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बच्चे की दर्दनाक मौत,स्कूल प्रशासन कितना जिम्मेदार ?

दिसंबर 1, 2018 कमल पंत

सुबह से इन तस्वीरों को देख देख कर विचलित हो रहा हूँ,मेरे शहर की खबर है जहाँ एक बच्चे की बस के टायर के नीचे आ जाने से मौत हो गयी.वह कुचला गया बस के नीचे,जाहिर सी बात है ट्रेफिक नियमों की धज्जियां तो उडाई गयी होंगी,स्कूल प्रशासन को घेरने का भी कोइ फायदा नहीं,देशी भाषा में कहूं ‘तो पैसे वाली पार्टी है,कल को पैसे देकर सबका मुंह बंद कर देगा और हम देखते रहेंगे,हो सकता है कुछ दिन के लिए बस में गार्ड और बच्चों के चड़ने उतरने समय के लिए किसी जिम्मेदार आदमी को नियुक्त कर भी दे मगर बाद में ?’

खैर इन सब बातों पर बहस बेमानी है,एक स्कूली बच्चा जब घर से स्कूल पहुंचता है तो वह पूरी तरह से स्कूल की जिम्मेदारी में होता है,बच्चे को स्कूल में किस तरह सम्भालना है ये जिम्मेदारी स्कूल की होती है,और प्राईवेट स्कूल तो इसी बात का पैसा भी लेते हैं,एक पांच साल बच्चा अगर किसी भी वजह से बस के टायर के नीचे आ गया है तो इसमें स्कूल प्रशासन जिम्मेदार है,गुस्सा तो ये कहता है कि स्कूल का ही बायकाट कर दो,भेजो ही मत एसे केयरलेस स्कूल में किसी बच्चे को.

इस बच्चे की मौत उसके बड़े भाई के आँखों के सामने हो गयी,बड़ा भाई चीखता रहा कि बस रोक दो मगर उसकी चीख ड्राईवर के कानों तक नहीं पहुँची और न ही किसी बड़े जिम्मेदार आदमी(खासकर स्कूल प्रशासन के ) ने अपनी आवाज को वहां तक पहुचाया,पहुंचाता भी कैसे,कोइ होता तब न,अधिक बच्चे अधिक फीस अधिक पैसा के लालच में कम स्टाफ के सर में ज्यादा बच्चों की जिम्मेदारी जब होती है तब एसा ही नतीजा निकल कर आता है.

फिलहाल सिर्फ गुस्सा तैर रहा है,गुस्से के अलावा शांत दिमाग से लिखने का कुछ मन नही.कभी और इस विषय पर जिम्मेदारी से लिखेंगे.

लेकिन आज सिर्फ ये बहस करते हैं कि गलती किसकी है? बच्चे की ? वो दौडकर बस में क्यों गया,? उस माँ बाप की ? स्कूल के भरोसे क्यों छोड़ा ? स्कूल की ? जो बस पैसे लेता है,? बस ड्राईवर की ? जिसे बच्चा दिखा नहीं ?

यहाँ दिल्ली में स्कूलों में जब छुट्टी होती है तो प्राईमरी के बच्चों के साथ दो से तीन मैडम और एक गार्ड होता है जो बस के रुकने पर उन्हें बस में बैठाता है,एक मैडम बस के साथ जाती है (ये पर्सनली देखा है मैंने) मुझे दो प्रतीशत भी उम्मीद नहीं है कि पिथोरागढ़ के स्कूल में एसा होता होगा.

ये स्कूल मेरे सामने बना,कहते हैं रातों रात हिट हो गया,वही हुआ इस स्कूल के साथ,एक आयुर्वेदिक अस्पताल हुआ करता था किराए के कुछ कमरों में,वहीं से इस स्कूल की भी शुरुवात हुई,आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कुछ महीनों में एक बहुत रिस्की जगह पर इसके स्कूल भवन का निर्माण भी शुरू हो गया था. एक एसी जगह जिसके एक तरफ खाई थी,वहां छोटे छोटे बच्चों का स्कूल बनने जा रहा था,मेरी स्मृति में किसी बाबा का भी सपोर्ट हासिल था इसलिए बड़ी आसानी से उस जगह पर भवन बनकर तैयार हो गया और बच्चे वहां शिफ्ट भी कर दिए गए. स्कूल भवन का एक हिस्सा पूरी तरह से अति सेंसिटिव जोन में.अब गिरे की तब गिरे वाली हालत और दूर से देखने में तो पीसा की मीनार लगा था और एसे भवन में सैकड़ों बच्चे पढ़ रहे थे.

अब उस भवन का क्या हाल नही पता,मगर जिस जगह पर ये भवन बनाया गया वहां गाय का गौशाला बनने के भी हाल नहीं थे. खैर पहुँच पकड़ और रूतबा से सब कुछ संभव है,सभी मानक ताक में रखे जा सकते हैं अगर जबर्दस्त पकड हो तो. उस समय भी बच्चों की जिन्दगी खतरे में थी मगर कोइ हादसा नहीं हुआ. उसके बाद क्या हुआ उस स्कूल का मैं नहीं जानता है मुझे छोड़े हुए दस साल होने को आये. उम्मीद करता हूँ इस हादसे के बाद कम से कम सभी स्कूल बच्चों को जिम्मेदारी से घर पहुंचाने का जिम्मा जरूर उठाएंगे.या माँ बाप खुद ही जिम्मा ले लेंगे.

 

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