यंगिस्तान

Audio Travelogue: काज़ा से हिक्किम (6th डे)

दिसंबर 29, 2018 ओये बांगड़ू

दुनिया के सबसे ऊँचाई पर बने पोस्ट ऑफिस और बर्फीले सफ़र को पढने के लिए यहाँ क्लिक करें –

काज़ा से हिक्किम, कौमिक, लांगज़ा, कीह, किब्बर, चीचम
105 किलोमीटर (कुल जमा 1323 किलोमीटर)

 

काज़ा में सुबह देर से होती है. रात का तापमान -10 से -15 तक चला गया था, बाहर सर्द हवाओं की अवाज एक बार झुरझुरी पूरे शरीर मे झुरझुरी मचा देती हैं. काज़ा लगभग 3800 मीटर की ऊंचाई पर है, और ये स्पिती और लाहौल जिले का सब डिवीजन हेड क्वार्टर है, केलॉन्ग स्पिती जिले का हेड क्वार्टर है. रात की सर्द हवा थोड़ा डरा भी रही थी क्यूंकि आज हमे 4500 मीटर से भी ऊंचाई पर जाना था, जहां बर्फीली हवाओं से सामना होना था चूंकि काज़ा की सुबह देर से होती है तो हमे काज़ा छोड़ते 10 बज गए. अब सबसे पहले हिक्किम का रास्ता पकड़ा जो यहां से कोई 14 किलोमीटर की दूरी पर है. हिक्किम की खास बात ये थी कि ये 4440 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और इस गाँव मे दुनिया का सबसे ऊंचाई पर स्थित पोस्ट ऑफिस है. स्पिती बेल्ट में ये इसी कारण बहुत प्रसिद्ध है.

खैर मैं गाँव मे पहुंचा तो गाँव लगभग खाली सा दिखा, एक जगह तीन महिलाये खाना बना रही थी, उन्होने चाय ऑफर करी और हम बेशरम होकर उनके घर में घुस गए. बताते हैं गर्मी के सीज़न मे यहां चहल पहल रहती है एक दिन मे 50,60 टुरिस्ट तक आ जाते हैं, लेकिन अक्तूबर के बाद से 6 महीने के लिए पूरी तरह निर्जन जैसा पड़ जाता है क्यूंकि यहां बर्फ ही बर्फ रह जाती है, ग्रामीण अपना जाड़ों का बफर पहले ही रख लेते हैं, ज्यादातर गाँव मिट्टी के बने हैं जो अंदर से गरम रखते हैं, एक खास बात स्पिती घाटी के गाँव के घरों में एक घास (पेमा) रखी जाती है, जो बारिश के दिनों में पानी को मिट्टी से मिलने से बचाती है. चाय के लिए धन्यवाद बोलकर मैं आगे कौमिक गाँव की तरफ बढ़ गया.

कौमिक गाँव की खाशियत ये है कि ये दुनिया का सबसे ऊंचाई पर स्थित गाँव है जो सड़क से जुड़ा है जिसकी ऊंचाई 4587 मीटर है. यहां की एक और बात विशेष यहां की मोनेस्ट्री है जो करीब 1000 साल पुरानी है, नाको, धनकर के बाद मुझे यहां भी चाय पीने का सौभाग्य मिल गया. कौमिक गाँव की कुल आबादी 114 है. इतनी ऊंचाई मे सब जम जाता है सिवाय आदमियों के जज्बे के. जिस ऊँचाई पर जाने मे हालत खराब हो रही हो, ऐसी जगह लोग गाँव मे रह रहे हैं, मेडिकल सुविधा के नाम पर 300, 350 किलोमीटर भागो. अधिक ऊंचाई पर हवाएं और क्रूर हो जाती है और गालों पर थप्पड़ रसीदते हुए निकलती हैं. यहां के गाँव वालों के याक हैं, और ताज्जुब इतनी ऊंचाई पर भी ये आलू, मटर उपजा देते हैं. मोनेस्ट्री के सामने लामा रहते हैं, अंदर कमरा गरम है बाहर पॉली हाउस बनाया है जिससे इसे गरम किया जाता है. चाय का धन्यवाद देकर मैं अगले गाँव लांगज़ा की तरफ निकल गया.

लांगज़ा इलाके मे स्नो लेपर्ड, रेड फॉक्स, हिमालयन ब्लू शीप, हिमालयन आईबेक्स दिखता रहता है जिसमे से पहला छोड़ बाकी सब मुझे दिखे. अब लांगज़ा एक गाँव है और यहां बुद्धा का एक स्टेचू है. इस गाँव के आगे फोज़ील पॉइंट जैसा कुछ है बताते हैं (जैसा हम को मालूम है) इस जगह जब समुद्र धीमे धीमे पट कर चट्टान के रूप में उभर रहा था, तो उस समय के समुद्री जीवों के अवशेष अब फोज़िल बन कर यहां मिलते हैं, यहां से लौटते हुए मैंने एक कौमिक के आदमी को लिफ्ट दी जो अपनी याक देखने वहां गया था. उसने मुझे भेंट मे फोज़िल का एक टुकड़ा दिया जिसे मैंने संभाल के रख लिया. इस गाँव से मैं जल्दीबाजी में निकल आया क्यूंकि मैंने हिक्किम और कौमिक मे बहुत समय लगा दिया था.

घडी कोई 2 बजे का इशारा कर रही थी, मुझे वापस 20 किलोमीटर नीचे का काजा  वाली रोड पर आना था क्यूंकि हिक्किम, कौमीक , लांगज़ा के लिए ये रूट मैन रोड से कट कर ऊपर की ओर जाता है. 2.30 बजे मैं वापस काज़ा किब्बर वाली रोड़ पर पहुंच गया. यहां से कोई 3 किलोमीटर चलने पर एक महत्वपूर्ण पुल पड़ता है जहां से एक रास्ता लोसर, रनरिक, ग्रांफू, कुंज़ूम पास के लिए जाता है, और सीधा कीह, किब्बर, चीचम के लिए. इस रोड पर चलते हुए हिमालयन ब्लू शीप का 15,20 का एक झुंड दिखता है, क्यूँकि यहां के पहाड़ चट्टानी हैं, कहने के लिए कहीं कहीं पर झाड़ी हैं इसे ही खाने ये नीचे उतरते हैं और पत्थरों मे इनकी दौड़ गजब की होती है और इन्ही के चट्टान  मे ये रहते हैं. 10 किलोमीटर बाद कीह गाँव आ जाता है कुल 60 घरों की आबादी है यहाँ की ग्राम पंचायत किब्बर है.

कीह गाँव में ऊपर चढ़ कर प्रसिद्ध कीह मोनेस्ट्री है, जो स्पिती घाटी सर्किट का अहम हिस्सा है. यहां पहुँच कर सबसे पहले लामा जी की खोज करी, जो डोगरा रेजिमेंट के जवानों से बोटी भाषा में बोल रहे थे जिससे समझ मे आ गया कि ये भी इसी पट्टी से ताल्लुक रखते हैं.मैं तब तक मोनेस्ट्री की हिस्ट्री पढ़ रहा था कि पीछे से आवाज आई ‘ज़ुलेय’ मैंने भी जवाब मे ‘ज़ुलेय’ मे अभिवादन किया. फिर उन्होने खुद ही मोनेस्ट्री दिखाने की पहल की और मैं चल पड़ा उनके पीछे. ये मोंनेस्ट्री असल में पहले रिंरिक मे थी. जो भूकंप और समय के साथ आधी टूट गई फिर करीब 1000 साल बाद इसे कीह में शिफ्ट करा गया. एक और चीज उन्होने बताई कि इसका नाम कील था, जिसका मतलब उनकी भाषा मे मध्य से होता है, कील से होते हुए वो आज कीह हो गया.

मोंनेस्ट्री कोई तीन मंजिला है जो पूरी तरह मिट्टी से बनी है और अब खराब हालत में है. संकरी सीढ़ी आपको गुफानुमा कमरों में ले जाती है, ये कमरे एक सदी पुराने थे.इन्हे देखना वकई बहुत शानदार अनुभव था. सफर की सारी थकान गायब थी, हर बार की तरह यहां भी मुझे लामा जी कि चाय नसीब हो गई. पूरी मोंनेस्ट्री का भ्रमण करने के बाद मेरी नजर बार बार घड़ी पर जा रही थी. अब मुझे किब्बर के लिए निकलना था जो यहां से कोई 8 किलोमीटर था. ये वैली ऑफ याक ब्रीड के नाम से भी जानी जाती है, याक यहां का मुख्य पशु है जो नर होता है, और डुमो (Dzomo ) मादा होती है. कीब्बर वन्य जीव अभयारण्य भी है यहाँ वो ही जीव मिलते हैं जिनका मैंने ऊपर उल्लेख किया है. कीब्बर बड़ा गाँव है. और टुरिस्म के मामले में हिमाचल से सीखना चाहिए. हर घर में होम स्टे, होटल जितना खर्च भी नहीं और अच्छी कमाई अलग से, लेकिन इन सबके बीच हिमाचल के लोगों की मेहनत है, ऐसे नहीं होम स्टे मे सारी सुविधा मिल जा रही हैं इस इलाके मे रतन जोत नाम की एक जड़ी होती है जिसे सर मे लगाने से बाल नहीं झड़ते,और वो बालों को काला करने के कम भी आती है  ऐसा इस इलाके मे प्रचलित है.

इस गाँव से होकर चीचम के लिए रास्ता जाता है, पूरा रास्ता बर्फीला है, हवा ऐसे चल रही है जैसे कोई चाकू से गाल चीर रहा हो, मानना पड़ेगा कितनी टफ कंडिशन मे भी ये लोग अपनी जड़ों से जुड़े हैं, अपने कल्चर मे रमे हैं और उसे आगे बढ़ा रहे हैं. तीन किलोमीटर चलने पर चीचम का पुल आता है ये पिछले साल 2017 मे बना है और क्या गजब बना है, कुल 120 मीटर ऊंचा ये पुल इंजिनियरिंग का गजब नमूना है, ये सस्पेंशन ब्रिज है. इसे एशिया का सबसे ऊंचे पुल का खिताब हासिल है. इस ब्रिज को देखने के बाद मैं काज़ा की तरफ दौड़ पड़ा क्यूंकि बज रहे थे 4.30 और बर्फीली हवाओं ने खतरनाक मौसम कर दिया था, मौसम कभी भी बिगड़ सकता था और मैं उसमे फंस सकता था और इस रिमोट लोकेशन मे पूछने वाला कोई ना था.

तो जल्दी गाड़ी भगाते हुए 5.30 पर मैं काज़ा पहुच गया. और आज का दिन एक यादगार बन गया. पहले हमने दुनिया के सबसे ऊंचे पेट्रोल पंप से पेट्रोल भराया, फिर हम दुनिया के सबसे ऊंचे पोस्ट ऑफिस पर गए, फिर हम दुनिया के सबसे ऊंचे गाँव जो सड़क से जुड़ा है वहां गए. तो बोलने मे ये कतई गर्व करने जैसी फीलिंग दे रहा है. अब कल काज़ा से रेकोंग पीओ के लिए निकलूंगा, इस बीच तीन दिन से नेटवर्क से भी कटा रहा.

 

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