यंगिस्तान

अपनी माटी अपना बचपन -7

जून 9, 2017 ओये बांगड़ू

डाक्टर अनिल कार्की कवि हैं लेखक हैं और पहाड़ का मर्म समझने वाले पहाडी हैं, अपने आस पास के ठेठ पहाडी पन को बड़ी ख़ूबसूरती से शब्दों में पिरोते हैं और देश विदेश में बैठे पहाड़ियों को वो फील करवा देते हैं जो वो पहाड़ में रखकर भूल गए हैं. इनके लेखनी के जादू की ये संस्मरण वाली सातवीं किश्त है ‘वे अद्भुद लोग थे।’

लेखक डाक्टर अनिल कार्की

हर समाज में प्रकृति के साथ मनुष्य के संबन्ध को लेकर तरह तरह के किस्से हैं। जिसमें मौसम संबन्धी, जानवरों संबन्धी, पंछीयों संबन्धी मान्यतायें होती हैं। यानि कि प्रकृति के स्वभाव को पढ़ने जैसी कुछ कलायें या जादू या रहस्य । जानवरो, पंछीयों, पेड़-पौधों, कीड़ों-मकौड़ों, चन्द्र-सूरज के स्वभाव और उनके बदलाव को देखते हुए फसलों, व मौसम का अनुमान लगाना, या प्राकृतिक आपदाओं का अनुमान लगाने जैसी मान्यताएं हर आदिम समाज में होती हैं। संकीर्णताएं हर जगह होती हैं और विशालतायें भी। मेरे पास हिमालयी टोटकों और आदिममंत्रों पर बहुत कुछ है जिनपर कभी रोचक बातें रखूँगा। आज मैं ऐसे पूर्वानुमानों पर बात करना चाहता हूँ जो पहाड़ में मौसम को लेकर लगाये जाते हैं। अपनी बात रखूँ इससे पहले चाहता हूँ कि ’अन्स्र्ट फिसर’ की यह पंक्तियाँ एक बार जरूर पढ़ ली जाय ये उनकी पुस्तक कला की जरूरत से ली गई हैं।
“आदिम मनुष्यों के अंधविस्वासों अथवा प्रकृतिक को वश में करने के उसके ऊपायों पर व्यंग्यपूर्वक मुस्कुराना बहुत गलत होगा। भले ही ये ऊपाय उसने अनुकरण के जरिये। तादात्मय के जरीये। बिम्बों और भाषा के जरिये । सामुहिक लयात्मक गतियों के जरिये अथवा ऐसी ही अन्य चीजों के जरिये किये हों । चूंकि उसने प्रकृति के नियमों का पालन करना, कारण और परिणामों के संबन्ध खोजना, सामाजिक संकेतों, शब्दों, धारणाओं और परिपाटियों वाले एक सचेत संसार का निमार्ण अभी शुरू ही किया था। इसीलिये स्वाभाविक था कि वह असंख्य मिथ्या निष्कर्षों पर पहुँचा। साम्यानुमान से दिगभ्रमित होने के कारण उसके मन में बहुत से ऐसे भाव उत्पन्न हुए, जो मूलतः गलत थे। उनमें से बहुत से भाव आज तक हमारी भाषा और दर्शन में किसी न किसी रूप में सुरक्षित है ।“
पहला किस्सा ’भैंचाल्’ (भूकम्प) को लेकर। बचपन में भूकम्प के बारे में जो धाराणा हम लोगों ने सुनी वह बड़ी रोचक थी। पुराने पहाड़ के लोगों में अजीब धारणा थी आज जब उस धारणा के पाठ को समझने की कोशिश करता हूँ तो कुछ और ही समझ में आता है। भूकम्प हमारे बुजुर्गों के लिये भूगर्भीक संरचना में हलचल नहीं थी जो कि सरासर गलत है । पर भूकम्प को लेकर उनकी धारणा बेहद डरवानी और थी होरर किस्म की। वैसे सभी आदिम समाजों में भूकम्प को लेकर ऐसी ही धारणा अमूमन देखने को मिलती है। पूराने पहाड़ का मनना था कि यह धरती किसी विशालकाय पंछीनुमा गुस्सैल और खतरनाक जीव पर टीकी है कहीं यह भी कहा जाता कि धरती मूँछ वाली भयानक अधमछली (आधी मछली आधी मनुष्य) पर टीकी है। जो कभी गुस्से से अपने मूछों के बाल भी हिला देती है तो तबाही हो जाती है । मैंने बचपन में कई बुजुर्गों से इस जीव की रोचक वर्णन सुने थे। हाँलाकि सभी की कथाएं अलग-अलग लहजे से होती थी। पर एक बात का साम्य जो सबमें था वह था धरती का किसी विशालकाय जीव पर टिका होना। मैंने एक बार एक बुजुर्ग से पूछा था, “बूबू (दादा) ये जम्बाधूत (विशाल मजबूत) जीव हमसे गुस्सा क्यों रहता है।” तब उन्होेंने मुझे बताया था, “नाती! जब लोग धरती से बुरा बर्ताव करते हैं उसे गंदगी से भर देते हैं । तो यह जीव नाराज हो जाता है और गुस्से से काँपने लगता है। इससे एक बात का तो साफ पता चली कि शेषनाग के फन पर धरती टिके होने के मिथक से अलग पहाड़ के पास एक भिन्न मिथक था जिस पर शेषनाग बाद में लाद दिया गया होगा । हमें इससे क्या फर्क पड़ता हैं लाद तो हमारे पहाड़ में क्या क्या दिया और हम चूँ तक नहीं बोले ये तो मामूली और मिथ्या मिथकों की बात जो ठहरी। मैंने बूबू से पूछा, बूबू भैंचाले (भूकम्प) के आने का पता कैसे लगता है । बूबू ने बताना शूरू किया, “वह मनुष्यों से चिढ़ता है। उन्हें कोई संकेत नहीं देता, उन्हें नहीं बताता कि मैं गुस्सा हूँ क्योंकी पंछी-पौंधें कभी धरती का नुक्सान नहीं इसलिये वह उनको ही यह बात बताता है। हम मैंस अदिम (मनुष्य-इंसान) इसको नुक्सान करते है।” फिर एक जोरदार ठहाका लगा के बोले कि कोठ् (दिमाग) तो मैंस (मनुष्य) ने ही पाया है वह समझ लेता कि भैंचाल (भूकम्प) आने वाला है। मैने बूबू से जोर देकर कहा, “पर समझता कैसे है बूबू।” तब बूबू ने बताया, “जब भी भैंचाल आने को होता है वह पंछीयों जानवरों ,कुत्तों, जीवों, चीटीयों को सचेत कर देता है। मेरे प्यारे जीवो! तुम किसी सुरक्षित स्थान की तरफ चले जाओ। यह सुनकर पंछी अपने सांझ के रहवास छोड़ हपड़ तपड़ हो हल्ला करते हुए भागने लगते हैं। मूसे अपने मूशैलों से पंक्तिबद्व हो भागने लगते हैं। कुत्ते अपने मालिकों के सामने अजीब तरीके से भौकतें हैं और अपनी जंजीरें तोड़ के भागने लगते है। गाय-बैल-भैसें अजीब स्वरों में रम्भाने लगती है और अपनी खूँटीयों से गल्यूँ (रस्सा) तोड़ भागने लगती है। बकरियाँ मिमियाने लगती है, बिल्ली चूल्हा छोड़ के भाग जाती है। चिटीयाँ कतारबद्ध भागने लगतीं है। यह सब देखकर मैस समझ जाते हैं कि पक्का भैंचाल आने वाले हैं।” उनका वर्णन इतना रोचक था कि वे ध्वनियाँ निकाल के बताते लगे कि उस वक्त वे सब कैसी आवाजें करते हैं। उसे लिख पाना काश सम्भव हो पाता । पर लम्बे अरसे बाद कहीं पढ़ा था कि जानवरों के व्यहार अध्ययन (ऐनिमल बेहेवीयर) से अपदाओं का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। जैसे कि पानी का जहाज के डूबने से पहले चूहों की चहलकदमी कर इधर उधर भागना।
मैंने सन् 1996 की आपदा को अपनी आँखों से देखा था। उस समय में अपने घर से लगभग छः किलोमीटर पैदल अपने जीजा के स्कूल में पढ़ने जाया करता था। उन दिनों प्रकृति के एक अलग और अनजाने भय से परिचय हुआ। पहाड़ों में बरसातों में कई दिन तक पड़ने वाली झमाझम बरखा को ’झड़’ (गिरना) कहते हैं। कहा जाता है कि झड़ जब शुरू होता है तो कमसेकम सात दिन तो अनवरत रहता ही है। इसी दौरान पहाड़ खिसकते हैं जिन्हें ’पैर पड़ना’ (लैंडस्लइड) कहा जाता है। पर हमारे पहाड़ के लिये बरसात भी किसी रोचक मौसम की ही तरह है। जैसे जायसी का ’चढ़ा अषाढ़ गगन घन गाजा’ हम पहाड़ी उसे रोचक ढ़ंग से जीते हैं। उन्हीं झड़ों में जब रोल (मोटी धारासार) बरस रहे होते हैं। तब पहले पहाड़ में झड़पातई या झड़पातलि मनाने का रिवाज था। इस घर के लोग उस घर वालों से पूछते थे “आज क्या झड़पातलि मना रहे हो?” उस समय पहाड़ में कई तरहों के चबेने-खाजे-गेड़े बनाने का चलन था। कभी भट्ट भूने जाते, कभी मक्के और कभी चिनभुरा के सिरौले (पूरे धान को भिगो के भून के उनके चाँवल) उनको चबाते हुए दान (जहाँ भैसें बाँधी जाती थी) या चाख (भीतर का बरामदा) में मक्के उधाड़ने का काम अनवरत चलता रहता। बीच में काम करते हुए घर के बूढ़े एकआध छेड़ देते। या काम के बीच में गिलास भर चहा और ’हल्लू’ (हलवा) या ’सया’ भी बन जाता था। हम बच्चे लोग भी किसी किसी समय बड़े लोगों का हाथ बँटा दिया करते थे। हमारा मन लगा रहे इसलिये वे कथायें और किस्से सुनाते। जब हम कथा किस्सों से ऊब जाते तो । प्रकृति से सीधे लड़ने को तैयार हो जाते । घर के बूढ़े हमें बारिश रोकने के तरह-तरह के तरीके बताया करते थे। उनमें जो सबसे आशान तरीका था वह था काले कुत्ते के कान में सरसों का तेल डालने का। गाँव के कुत्ते शहरी कुत्तों की तरह मनुष्य से ज्यादा खुशकिस्मत नहीं होते न ही वे किसी एक के मवासे के होते है। उन्हें तो गाँव सम्भालना होता हैं। हमारे गाँव में ऐसा ही एक तिब्बती कुत्ता था, झबरू। हम सब बच्चे गाँव भर में उसे ढूँढ़ने को दौड़ते, जो पहले उसे बुला के लाता वह ज्यादा दमदार बच्चा माना जाता था। सारे बच्चे उस भयानक पर स्नेहिल झबरू को घेर के कहते अब, “तू ही झड़ (लम्बी बरसात) रोकेगा। झबरू को लिटाया जाता वह पूँछ हिलाता हुआ हमारे सामने लेट जाता । हम से कोई उसके कान में दो बूँद सरसों का तेल तप्प तप्प से डाल देता। झबरू में कोई प्रतिक्रिया नहीं होती थी वह उल्टा कान में गुदगुदी महसूस करता हुआ रंगत में आकर हमारे साथ खेलने लगता । हम बारिश का रूकने का इन्तजार करते पर सरग का क्या खोच लोगे? वह हमारे टोटकों से कहाँ मानता उल्टा हमें झबरू के साथ खेलना पड़ता। तरीकीबें अजब-गज्जब थी सरग से पंगा, वह भी बड़ा बचकाना सा। आज जानता हूँ केवल सरलमना लोग ही ऐसा पंगा सरग (स्वर्ग) से कर सकते हैं। आस-पड़ोस के महिलायें बरखा से परेशान हो गर्म तवा बन्धार (जहाँ पर छत का पानी गिरता है) के पास उल्टा कर देती। उसमें बूँदे जब गिरती तो अजीब सी ध्वनि होती। कोई पड़ोस के भाभी अपना झाड़ू सरग की ओर खड़ा कर देती कि बारिश रूके। हम लोग बारिश में उफनाए नदी-नाले देखने को दौड़ पड़ते। एक बार एक गज्जब की तरकीब आमा ने सिखाई। मुझे, निहायत दर्जे का बकैत और फसकबाज़ मेरी नानी और पड़ोस की आमा ने बनाया । हमारे गाँव में पाँच दिन से लगातार बारिश पड़ रही थी। सारे टोटके कर दिये थे । तभी आमा ने बताया कि नाती ’भेक्तोकिल्तुड़ हाल्’ यानि कि कहीं से मेढ़क ला और उसका पेट आसमान की तरफ करके उसके चारों पैर चार छोटे से खूटों पर बाँध दे । हम सब बच्चे लगे मेंढ़क ढूँढ़ने, बड़ा सा बरसाती मेढ़क पकड़ा गया उसका पेट आसमान की तरफ लगा के बाँध दिया गया। आमा शक्त हिदायत थी कि वह मरना नहीं चाहिए। अगर मर गया तो बारिश दुगनी हो जायेगी। इसलिये यह सब सावधानी से करना था। आमा कि तरकीब के अनुसार हमने मेंढ़क को बाँध दिया। मेंढ़क का पेट आसमान की तरफ था और मुँह खुल हुआ । ऐसा लगा जैसे वह फूल के गुब्बारा सा हो गया हो । हम एक नजर उसे देखते एक नजर बरसते आसमान को। पर बारिश कहाँ रूकती, दरअसल बुजुर्गों की यह तरकीबें बच्चों को किसी न किसी काम में उलझाये रखने की थी। लम्बे झड़ों (बरसातों) का अन्दाजा बुजुर्ग अजब-गज्जब ढ़ंग से लगाया करते थे। यदी बारिश के बूँदों के जमीन पर गिरते ही छोटे से गुब्बारे बनते थे तो वे कहते बारिश लम्बी पड़ेगी । या कि गोरैया मिट्टी में खूब लोटपोट हो घुरघुत्ती खेलती तो कहते बरखा आने वाली है। ऐसे सैकड़ों तरीके थे । खेतों को में कब बीज बोना है कब अनाज काटना है गाँव वालों को सब पता था । पहाड़ में हरियाली का त्यौहार हरेला इसी का जीवन्त उदाहरण है। यहाँ तक कि वे कई बार सटीक पूर्वानुमान लगाने में लाजबाव थे। ऐसा ही एक पूर्वानुमान होता था बरखा के बाद का जब इन्द्रधनुष बनता था तो बुजुर्ग उसे ध्यान से देखते। अगर इन्द्रधनुष का एक शिरा पहाड़ों के ऊपर खत्म हो रहा होता तो वे अनुमान लगा लेते कि अब कुछ दिनों बरखा नहीं होगी, अगर इन्द्रधनुष का शिरा नदी या गाड़-गधेरे में खत्म होता तो कहते कि अब बरखा होगी। कभी-कभी उनके पूर्वानुमान बहुत सटीक होते तो कभी गलत भी। खेतों की जुताई को लेकर वे खेतों की नमी से अंदाजा लगाते कि क्या बीज बोने का समय ठीक है या नहीं? बीज अकुंरा सकने की नमी को पहाड़ में ’आद‘ कहा जाता। किसी हलवाहे से कोई बुर्जुग पूछता,“आद् छे नै!” मतलब कि नमी है कि नहीं? एक बार पड़ोस की आमा ने कहा था मुझसे कहा था, “जैसे धरती जेठ की तपन में में भी अपने भीतर आद (नमी) बचा के रखती हैं वैसे ही मैस को बेढप दिनों में भी अपने भीतर की ‘आद’ (नमी) को जिन्दा रखना चहिए। इसी तरह शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा के पास बने गोल घेरे से बुजुर्ग अन्दाजा लगाते थे कि आगामी दिनों में बारिस होगी या रूड़ (सूखा) पडे़गा। चन्द्रमा के पास बने वृत्ताकार घेरे को पहाड़ में ’घरबाँधो’ या ’घरबात्’ कहते है। पश्चिम नेपाल के कुछ इलाकों में ’घरबाँडो’ कहा जाता है । यदी यह गोल घेरा चाँद के एक दम पास होता तो माना जाता कि अगले कुछ दिन में बारिश होगी । या यह कुछ निश्चित् दूरी पर होता तो कहते अब रूड़ (लम्बे दिनो के घाम) पड़ेंगे। मेरे ईजा जब भी घरबात् (चन्द्रमा के चोरों ओर वृताकार घेरा) होता मुझे अंगुली लगा के बताया करती थी । हमें बहुत मोसमी गीत पता थे। जैसा मौसम का मिजाज़ वैसे हमारे गीत, कभी कभी वारिश की बौछार के साथ घाम चमकने लगता तो हम गाने लगते –
“घाम द्यो घाम द्यो
स्यालको ब्या
कुकुर बिरालू
बरेति ग्या
हाम् थ्या कूनान
दक्षिणा ल्या”
(घाम पानी घाम पानी सियार का ब्याह
कुत्ते बिल्ली बराती गये।
हमसे बोले दक्षिणा लाओ)
इसे गाते हुए अधभीगे हो इस आँगन से उस आँगन तक फुदकते रहते । यदी बादल धूप का मंद करता तो चिल्लाते-
घाम दीदी इथकै आ
बादल भीना उथकै जा
(घाम दीदी इधर को आजा, अरे ओ! बादल जीजा जरा उधर को खिसक) यह क्या अद्भुद संवाद था सरग और बादल से हमारा। कभी-कभी सोचता हूँ फिर से संवाद करू पर अब नसरग बोलता है न बादल। दुनिया कों संवाद सपन्न बनाने के लिये सूचना के नये साधनों ने विश्व को ग्लोब्लल गाँव में तब्दील तो कर दिया पर यह ऐसा गाँव हो गया है कि जहाँ कोई घर से बाहर निकल कर आँगन तक में भी आना नहीं चाहता। घर के भीतर भी सब के अपने गढ़े हुए संसार है। सरग, पहाड़, बादल, इन्द्रधनुष, झमाझम बारिस से संवाद तो गुजरे जमाने की बात हो गई।

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अपनी माटी अपना बचपन -6

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