गंभीर अड्डा

आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक दलदल के बीच हिंदी

अक्टूबर 6, 2017 ओये बांगड़ू

कह दो दुनियावालों से गांधी अंग्रेजी भूल चुका  है … आजादी के बाद बीबीसी में दिए गए वक्तव्य में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा कहे ये शब्द आजादी के बाद गांधी जी के मानस पुत्रों ने विस्मृत कर दिए |गांधी जी के संदेशों को पूरे भारत में प्रचारित-प्रसारित किया गया लेकिन राष्ट्रपिता की हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने की इच्छा राजनीतिक गलियारों तक सीमित रह गयी|आजाद भारत में अपने ही लोगों में हिंदी भाषा गुलाम बनकर रह गयी | हिंदी हमारी अस्मिता की प्रतीक है|हिन्दी 150 वर्षों के औपनिवेशक शासन के विरोध में उदयमान भारत को स्वाधीनता दिलाने में अपना प्राणोत्सर्ग  करने वाले उन करोड़ों व्यक्तित्वों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का माध्यम है जिन्होंने हिंदी को ही स्वाधीनता आन्दोलन की भाषा बनाया था |

हमारे दैनिक जीवन में अंग्रेजी पिछले दरवाजे से बहुत पहले ही घुसपैठ कर चुकी है | आज कई उदाहरण ऐसे देखे जा सकते हैं जहाँ समाज का एक तबका अंग्रेजी की इन्द्रधनुषीय सीढी इसलिए चढ़ता है कि उसको अंग्रेजी को अंगीकार करने में अपना सामाजिक स्टेटस बढता हुआ दिखाई देता है| यदि यह तबका हिंदी के महत्व को अपने स्टेटस से जोड़ने की कोशिश करे तो वह समझ जाएगा कि हिंदी भाषा एक पूर्णतः वैज्ञानिक भाषा है जिसमें जैसा उच्चारण है वैसा ही लिखा जाता है | ढाई से तीन लाख शब्दों के भण्डार को हिंदी भाषा अपने में समेटे हुए है | विश्वभाषा होते हुए भी आज हिंदी भाषा हीन भावना से ग्रसित है | आज विश्व के सभी देशों में हिंदी बोली जाती है | हिंदी में प्रकाशित होने वाली पत्र पत्रिकाओं की संख्या सर्वाधिक है |

अंग्रेज कवि स्पेंडर ने कहा था–दुनिया की सबसे समृद्ध भाषा होते हुए भी भारत के लोग अंग्रेजी के पीछे क्यों पड़े हैं ? इसका एक जवाब था–रोजगार | भूमंडलीकरण के बाद हवाहवाई बातों का जो दौर चला उसमे एक प्रमुख हवाहवाई बात थी रोजगार के लिए अंग्रेजी की आवश्यकता और कहीं न कहीं इसके लिए पाश्चात्य देशों की वह सोच काम कर रही थी जिन्हें यहाँ आकर व्यापार करना था | उन्होंने अपनी सुविधानुसार देश की सोच को बदलने का प्रयास किया | भूमंडलीकरण के इतने साल बाद भी इस अंग्रेजी ने वास्तव में क्या हमको रोजगार दिया ? क्या किसान को मजदूर में तब्दील होने से रोक  पाया ? देखिये, बात स्पष्ट है पूर्वाग्रह के आधार पर बातें करने का जमाना लद गया है और शायद भारत सरकार द्वारा प्रकाशित आर्थिक सर्वेक्षण भी इसकी ही एक बानगी प्रस्तुत करता है, इसमें उल्लेखित है कि वर्तमान भारत को दो भागों में देखा जा सकता है | प्रथम ऐसे राज्य जहाँ विकास का उच्च स्तर प्राप्त किया जा चूका है लेकिन जहाँ युवा जनसंख्या तेजी से कम हो रही है  | इन राज्यों में तमिलनाडु,कर्नाटक,बंगाल आदि शामिल हैं | वहीँ दूसरे वो राज्य जहाँ विकास का अभी पदार्पण हुआ है और जहाँ की अधिकाँश जनसँख्या युवा है | यह हिंदी के लिए एक अच्छा संकेत है क्योंकि हिंदी भाषी राज्य दूसरी श्रेणी में आते हैं |

आज भारत में आने वाला प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रायः दक्कन क्षेत्र तक सीमित है | ऐसे में बदलते भारत के तस्वीर हिंदी भाषी राज्यों पर निर्भर करेगी, इसमें कोई दो मत नहीं | ध्यातव्य है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का नाममात्र इन राज्यों में आता है लेकिन जिस तरह की जनसांख्यकी लाभ इन राज्यों को भविष्य में मिलने वाला है ऐसे में हिंदी भाषा को व्यापार की भाषा के रूप में अपनाकर ये राज्य समावेशी विकास की अवधारणा में खरे उतर सकते हैं |अगर हम विदेश की भाषा अंग्रेजी से इतने प्रेरित है, तो क्यों हम चीन, जापान जैसे विकसित और अत्यंत संपन्न देशों से प्रेरणा नहीं लेते हैं? जहाँ लोग केवल और केवल अपनी भाषा में बात करते हैं और किसी भी मामले में किसी अन्य देश से अपने आपको पिछड़ा महसूस नहीं करते| इन देशों में ना केवल लोग बल्कि इनके जन प्रतिनिधि भी विश्व के किसी भी मंच से अपनी भाषा में ही बात करते हैं तथा अन्य देशों से संवाद करते हैं| अन्य देशों से चीन, जापान में जाकर रोजगार पाने वाले लोगों के लिए इन देशों की भाषा सीखना अनिवार्य होता है, क्यूंकि वे लोग अंगेजी को बैसाखी बनाकर नहीं जी रहे हैं| जिसे इन देशों से व्यापार, व्यवसाय या अन्य सम्बन्ध रखने हों, वो स्वयं द्विभाषक व्यक्तियों या अन्य यंत्रों के माध्यम से इनकी भाषा समझकर अपना अर्थ सिद्ध करते हैं| आज भारत विश्व पटल पर निवेश और व्यापार के प्रयोजन से अत्यंत महत्वपूर्ण देश बन चुका है| गुणवत्ता, मूल्य, और उपलब्धता का संगम जब हिंदी  भाषा के साथ होगा और यदि हम भी यही सोच और नीति अपनाएंगे  तो हम ना केवल अपने देश बल्कि अन्य देशों के लोगों को भी हिन्दी सीखने, समझने के लिए बाध्य कर सकते हैं|

लोकतान्त्रिक भारत के तीन आधार स्तंभों की बात करें जो कि व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका हैं तो हम पाते हैं भारत में विधानसभा और संसद में खड़े होकर अधिकाँश विधायक और सांसद अंग्रेजी भाषण पढ़ते हैं| बात भाषण की नहीं है बात है उसके सम्प्रेषण की | हिन्दी या अपनी मूल भाषा में बोलने वाले जन प्रतिनिधियों की संख्या बहुत ही कम है जबकि ये प्रतिनिधि जिस जनता द्वारा चुने गए हैं, उनमें से अधिकाँश की भाषा हिन्दी ही है| अगर न्यायपालिका की ओर देखें, तो यहाँ भी इस भाषा को दोयम दर्जा ही प्राप्त है | हाल ही में, बिहार में हाईकोर्ट ने हिंदी में सुनवाई करने से मना कर दिया जबकि संविधान में उच्च न्यायालयों में हिंदी के उपयोग का प्रावधान किया गया है, साथ ही राजभाषा अधिनियम में भी इसका प्रावधान किया गया है। विडम्बना है कि हिन्दी भाषी देश में उच्च एवं उच्चतम न्यायालय में हिंदी प्रयोग  के बारे में कोई भी चर्चा न मीडिया में है न देश की संसद में | इस तरह क्या भारत फिर से कभी हिन्दीमय हो सकेगा | क्या अभी से विधि सम्बन्धी दस्तावेजों के अनुवाद से लेकर पुस्तकों की उपलब्धता की तरफ प्रयास नहीं करना चाहिए ताकि आने वाले 5-10 वर्षों में राजभाषा हिंदी में भी निर्णय आ सके ?

हिंदी भाषा के लिए भी केंद्र सरकार द्वारा समर्थित योजना बनाये जाने का सही समय अब आ गया है|केंद्र सरकार द्वारा इस सम्बन्ध में पहल की जा चुकी है, ताकि अभी से आने वाले भविष्य के लिए हम तैयार हो पायें | लेकिन, ये तमाम प्रयास निरर्थक साबित होंगे यदि इनको व्यापक जनसमर्थन प्राप्त न हों | भारतीय संस्कृति दिखावटीपन से कोसों दूर है | अंग्रेजी भाषा को सीखने मात्र तक यह सही कहा जा सकता है लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब सामजिक वर्गों की स्थापना भाषा के आधार पर होती है | हाल ही में आई फिल्म “हिंदी मीडियम”इसका प्रमाण है |

आज हिंदी भाषाई क्षेत्र के लोगों ने जिस तरह से हिंदी को अपने से दूर किया है  ऐसे में यदि यह कहा जाए कि हिंदी का विरोध वास्तव में उत्तर भारत में है तो अतिशयोक्ति न होगी | प्रत्येक बाजार के अन्दर मिलने वाले साईनबोर्ड  की बात हो या घरों  में होने वाले मांगलिक कार्यक्रमों के अंगरेजी निमंत्रण पत्र की सभी कुछ में हिंदी का तिरस्कार ही तो है | ऐसे में कैसे यह माना जाए उत्तर भारतीय जमहूरियत हिंदी भाषा की पोषक है ?आज दक्षिण भारत में हिंदी भाषा के साथ किसी तरह का विरोध नहीं दिखता | मद्रास विश्विद्यालय के हिंदी विभाग में हिंदी भाषा पढने वाली छात्र संख्या  इतनी होती है कि बिना माइक के तो बोलना ही सम्भव नहीं | केरल के कोच्ची विश्वविद्यालय में भी कमोबेश यही स्थिति है |आज भी यह संभव है असम के किसी इलाके में आप अंग्रेजी भाषा में बात करेंगे तो शायद वो आपकी मदद न कर पाए लेकिन यदि आप असमिया या हिंदी में बात करेंगे तो आपकी बात को समझा जाता है सम्प्रेषण आसानी से होता है और आप संभावित मदद ले पायें |

सरकार द्वारा समय समय पर ऐसे अनेक कार्यक्रम चलाये गए हैं जिससे हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार एवं क्रियान्वयन हो पाए | भारत सरकार से सम्बद्ध संस्थानों में पिछले 4 सालों के अनुभव के आधार पर मैं यह कहने की स्थिति में जरूर पंहुचा हूँ कि इन संस्थानों में राजभाषा हिंदी को बढाने के लिए कार्य जरूर हो रहे हैं | केवल राजभाषा हिंदी ही नहीं, क्षेत्रीय भाषाओँ के भी समर्थन की गूँज इन संस्थानों द्वारा  किये जाने वाले राजभाषाई कार्य में मिलती है | आज इन संस्थानों के अन्दर स्वायत्त राजभाषा विभाग की स्थापना हो चुकी है | गृह मंत्रालय, भारत सरकार के दिशानिर्देशों के अनुसार विविध कार्यक्रमों को अपने अपने संस्थानों में लागू करवाते ये राजभाषा प्रहरी कहीं न कहीं उच्च प्रबंधन का एवं आम जनमानस का सहयोग अपेक्षित करते हैं और यही वह तार है जो देश की केन्द्रीय सरकार से जुड़ जाता है जिसके ऊपर राजभाषा हिंदी के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी है |

गृह मंत्रालय, भारत सरकार के नेतृत्व एवं मार्गदर्शन में चलायी जा रही हिंदी शिक्षण योजना से जितने कार्मिकों को राजभाषा हिंदी में कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त हुआ है उतने अन्य किसी भी कार्यक्रम से नहीं | ऐसे में हमें आवश्यकता है और भी नए कदम उठाने की | जिस तरह से देश की शीर्ष नेतृत्व द्वारा हिंदी भाषा को बढावा दिया जा रहा है यह उम्मीद की जा सकती है कि हिंदी भाषा अपने उसे गौरव को प्राप्त करेगी जिसपर कभी वह सत्तासीन थी |

भारत सरकार के मार्गदर्शन में सरकारी संस्थानों में राजभाषा की इस पहल को सी.एस.आर से जोड़ा जा सकता है | सामजिक बदलाव में हिंदी भाषा की भूमिका से कोई इंकार नहीं कर सकता | जिस तरह सी.एस.आर कार्यान्वयन में सरकार द्वारा प्रयास किये गए हैं वैसे ही प्रयास राजभाषा के क्षेत्र में भी करने होंगे | वास्तव में कार्यकेन्द्र के अलावा हिंदी भाषा तभी जनमानस में स्थापित होगी जब जनसँख्या के एक बड़े वर्ग के अन्दर इस भाषा के प्रति सम्मान, आकर्षण एवं उपयोगिता को प्रविष्ट कराया जाए और ऐसे में कार्य केन्द्र के बाहर भी निकलने की आवश्यकता आज आन पडी है |

भारत सरकार द्वारा सरकारी संस्थानों के उच्च प्रबंधन को भी प्रेरित एवं प्रोत्साहित करने की आवश्यकता आज सामने है जिससे राजभाषा हिंदी को प्रचारित प्रसारित किया जा सके | यह कहना अतिवादिता नहीं होगा कि सरकारी संस्थानों में प्रोन्नति से लेकर दंडात्मक प्रावधानों की भी आज आवश्यकता है और कम से कम उस भाषाई वर्ग से सम्बंधित व्यक्तियों के लिए तो ये मानदंड होने ही चाहिए जो खुद हिंदी भाषी क्षेत्र से सम्बंधित हैं |

आज भारत में हिंदी भाषा के हिमायती वो लोग हैं जो या तो साहित्य के विद्यार्थी या सरकारी कर्मचारी है | आज भी हमारी अनेक पुस्तकें विश्विद्यालय स्तर पर अंग्रेजी में ही उपलब्ध हैं | उनका हिंदी संस्करण उपलब्ध करवाने सम्बन्धी पहल मानव संसाधन मंत्रालय को करनी चाहिए | 12 वीं के बाद विज्ञान विषय या अभियांत्रिकी को अपनाने वाले छात्रों के लिए हिंदी में मूल पुस्तकें या फिर पुस्तकों के द्विभाषिक रूप को लाने का प्रयास मानव संसाधन विकास मंत्रालय को करना चाहिए |

कहीं न कहीं विश्वविद्यालय स्तर पर भी हिंदी भाषा को उसका यथोचित स्थान दिलाने की जरूरत है | दिल्ली विश्वविद्यालय में अपने अध्ययन के दौरान मुझे यह महसूस हुआ की प्राध्यापकों के स्टाफ रूम से लेकर एंट्री गेट के सिक्यूरिटी गार्ड से संवाद की भाषा धीरे धीरे अंग्रेजी कलेवर को आश्रय देती है और उनकी बातचीत में, इस पूरे व्यवहार में , संवाद  की वो मिठास रहती ही नहीं जो हिंदी में है | जो प्रेम एवं विनम्रता का आग्रह माफ़ करें में है उसका स्थान सॉरी कभी भी नहीं ले सकता | एक और बात जो यहाँ कहनी समीचीन होगी कि हिंदी के भविष्य पर चर्चाएँ, हिंदी से नित नवीन रोजगार के अवसर,  शायद ही इन सब पर मैंने  अपने 10 साल के दिल्ली विश्वविद्यालय प्रवास के दौरान कोई कार्यक्रम देखे हों | पूरा विश्वविद्यालय हिंदी साहित्यकारों की पुनर्व्याख्या करने में लगा है , कविता लेखन की विशेषताएं बताने में लगा है |

विद्वान जनों को साहित्य के कालखंडो पर व्याख्यान देने से हिंदी साहित्य पढने वाले का जरुर फायदा होता है लेकिन वास्तव में हम एक ऐसा अवसर खो देते हैं जिसमें हम हिंदी साहित्य से इतर छात्रों को भी जोड़ सकते थे | ऐसे स्वर्णिम अवसरों में साहित्यिक व्याख्यानों के अतिरिक्त हिंदी भाषा से रोजगार, हिंदी भाषा का बाजार में स्थान जैसे विषयों को भी समाहित करने की नितांत आवश्यकता है जो अन्य विभागों के छात्रों के लिए भी लाभदायक हों | विश्वविद्यालयों के प्राचार्यों को इस सम्बन्ध में संज्ञान लेने की आवश्यकता है | मानव संसाधन-विकास मंत्रालय को इस सम्बन्ध में पहल करनी चाहिए और ऐसे कार्यक्रम चलने चाहिए जिससे विश्वविद्यालय परिसरों में भी हिंदी भाषा को बढावा मिल सके |

सबसे महत्वपूर्ण कदम तो राजनीतिक गलियारों से ही निर्धारित होगा, इसमें कोई दो राय नहीं | माननीय हिंदी को भारत ही नहीं संयुक्त राष्ट्र की भी भाषा के रूप में स्थापित करने में सहायक सिद्ध होंगे इससे इनकार नहीं किया जा सकता | त्रि-भाषी सिद्धांत की मूल आत्मा को जिस तरह विस्मृत कर सियासत की गयी आज भारत को इन सबसे ऊपर उठने की जरुरत है | शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है अतः राज्य सरकारों की भी राजभाषा हिंदी को बढावा देने में अहम भूमिका होगी | अतः आज के भारत को चाहिए की “टीम इंडिया” भारत की इस सर्वाधिक जनव्यापी भाषा को अपने कार्यों की भाषा बनाये तभी जगतगुरु के पद पर वास्तविक रूप से हम पदासीन होंगे |

पंडित दीन दयाल उपाध्याय जी ने कहा था –भारत की सभी समस्याओं का मूल राष्ट्रीय पहचान की उपेक्षा है |मुझे उम्मीद है मूल रूप से सबका साथ सबका विकास की अवधारणा देने वाले दींन दयाल जी के इन विचारों पर भी मंथन होगा और हम भारत को विकसित भारत बनाने में हिंदी भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित कर पाएंगे|

लेखक पिथौरागढ़, उत्तराखंड के रहने वाले जय प्रकाश पाण्डेय वर्तमान में ओएनजीसी जोरहाट में राजभाषा अधिकारी के पद पर हैं. जय ने हिंदी को करीब से न केवल देखा है बल्कि हिंदी को जिया भी है इसलिये हिंदी भाषा की स्थिति पर लिखने के लिए किसी दिवस विशेष के इंतज़ार में रहे बिना हिंदी भाषा की स्थिति पर लिखा भी है.  

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