यंगिस्तान

Audio- मुकद्दर का सिकन्दर का डायलॉग था कादर खान का जीवन फलसफा

जनवरी 2, 2019 ओये बांगड़ू

यहाँ सुने कादर खान साहब का जीवन फलसफा  

कादर खान साहब   81 साल की उम्र में  इस दुनियां को अलविदा कह गये . वो एक ऐसी शख्सियत थे जो जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी में एक लेखक ,टीचर और अदाकार सभी किरदारों को बेहद खूबसूरती के साथ निभाया. कादर खान ने फिल्मों में आम बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल करते हुए कई ऐसे सुपरहिट डायलॉग लिखे जो यादगार बन गये .अपनी स्क्रिप्टिंग के जरिए चीज़ों को बहुत आसानी से समझा देना कादर खान की खासियत थी.90 के दशक में जन्में बच्चों के लिए कादर खान एक बेहतरीन कॉमेडियन थे. आज कादर खान साहब को अमिताभ बच्चन, गोविंदा और कई बड़े अभिनेता याद करते हुए उनके साथ बिताए पलों को याद कर रहें है. ऐसा ही एक किस्सा कादर खान भी याद किया करते थे जिसे दुखी होने पर उन्होंने सबसे बड़ा मोटिवेशन माना.

कादर ख़ान बताते थे उस फिल्म में मैंने एक भिखारी का रोल किया था. मैं एक कब्रिस्तान में जाता हूँ और एक बच्चे को देखता हूँ. बच्चा बड़ा होकर अमिताभ बच्चन बनता है. वह कब्र पर बैठा रो रहा है.

“किसकी कब्र पर बैठे हो बच्चो?

“हमारी माँ मर गयी है.”

“उठो. आओ मेरे साथ. चारों तरफ देखो. यहाँ भी कोई किसी की बहन है, कोई किसी का भाई है. कोई किसी की माँ है. इस शहर-ए-खामोशियों में, इस खामोश शहर में, इस मिट्टी के ढेर के नीचे सब दबे पड़े हैं. मौत से किसको रास्तागरी है? इस मौत से कौन छूट सकता है? आज उनकी, तो कल हमारी बारी है. मेरी ये बात याद रखना इस फकीर की बात याद रखना. ये ज़िन्दगी में बहुत काम आएगी. कि अगर सुख में मुस्कराते हो तो दुःख में कहकहे लगाओ. क्योंकि ज़िन्दा हैं वो लोग जो मौत से टकराते हैं, पर मुर्दों से बदतर हैं वो लोग जो मौत से घबराते हैं. सुख तो बेवफा है. चन्द दिनों के लिए है. तवायफ की तरह आता है. दुनिया को बहलाता है दिल को बहलाता है और चला जाता है, मगर दुःख तो हमेशा का साथी है.एक बार आता है तो कभी लौटकर नहीं जाता, इसलिए सुख को ठोकर मार, दुःख को गले लगा. तकदीर तेरे क़दमों में होगी और तू मुकद्दर का बादशाह होगा.”

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