गंभीर अड्डा

बदलते अखबार

जनवरी 17, 2019 ओये बांगड़ू

आजादी से पहले अखबारों में राजनैतिक खबरों का जोर ज्यादातर दो तरह से रहता था,पहला ख़बरों को सूचनात्मक तरीके से पेश किया जाता था,दूसरा आजादी और उससे जुडी ख़बरें मुख्य विषय हुआ करती थी, महात्मा गांधी के निकाले ‘हरिजन’,यंग इण्डिया जैसे अखबार समाज सुधार के साथ साथ आजादी से जुडी बातो पर ज्यादा ध्यान दिया करते थे.आप आजादी से पहले के अखबारों की हेडिंग पर गौर करेंगे तो पायेंगे कि अधिकतर हेडिंग सामाजिक सुधार पर केन्द्रित थी या आजादी के सम्बन्ध में(इनमे वह अखबार शामिल नहीं हैं जो अंगरेजी शासन की दासता स्वीकार चुके थे,उनकी अधिकतर हेडिंग अंगरेजी चमत्कारिक सत्ता की तारीफ़ पर केन्द्रित थी)

भुज के इलाके से आये एक बुजुर्ग विमल भाई शाह ने एक बार बताया था कि आजादी से पहले उनके इलाके में अख़बार आने में एक से दो हफ्ता लग जाता था,और लोग अखबार का बेसब्री से इन्तजार करते थे सिर्फ यह जानने के लिए कि बाबा(महात्मा गांधी) ने कौनसी नयी बात कही है.उस समय बाबा की बात पत्थर की लकीर हुआ करती थी और बाबा का सन्देशवाहक होता था अखबार क्योंकि हर जगह बाबा खुद पहुँच नहीं सकते थे और अंगरेजी सरकार के पिठ्ठू बाबा के नाम से फर्जी खबरें फैला दिया करते थे,वह बताते हैं कि एक बार एसे ही किसी अंगरेजी सरकार के पिठ्ठू ने खबर फैला दी थी कि बाबा ने कहा है स्वदेशी विदेशी कुछ नहीं होता सब मन का भ्रम है,असली ताकत इंसान के अंदर होती है कपड़ों में कोइ ताकत नहीं.और गाँव के लोगों ने यह बात मान भी ली थी,लेकिन तीन हफ्ते बाद एक अखबार के जरिये उन्हें पता चला कि बाबा विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को लेकर आन्दोलन चला रहे हैं.तब से उनके गाँव में बाबा का संदेशवाहक सिर्फ अखबार हो गया.वह किसी और की बात पर कभी भरोसा नहीं करते थे.

आजादी के बाद के अखबारों में राजनैतिक रिपोर्टिंग थोड़ा विकास की तरह आ गयी,ये माना जाने लगा कि अभी नए बने देश को प्रोत्साहन की जरूरत है, और इस बीच में 48, 62, 65, 71 की लड़ाइयां हो गयी,इसलिए कोइ एसी प्रमुख बात नहीं थी कि मीडिया का पोलिटिकल जुड़ाव देखा जा सके .
इमरजेंसी के पीरियड में लगभग सभी अखबारों ने घुटने टेक दिए थे,हालाँकि उस समय भी कुलदीप नय्यर जैसे पत्रकार बखूबी अपनी भूमिका निभा रहे थे, एक रोचक किस्सा है इस दौर का,इन्डियन एक्सप्रेस ने एक खबर लिखी , जिसमे इंदिरा गांधी का नाम मेंशन नहीं किया और किसी अफ्रीकन देश की तत्कालीन व्यवस्था के आधार पर भारत में घटित हो रही सभी घटनाओं को कह दिया,पढने वाला पाठक जानता था कि अखबार किस बारे में बात कर रहा है.
जेपी आन्दोलन के समय से मीडिया में क्रांती आना शुरू हुआ,तब देश में एक माहौल तैयार हो गया और सत्ता के द्वारा किये जा रहे सभी अत्याचारों पर अखबार पुरजोर तरीके से लिखने लगे, ये वह दौर था जब अखबारों ने अपनी असली ताकत दिखाई,
जेपी के समय से राजनैतिक ख़बरों का स्वरूप बदलने लगा, खबरों के पोलिटिकल एंगल तलाशे जाने लगे, नए गठबंधन कांग्रेस के सामने खड़े हुए, और मीडिया में भी राजनैतिक खबरों की रिपोर्टिंग करने का तरीका बदलने लगा, सिर्फ इंटरव्यू या समीक्षा तक राजनीतिक ख़बरें नहीं रह गयी थी.
नब्बे के दशक तक आते आते पोलिटिकल न्यूज मीडिया में नए तरह से आने लगी,जनता क्या सोचती है इस बारे में भी में अखबारों में चर्चाएँ होने लगी, पहले जहाँ सिर्फ वादों तक खबरें पूरी हो जाती थी, अब ये देखा जाने लगा कि वादों में कितने पूरे हुए कितने नहीं, राजनैतिक चेतना जगाने का काम शुरू ही हो रहा था कि प्राईवेट न्यूज चैनल ने दस्तक दी.
अब नयी सेंचुरी में आ गए थे,खबरें सिर्फ लिखी नहीं जाती थी बल्कि टीवी में ख़बरें दिखाई जाती थी, पहले जहाँ रेडिओ में सिर्फ गिने चुने राजनैतिक व्यक्तियों के इंटरव्यू होते थे वहीँ अब टीवी में सभी दलों के नेताओं के अलग अलग इंटरव्यू आने लगे, चर्चाएँ शुरू होने लगी, धीरे धीरे मीडिया में ये आरोप भी लगे कि वह इंटरव्यू फिक्स करता है,मगर एक नया दौर शुरू हो रहा था,
आज के दौर में ख़बरें टीवी से निकल कर बाहर आपके हाथ में आ गयी हैं, अखबारों के रीडर अब मोबाईल के व्यूज बन गए हैं.

अखबार आज भी ज़िंदा है लेकिन जिस तरह की हेडिंग लगा रहा है शर्म आने को होती है,पिछले दिनों एक अखबार ने हेडिंग दी समाज सुधार के नाम की,लिखा था अब नहीं सतायेंगे पीरियड्स तो क्या पीरियड्स बंद हो सकते हैं ? क्या ये संभव है ? नहीं लेकिन खबर बेचने के लिए कुछ भी लिखो सब चलता है.एक घर से हथियार बरामद हुए,हेडिंग बनी मस्जिद के बगल से हथियार बरामद , मस्जिद का खबर से कोइ लेना देना नहीं.लेकिन एसी ख़बरों पर मुसलमान शब्द जुड़ा होने से खबर ज्यादा लोग पढ़ते हैं शायद ये सोचकर लिखने वाले ने मस्जिद जोड़ दिया.

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