यंगिस्तान

आपनी माटी अपना बचपन -4

मई 24, 2017 ओये बांगड़ू

डाक्टर अनिल कार्की कवि हैं लेखक हैं और पहाड़ का मर्म समझने वाले पहाडी हैं, अपने आस पास के ठेठ पहाडी पन को बड़ी ख़ूबसूरती से शब्दों में पिरोते हैं और देश विदेश में बैठे पहाड़ियों को वो फील करवा देते हैं जो वो पहाड़ में रखकर भूल गए हैं. इनके लेखनी के जादू की ये संस्मरण वाली चौथी किश्त है बचपन पर, जो आपको आपका बचपन याद दिलायेगी.इस कड़ी का चौथा पाठ , अगले हप्ते मिलते है नयी स्मृति के साथ ‘पेड़ों से दोस्ती!’

मैंने एक बार अपने भतीजे से कहा कि खेत से मेथी के पत्ते ले आ। वह खेत में तो गया पर काफी देर में लौटा, बिना मेथी के पत्ते लिये । मैने पूछा क्या हुआ तो बोला, “चाचा मुझे पता ही नहीं चलता कि मेथी का पत्ता कैसा होता है।” मुझे बड़ा अजीब सा लगा, सोचा कि कैसे अब बच्चे अपने आस पास पेड़ पौधों से परिचित हों उनसे जुड़ सकें। तब मुझे अपने बचपन के दिन अचानक याद आये। कितने ही घास पात के पेड़ और फलों के पेड़ याद थे और अभी भी हैं। कितने ही पेड़ों के बारे में हमने लोक गीतों और कहावतों में सुना, बल्कि कई बार सुना ही नहीं उनके स्वभाव को भी जाना।
बहुत सरल से कुछ उदाहण दे रहा हूँ। एक बहुत पुरानी कहावत है “सान्ऩ छैं पधान हो क्यो सौ जाग् टेड़ “ पेड़ों ने सानड़ या सानन नाम के सीधे पेड़ का नाम जैसे ही पेड़ों का मुखिया बनने को प्रस्तावित किया तो सानन नाम का पेड़ सौ जगह से टेढ़ा मेढ़ा हो गया। यानि कि वह अदायें दिखाने लगा। सानड़ के पेड़ों की ठेकी का जिक्र लोकगीतों में खूब में आता है। कहते हैं कि उसकी लकड़ी से बने बर्तन की दही के स्वाद का जवाब नहीं (मैने एक बार खाया था)। वैसे पहाड़ में गेठी व ग्वैल, हरड़ के पेड़ों के वर्तन बनाने के जिक्र सार्वाधिक मिलते हैं। वर्तनों के आदिम कारिगर कुमायूँ पहाड़ के बनराजी अदिवासी माने जाते रहे। तथाकथित सर्वणों द्वारा निचली माने जाने वाली जातियाँ भी यह काम करती रही हाँलाकि अब यह कला रही सही हो गयी है।
यहाँ बता दूँ कि सबसे दमदार हुड़क (प्रमुख वाद्य) ग्वैल नाम के पेड़ के गिण्डे से ही बनता है जिसकी प्यांग प्यांग सबसे मोहक होती है। सबसे अच्छी बासूँरी या सीधी मुरुली का ’स्वोर’ झुमरा नाम की एक रिंगाल की प्रजाति की बनती है। इसीलिये ’झुमरा की नली’ का जिक्र लोकगीतो में खूब मिलता है। इसी झुमरे से ’थ्यो’ (जानवरों को दवा पिलाने वाली नली) भी बनती थी। मेरी स्मृतियों में ऐसे ही कुछ पेड़ हैं जिन्हें देखते हुए चट से मै उनका नाम ले लेता हूँ। कई लोगोें का मानना है कि हल्द्वानी का नाम हल्दु नाम के पेड़ों के बहुतायत होने पर हल्द्वानी रखा गया। इस स्मृति को हमारे लोकजीवन ने वर्षों से अपनी मौखिक पंरपरा में सेहेज के रखा।
हल्दानी का हल्दे रूख बानर रूखारी
मन मेरो हंसिया छियो करम दुखारी
(हल्द्वानी के हल्दु के पेड़ में बंन्दर चढ़ बैठा है, साथी मेरा मन तो खूब रंगीला है पर करम में दुख लिखे गये हैं)
एक दूसरे गीतजोड़ में बारिश में टपकते बांज के पेड़ की तुलना रूड़कि में प्रशिक्षण रत सिपाही से किया गया है।
धार का लटुवा बाँज पानि लागो चुनान
रूड़कि का रंगरोटी सिप्या दुख लाग्यो रूनान
(पहाड़ के खूब पत्तेदार बांज के पेड़ बरखा पड़ने पर वैसे ही टपकते हैं जैसे कि दुख लगने पर रूड़कि का प्रशिक्षण रत सिपाही रोता है )
बांज और फल्याँट, कटूँज (इस पर एक चांचरी है सिलगड़ी का पाला चाला कटूँज की गैला) यह पेड़ पहाड़ में कृषि औजारों में प्रयुक्त होने वाले प्रमुख पेड़ हैं। इसके अलवा तुन और अंगु भी प्रमुख हैं । अंगु वही ऐतिहासिक पेड़ है जिसने दुनिया को पार्यावरण का अनोखा आन्दोलन ’चिपको’ दिया। जिसकी अग्रणी भूमिका में पहाड़ की स्त्रीयाँ ही थी। इसी आन्दोलन की अगवा पुरखिन गौरा देबी ने कहा था, “जंगल हमारा माईका” कई एसे पेड़ों का भी जिक्र लोक गीतों में हैं जिनके खत्म होने या बिमार होने के स्वाभव का भी बताया गया है। “सल्लो कूयो जाड़ा बटै, मालू कूयो मुण्डनी” (चीड़ का पेड़ अपनी जड़ों से सड़ के खत्म होता है और मालू सर से।) चीड़ की तेलीय लंकड़ी का छिलुक या छयूल अंधेरी रातों को राँके (मशाल) बनाने के काम आता था, और मालू के पेड़ पर तो जाने कितने ही मोहक लोग गीत है। एक प्रमुख गीत है “पारी भीड़ा कि कोछै घस्यारी? मालू वे तू मालू नी काटा” जीजा साली के संवाद में जीजा कहता है, “पार पहाड़ी भीटे पर कौन तू घस्यारी? सुन, मालू मत काट मालू काटने का पाप लगता है” ऐसे सकैड़ों गीत हम बचपन में ही सीख लेते थे मालू के गहरे भूरे कोसे (फलियों) को हम चुल्हे में डाल के उन्हे जला के उनके भीतर के गूदे को खाते थे या फिर सूखी फलियों के एक कोने में छेद कर एक मजबूत धागे से बाँध उसे यों सर के ऊपर तेजी से चक्राकार घूमाते कि वह वन भवरें सी तेज आवाज करता। मालू बहुत कठोर चट्टानों के आस पास ऊगता है। अल्मोड़े की प्रसिद्ध मिठाई सिंगौड़ी इसी मालू के पत्ते में लिपेटी जाती हैं .
हम लोग खेत जंगलों से लगातार मिलते रहते तो कई पेड़ों के नाम तो यों ही याद हो जाते। पहाड़ में तो कई जगहों के नाम उन पेड़ों के नाम पर ही लिए जाते जैसे जो वहाँ बहुतायत पाये जाते, “पीपलधार” (पीपलवाला पहाड़) “सल्याड़ी” (वह जगह जहाँ चीड़ के पेड़ हों) “बज्याणी” (वह जगह जहाँ बांज के पेड़ हों) “सुरईं धार” (वह पहाड़ जहाँ सुरईं के पेड़ हों) जैसे सैकड़ों नाम अब भी प्रचलन में है। जो किसी समय उस क्षेत्र में उन पेड़ों की बहुलता के आधार पर रखे गये होंगे। वैसे मेरी स्मृतियों इसके अलावा सोंलों (घास के लिये प्रयुक्त पत्तीदार) वाले पेड़ भी हैं जिनमें पहला पेड़ कठमोड़ा । कठमोड़े से दो किस्म की दोस्ती थी एक तो इसके पत्ते भैंस और बकरियों को बहुत ही पसन्द थी और दूसरा यह कठफोड़वे का घर था जिसे हम ’कठकटोर’ कहा करते थे। कठकटोर इसी के तने पर टकटक बाजा लगाया करता था। कठमोड़े के तने पर मुझे एक बार न्यौली का घोंसला भी मिला था। ऐसा ही दूसरा पेड़ है वितर्यानी जो तोतों की पसंद का पेड़ होता उसके तने पर तोते घोंसला बनाया करते है। तोते के घोंसले इसी पेड़ की बदौलत हमने देखे। हम उसके घोसंले को ढ़ूढ़ने इसी पेड़ पर जाते थे। एक पेड़ था ’दामड़ी’ । भैसों में होने वाली चकत्तेदार बीमारी ’दामड़ी’ में इसकी फलियों के गूदे को दिया जाता था। उसकी फलियां विशालकाय चील के पंखों सी होती थी और उसके भीतर का गूदा भी कागज सा ऐसा पटा होता जैसे कि पर्श में करीने से नोट रखे गये हों। हम उसके बीज बिखेर देते और उसके विशालकाय फलियों के छिक्कल अपनी बाहों में बाँध के उड़ने का खेल करते । एक पेड़ था खिनवा जिसे हम अपनी भाषा में ’खन्या’ कहते थे बन अंजीर की प्रजाति तिमुल, उमर, खसटिया, खिनवा, ये एक ही प्रजाति के पेड़ हैं पर स्वभाव अलग अलग हैं एक साधारण अन्तर है तिमुल का पत्ता सबसे चैड़ा जिससे पूडे़ (दोने) बनते है। तिमुल के फल तने पर जहाँ से टहनियाँ निकलती है वहाँ पे लगता है। पकने के बाद पीला रसीला होता है। तिमुल के बारे में कहावत है कि इसका फूल रात बारह बजे खिलता है जो इसका फूल देखता है वह भाग्यवान होता है। ’उमर’ का पत्ता कुछ खुरदुरा होता है। उमर का दाना हल्का लंलक रंग लिये हुए होता है। इसके पत्ते जानवर बहुत चाव से खाते है। और दाने हम लोग, यह तिमुल से कम रसिला होता है पर इसकी महक का जवाब नहीं। इसका एक बड़ा औषधीय प्रयोग होता है, यदि पैर में ’मोच’ आ जाय तो इसेके तने से निकलते लसलसे चोभ को (तने को खरोचने पर निकलने वाला पदार्थ) ’मोच’ वाली जगह पर लगा देते है जिससे कुछ ही दिनों में ’मोच’ ठीक हो जाती है। पूर्व में इसका ’चोभ’ टूटी हड्डियों को जोड़ने के लिये प्रयुक्त किया जाता था, ऐसा वर्णन मिलता है। अब भी गाँव में कई लोग ऐसा करते हैं।
एक बार मेरा हाथ कलाई से फैक्चर हो गया, मेरी बहनें मुझे पिथौरागढ़ के जिला अस्पताल ले गईं। मुझे याद है वहाँ जिस बेरहमही से हड्डी वाले ने मेरी कलाई खींची थी। फिर उस पर पलास्टर बाँधा गया था। उस पलास्टर से ही मुझे घुटन सी होने लगी थी। बड़ी मुशकिल से चार दिन झेला और एक दिन अपनी आमा (नानी) से कहा, “आमा मुझे खुजली लग रही।” आमा ने कहा, “कहीं जुवें तो नहीं हो पनप गये भीतर!” उनका यह कहना था कि खुजली जोर जोर से होने लगी। और कुछ ही पल में मैने आमा से कहा, “आमा, शायद इसमें सच में जुवें पड़ गये।” आमा ने कहा, “काट दे पलास्टर!” दराती फंसा के पलास्टर काट डाला दर्द सह सह के । कलाई में सूजन थी डोलु नाम की एक जड़ी बूटी घिस के लगाई गयी । पिता और बहनें भुनभुनाई, “क्यों काटा ? अब तेरा हाथ सदा के लिये टेढ़ा हो जायेगा।” मैं रोने लगा तो नानी ने कहा, “मैं तुझे ऐसी दवा बता के जाऊँगी तेरा हाथ और सुन्दर हो जायेगा। तू चिन्ता मत कर।” उस दिन आमा ने इस उमर के पेड़ से दोस्ती कराई । जब तक हाथ ठीक नहीं हुुआ में रोज शाम कुदाल ले के उमर के जड़ पे बैठ जाता और उसके सबसे निचले तने पर दो चार कुदाल की घाव लगा के उनसे रिसता चोभ अपनी कलाई पर लेप देता था, फिर पट्ट से पट्टी बाँध लेता। कुछ समय बाद मेरा हाथ बिल्कुल ठीक हो गया । मैं उमर के पेड़ से कहता, “तुम मेरा हाथ ठीक कर देना।” पेड़ ने मेरा हाथ ठीक कर दिया। खसटिया का पेड़ भी तिमुल के करीब का ही हैं इसका खसरा पत्ता होता है। इसके पत्तेे जानवर बड़े चाव से खाते है। जानवर गले का रोग (भेकुन या भेक्त्या) हो जाये तो इसी पत्ते में नमक रख के जानकार गले के भीतर तक हाथ ले जाकर उसे एक तरह से रगड़ देते है कि जिससे जानवरों के गले के रोग ठीक हो जाता। फिर आया खिनवा का पेड़ मुझे खिनवा के फल बहुत पसंद है कुछ कुछ खट्टे कुछ मीठे। उनका स्वाद चरचरा होता था खिनवा भी जानवरों का ही घास का पेड़ है। पर इसके फल इसकी जड़ के आस पास जड़े होते है। पकने के बाद एकदम ताम्बई रंग लिये।
पहाड़ में मसाले और औषधीय पेड़ों और धार्मिक महत्व के भतेरे पेड़ों के साथ मेरी स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं, जिन पर अलग-अलग ढ़ग से लिखूँगा। यहाँ घास और किमती लकड़ीयों के पेड़ों से जुड़ी याद ही साझा कर रहा हूँ। पेड़ों से कैसे अद्भुद लगाव है ऐसा ही एक किस्सा है, थुनेर के पेड़ का। यह थुनेर का पेड़ वही पेड़ है जिस पर पहाड़ों में दरवाजे और छज्जे की काष्ठकला की जाती थी। थुनेर (टैक्सास बकाटा) देवदार का ही जैसा ही ’सौ साल खड़ा, सौ साल पड़ा, और सौ साल सड़ा’ इतना मजबूत होता है। पर लम्बाई में देवदार से कम होता है। किसी जमाने में थुनेर काष्ठकला के शिल्पियों का पंसदीदा पेड हुआ करता था।़ वे अपने मनमुताबिक इसमें अपनी कला को अंकित कर पाते थे। यह बहुत औषधीय पेड़ है। इसके छालों की चाय पी जाती थी। कहते हैं, यह लाईलाज रोगों को दूर करता है, जिसमें कैंसर जैसे रोग शामिल हैं । इसकी छाल से रोगप्रतिरोधक शक्ति बढ़ती हैं। अब यह पेड़ लुप्तप्राय है, क्योंकी इसके अंधाधुंद विदोहन ने इसे नुक्शान किया किया है। परन्तु किसी दौर में कहते है कि जब कोई अपना घर बनाता था तो उसके लिये लकड़ी का इन्तजाम करने के लिये थुनेर के पेड़ की तलाश में जंगल निकलता था। अगर पेड़ मिल जाता तो वह शाम को उसकी जड़ में दिया जला के आता और सुबह उसे काटने से पहले थुनेर से मांफी मांगी जाती थी। तब जाकर उसे काटा जाता और शिल्पी उस पर कला अंकित करता था। यह उस विराट हिमालय का जीवन था ।
भीमल एक बहुउद्देशीय पेड़ है, उससे रेशा, मसाले, पत्ते मिलते हैं। उस पर कभी फिर लिखूँगा। मैने एक बार एक मार्मिक गीत सुना था जिसमें भीमल के पेड़ से एक पहाड़ी स्त्री अपने मन का सारा दुख व्यक्त करते हुए, उससे निवेदन करती है, “हे भीमल (भिक्कू, भ्योल, भिमुवा) की डाली तू ही मेरा इंसाफ करना मैं तुझ पर रस्सा डाल के फाँसी पर झूल रही हूँ।” इस गीत को सुनने के बाद में हप्तों उदास रहा । मैंने इतना उदास मृत्यु का गीत कभी नहीं सुना था। कहते हैं हिमाल को स्त्रीयों ने सम्भाला यह सच है, क्योंकी स्त्रीयों ने ही हिमाल को बोलना सिखाया। हिमाल के कण कण में देवता बसते या नहीं यह मैं नहीं जानता, पर इतना जरूर है कि हिमाल के कण कण से स्त्रीयों की कथा जुड़ी हैं। कहीं वे पहाड़ों से झुक जाने का निवेदन करती मिलती हैं। कहीं नदियों से रास्ता देने का। कहीं पेड़ों पंछियों को अपना दुख सुनाती है। यह लोक गीत पहाड़ के उस पृतसत्ताक समाज का चेहरा उघाड़ के सामने रखते है जिसे कई बार महिमामण्डन किया गया है। भीमल की डाली से एक मार्मीक संवाद

“आज मैं कणि लैरो निसास
फाँसी बणी गो मेरो सोरास
भिमुवै कि डाई करियै बिचार
ज्योड़ी बाँधनू आज त्वै पर
नी फाड़ी मैले ब्याकि झगुली
नी तोड़ा मैले दातुली ज्योड़ी
कैल चलायो दान दहेज
कैले चलायो चेली बेवूण”

(आज मुझे अपने पिता के घर का उदास लगा है/ मेरे लिये यह ससुराल तो फाँसी बन गया है/अरे ओ ! भीमल की डाल तू सोचना बिचारना रे/आज मै तुझ पर रस्सी बाँध रही हूँ/अभी तो मैंने शादी का झगुला भी नहीं फाड़ा/अभी तो मैने घास काटते हुए दारातियां और रस्सीयां नहीं तोड़ी/ अरे ओ! भीमल की डाली बता कि दान- दहेज किसने चलाया होगा?/और किसने चलाया होगा लड़की की शादी का रिवाज?!) यह गीत बहुत लम्बा हैं । ऐसे दोस्त थे पेड़ हमारे पुरखिनों के और हमारे भी। किसी भी संवेदनशील मनुष्य की तरह जिनसे अपने हर दर्द बाँटे जा सके। इर्जा गाती है, “उभ हुनी उमर में जन काटे डाकुली” मतलब कि पेड़ के बड़ने कि उम्र में उसके बीच की मूल डाली को न काटना। क्या इस भागमभाग समय में हम सोच पाते हैं सड़क किनारे के उन पेड़ों के बारे जिसे एक दिन विकास की भेंट चड़ना ही होता है कभी नही। मुझे इस समय हिमाल के स्त्रीयों पर बात करता यह गीत याद आ गया जिसमें एक स्त्री की तुलना झील किनारे के तुन के पेड़ संग की गई है । यह गीत महान नेपाली सांरगी बादक झलकमान गंधर्व का है, गीत बहुत लम्बा है। डाफ्या चड़ी नाम के इस गीत का यह हिस्सा दे रहा हूँ।
“हिमाचुलि त नाक मा फुली
ठमठम डुली
माया मा भुलि
लेखा क टुनि र
एक बार ज्यूनी”
(भावानुवाद इस तरह से है-तुम तो हिमाल के नाक की फूली हो /लटैक के साथ उसके आर पार घूमती हो /तुम झील किनारे की तुन का पेड़ हो /एक ही बार जन्म लेती हो) पेड़ों से दोस्ती के कुछ और अनुभव जो शेष है किसी दूसरे हिस्से में दूसरे ढ़ग से प्रस्तुत करूंगा। बस इतना कहना है कि किसी बूढ़े पेड़ के तने को बाँह में भर कभी उससे बतियाना जरूर । यही मैंने अपने भतीजे से भी कहा, बहुत तो नहीं उसकी अब कुछ पेड़ों से दोस्ती हो गई हैं। हाँ, वह मेथी का पत्ता पहचानने लगा है।

डाक्टर अनिल कार्की की पुरानी रचना का लुत्फ़ उठाने के लिए यहाँ क्लिक करें 

अपनी माटी अपना बचपन -3

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