यंगिस्तान

ऑडियो – रेड दे हिमालय स्टोरी

दिसंबर 10, 2018 ओये बांगड़ू

लक्ष्मण सिंह देव हाल ही में  रेड दे हिमालय रेस में हिस्सा लेने पहुंचें थे उन्होंने ओएबांगड़ू के साथ बेहद दिलचस्प एक्सपीरियंस शेयर किया है सुनने के लिए यहाँ क्लिक करे और पढने के लिए नीचे स्क्रोल करें   

 

जब कारगिल का युद्ध चल रहा था उस समय भारतीय सेना ने एक आपातकालीन मार्ग कारगिल के सांखू गाँव से होते हुए द्रास तक बनाया था क्योंकि कारगिल से द्रास का मुख्य मार्ग पाकिस्तान की सीमा के बहुत पास से गुजरता है .कहीं कहीं शायद यह दूरी मात्र १ किलोमीटर और कुछ बिन्दुओ पर शायद दो सौ -चार सौ मीटर होगी.उस मार्ग पर पाकिस्तानी आराम से फायर कर सकते थे इसलिए यह वैकल्पिक मार्ग बनाया गया .यह मार्ग एकदम कच्चा है और पत्थरो से भरा हुआ है. सत्तर किलोमीटर का यह मार्ग बहुत बुरी हालत में है इसका मात्र दस किलोमीटर का हिस्सा तारकोल वाला है . तीसरे दिन की रेड दे हिमालय रेस इसी मार्ग पर हुयी .पहले नियत समय में सत्तर किलोमीटर कारगिल से सांखू तक जाना था उसके बाद वहां से ६५ किलोमीटर की रेस थी .एक दिन पहले रंगदूम से पार्चिक वाली स्टेज में मेरी गति बहुत अच्छी रही थी आज मैं बेहतर प्रदर्शन करने के लिए उत्साहित था .

रेस शुरू हुयी, मैं अपनी मोटरसाईकल Hero extreme 200r की भरपूर गति का प्रयोग कर रहा था। यह रास्ता १३ हजार फिट तक की ऊंचाई से गुजरता है इसलिए साधरण कार्ब्युटर वाली मेरी मोटरसाइकल गति नहीं पकड़ रही थी , उस रास्ते में जगह जगह बर्फ थी .मैं २ बार गिरा -लेकिन बॉडी आर्मर के कारण चोट नहीं लगी .एक बार जब पहाड़ से नीचे तलहटी में आया तो ऑक्सीजन की प्रचुरता के कारण गति कुछ ठीक हो गयी .एक सड़क पर रोड़े पड़े हुए थे .एकदम नुकीले ,उस पर मैंने भगानी शुरू की लगभग एक किलोमीटर बाद महसूस हुआ कि पंचर हो गया .बाकी की रेस तीस किलोमीटर पंचर में पूरी की। और मैं सबसे पिछड़ गया.उसके बाद स्टेज समाप्ति स्थल से सात किलोमीटर दूर द्रास पहुँच गया और पंचर वाला ढूंढा -२ पंचर लगाने वाले मिले तो उन्होंने बोला कि पंचर तो लग जायेगा लेकिन पहिया नहीं खोल पाएंगे.मेरे पास कारगिल जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था जो वहां से लगभग पचपन किलोमीटर दूर है , द्रास के बाहर एक दूकान दिखी .एक मिस्त्री फोजियो के ट्रक का पहिया ठीक कर रहा था ,मैंने उससे पूछा कि क्या मेरी कुछ मदद संभव है उसने कहा कोशिश करता हूँ .वो ट्रक के पहिये का मिस्त्री था लेकिन उसने पहिया खोल दिया और एक जगह से मुझसे ट्यूब मंगवाई .मैं दिल्ली से एकदम नया ट्यूबलेस टायर लगवा के चला था लेकिन रामबन जम्मू के पास उसमे पेंचकस घुस गया इसलिए ट्यूब डालना मज़बूरी हो गयी थी,श्रीनगर ,लेह में टायर भी नहीं मिला .इसलिए मज़बूरी हो गयी और मेरे साथ मेरी कोई सर्विस टीम भी नहीं थी इसलिए मैं लोकल मिस्त्रियो पर आश्रित था. उसने एक छोटे साइज की ट्यूब डाल दी .

उसके बाद मैं २८० किलोमीटर चल के लगभग ५ घंटे में लेह आ गया क्योंकि कल की आखरी स्टेज लेह से ही शुरू होनी थी.अगले दिन सत्तर किलोमीटर दूर लेह -मनाली राष्ट्रीय राजमार्ग पर ४५ किलोमीटर की रेस होनी थी .जो साढ़े सत्रह हजार फ़ीट की ऊंचाई तक था .अगले दिन लेह से लगभग चालीस किलोमीटर दूर उपसि नामक गाँव से कुछ आगे दोबारा पंचर हो गया .पांच किलोमीटर वापस पंचर में चला के उपसि आया और लोगो से पूछा कि कोई पंचर वाला है क्या -लोगो ने बताया कि पुलिस थाने के सामने पंचर वाले का घर है , सुबह के आठ बजे कौन दूकान खोलता है ?दरवाजा खटखटाया -पंचर वाला नींद से उठ के आया -मैंने उससे कहा कि ट्यूब डालनी है .पांचसौ रूपये दूंगा तुरंत चलो,वो तुरंत मेरे साथ आया और लगभग चालीस मिनट लगे और सही साइज की ट्यूब फिट कर दी .उसने बताया कि क्योंकि टायर में छोटे साइज की ट्यूब थी इसलिए यह फट गयी .ट्यूब में लगभग आठ इंच का चीरा सा लगा हुआ था .उसने ट्यूब डाल दी .हवा भरी उसके बाद मैं तुरंत रुम्त्से की तरफ चल पड़ा जहाँ से उस दिन की रेस शुरू होनी थी -मैं सबसे आखरी था इसलिए अकेले ढूढंते ढूंढते रुम्त्से पहुचं गया .तेज़ी से जा रहा था एक रंबल स्ट्रेप कुदाया तो गद्दी निकल कर गिर पड़ी .

रेस शुरू होने के अपने समय से मैं ३५ मिनट लेट पहुंचा लेकिन एक आशा थी कि आज आखिरी दिन है आज अगर रेस पूरी ली तो एक उपलब्धि होगी .दस किलोमीटर चलते ही तापमान में गिरावट आयी .हाथ जम गए .मैं गलत दस्ताने लेकर चला था,जो इतनी ठंड में बेकार हो गए।-[मुझे बाद में पता चला वहां तापमान माईन्स 17 था .गाडी चालीस से ऊपर जा ही नहीं रही थी .दुनिया की दूसरी सबसे ऊँची सड़क थी -taanglaangla पास 17500 फिट। नीचे उतरने पर नब्बे तक गयी .लेकिन मैंने रेस पूरी कर ली .इस रेस के लिए 45 किलोमीटर हाइवे के भाग को सामान्य ट्रैफिक के लिए बन्द किया गया था।हिमालयन मोटरस्पोर्ट्स के लिए ये बड़ी उपलब्धि है.बहुत संतोष हुआ ,क्योंकि मैं साधारण कारबुरेटर वाली मोटरसाईकल Hero extreme 200r चला रहा था .मैं अकेला ऐसा वयक्ति था जो 1555 किलोमीटर मोटरसाईकल चला के इस रेस में आया था .बाकी जयादातर लोग ट्रक से अपने वाहन लेकर आये थे या कम दूरी तक नजदीकी रेलवे हेड से चलाकर . मेरा यह पहला मोटरस्पोर्ट्स इवेंट था .जो मैंने देखा था और भाग भी लिया .तकनीकी जानकारी के अभाव के कारण मैंने यह रेस पूरी की . बेहतरीन राइडर मिले ,दोस्त बने,शरीर से वसा घटी और कुछ टिप्स मिले .मैं धन्यवाद प्रेषित चाहता हूँ रेस के ऑर्गनाइजर श्री विजय परमार एवं उनकी टीम का .मेरे दोस्त अशोक का जिसने मुझे आर्थिक सहायता प्रदान की .मेरे jnu के सीनियर विक्रांत शर्मा जी का। मारूफ भाटी ,रोबिल अंसारी ,नौशीन आरा , परवेज अहमद खान , कुलभूषण कांत पोखरियाल ,धीरज त्रिपाठी जी। मुस्ताक शाह एवं अजीज का। जिन्होंने मुझे विभिन्न प्रकार से सहायता प्रदान की.

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