देशी भी सौ पहाड़ियों के बराबर होता है )

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