यंगिस्तान

अपनी माटी अपना बचपन -3

मई 23, 2017 ओये बांगड़ू

डाक्टर अनिल कार्की कवि हैं लेखक हैं और पहाड़ का मर्म समझने वाले पहाडी हैं, अपने आस पास के ठेठ पहाडी पन को बड़ी ख़ूबसूरती से शब्दों में पिरोते हैं और देश विदेश में बैठे पहाड़ियों को वो फील करवा देते हैं जो वो पहाड़ में रखकर भूल गए हैं. इनके लेखनी के जादू की ये संस्मरण वाली तीसरी किश्त है बचपन पर, जो आपको आपका बचपन याद दिलायेगी.यह तीसरा पाठ प्रस्तुत है ‘अमरूद बेचोगे!’

गंगा कूँछी बगुँ बगुँ पृथी कूँछी घुमूँ
एक थाली में भात खूँला तैं डोटी मैं कुमू

इसका मतलब है कि, “नदी कहती बहती हूँ बहती हूँ। पृथ्वी कहती हैं गोल गोल घूमती हूँ। परन्तु भाई हम एक ही थाली में भात खायेंगे तू डोटीनेपाल का और मैं कुमाऊँ भारत का।” यह स्मृति कालीपार (महाकाली नदी के पार) के कामगार साथियो से जुड़ी हैं। वैसे तो कुमाउँ और पश्चिम नेपाल के बहुतेरे लोक गीतों में कालीवार और पार के इलाकों क्षेत्रों के नाम बार बार आते है। “सिलगड़ी का पाला चाला” तो अमूमन मौखिक पंरपरा में लोक गीतों के जोड़ की टेक ही है। सिलगड़ी पश्चिम नेपाल का एक रमणीय स्थान है। फिर सैकड़ों ऐसे देवी देवता कालीपार और कालीवार अपने पालकों के साथ रोजगार की तलाश में आते जाते रहे। ये रोटी -बेटी के संम्बन्ध ही नहीं हिमाल के सबसे आदिम रहवासी संबन्ध थे। भले ही सिंगोली संन्धि ने कालीनदी जो आरपार की नकशीर थी उसे दो देशों की राजनैतिक विभाजन रेखा घोषित कर दी हो, पर सांस्कृतिक रूप से वह कभी हमें अलगा नहीं सके, क्योंकी यह न कालीगंगा ने स्वीकार किया न इसके आर पार की साझा सांस्कृतिक विरासतों ने ही। एक से त्यौहार, एक सा रहन सहन, आधे विरादर यहाँ वार, आधे विरादर वहाँ पार। बाजगी यहाँ तो कुलदेवताओं के पण्डे वहाँ । हमने कभी उन्हें नेपाली नहीं कहा। क्षेत्र को कालीपार ही कहा और उन्होंने ने भी हमें भारत नहीं बल्कि सौर (पिथौरागढ़), टनकपुर, अल्मोड़ा, बागिसर, रानीखेत, नैनीताल के नाम से ही जाना । हमारे बुर्जुग बताते थे कि उनके पुरखे अपनी भैसों और जानवरों के साथ कालीपार करते हुए झुलाघाट के रास्ते डीणहाट होते हुए रामगंगा के किनारे पहुँचे और राम के नीले पानी ने उन्हें एक तरह से सम्मोहित कर दिया । इस झुण्ड में सभी लड़ाकू जातियाँ थी और उनके कुल देवता भी उनके साथ चलता हुआ यहाँ आया। रामगंगा के चौरस सेरे तब सिंचाई युक्त और खूब ऊपजाऊ थे। घूमन्तु पुरखों के मन यह स्थान भा गया तो वहीं के हो के रह गये । पूर्व में उन्होंने सीरा राज्य के राजाओं को ’कर’ दिया और बाद को पाल राजाओं को वे ’कर’ देते रहे। बहुत बाद तक वे बेरीनाग के मालदार को कर देते थे पर इंदिरा गाँधी के उदय के साथ ही वह जमीनें उनकी पक्की जमीनें हो गई।
बारहाल मेरी स्मृति में बहुत कालिपारी आमाएं (दादीयाँ) और उनके मोहक भाषा-बोली के लहजे हैं। वे सब नाक में बुलाँक पहती थी । जब वे हसँती तो उनके ओठों पर सोने की बुलाँक फर-फर उड़ते पीले पीपल पात सी दमकती थी। बहुत सारे पुराने बज्या (दादा) हैं तो दोहरासरूवाल और नेपाली टोपी पहिने गाँव के बीच ढेरे में रहा करते थे। हम बहुत गीत उनसे मुखजुबानी सीख लेते हम उनके लोगगायकों को अपना कहते वे हमारे लोक गायकों को। दिन में एक ढ़ेड़ बजे के आस-पास नेपाली रेडियो स्टेशन पर हम हिंदी के फिल्मी गाने सुनते हुए गर्मी की दुपहरों पर ऊँघा करते। अब सोचता हूँ कैसा दुलर्भ सांस्कृतिक समन्वय था वह। वैसा ही सम्मान था कामगार का; आज की तरह , “ऐ बहादूर यहाँ आ” “आजा बेटा” “ऐ चलेगा क्या” जैसे खुदगर्ज शब्द कामगार के लिये इस्तेमाल नहीं होते थे। हम लोग नेपाली कामगारों से उम्र के हिसाब में रिश्ते लगाकर बात करते थे । बूढ़े कामगार को बज्या (दादा) और जवान कामगार को (दाई) बड़ा भाई कहते।
हमारे गाँव में बेहिसाब अमरूद के पेड़ होते हैं वहाँ अमरूदों की विभिन्न प्रजातियां है. बहुत मीठा स्वादिस्ट अमरूद, पकने के बाद उन पर लालछीट चिन्दीया यों दिखती है जैसे किसी सुनार ने अमरूदों के फलों को पकड़ पकड़ के उन चटक लाल रंग के नग जड़ दिये हों। अमरूद आज भी बड़ी मात्रा में हमारी ही घाटी से पिथौरागढ़ मुख्यालय बिकने आता है। सड़क न होने के कारण आधे से ज्यादा गाँव में सड़ जाता है या बर्बाद हो जाता है। ग्रामीण अपने जानवरों के लिये दाले के लिये इस्तेमाल करते है और ग्वाले किसी पेड़ के नीचे जानवर हाँक के अमरूद के पेड़ को हिला के सारे पके अमरूद गिरा अपने बैल बकरीयों को खिलाते है। हमारे गाँव में अमरूद का पेड़ किसी का अपना नहीं होता कोई भी किसी के खेत किनारे ऊगे अमरूद के पेड़ पर चढ़ के बे रोक टोक खूब अमरूद खा सकता है। बेरोजगार लोग पूरे गाँव से अमरूद तोड़कर उन्हें डोकों (रिंगाल की शंकुनुमा डलिया) में डाल के बहुत कम मूल्यों में पिथौरागढ़ में फलों के विक्रताओं को बेच आते थे और अपना जेब खर्चा निकाल लेते थे। बचपन में एक दिन स्कूल से लौटने के बाद मैं पास के अमरूद के पेड़ पर चढ़ के पके अमरूद इकठ्ठा कर रहा था कि इनते में एक कालिपारी दाईयों (बड़ेभाई) का काफिला सामने से गुजरा यह नया काफिला था मेरे गाँव के दूसरी तरफ ठेकेदार का खड़िया खनन शुरू होने जा रहा था संम्भवतः यह कामगार उसी खदान में काम करने को जा रहे थे। उनमें से एक अधेड़ दाई ने कहा “अमरूद बेचोगे क्या?” पहले तो मुझे लगा कि यह क्या हुआ मैं चुप रहा उसने फिर कालिपारी में दुहराया “ अमरूद बेचोगे क्या” मैंने न चाहते हुए भी मुण्डी हिला दी वे तेरह लोग थे अमरूद तो मैंने बहुत तोड़े थे। मैने अमरूद उनके सामने फैला दिये उन्होंने अपने मनमुताबिक तेरह लोगों के लिए एक एक अमरूद को छाँटा । मूल्य पूछा तो मैं हक्का बक्का रहा गया, “कितने क हुए” उन्हे शक हुआ उन्होंने पूछा, “क्या वह पेड़ मेरा ही है।” मैं कैसे बताता कि यहाँ अमरूद के पेड़ किसी के नहीं होते जो चाहे जिसके खेत के किनारे ऊगे पेड़ पर चढ़कर अमरूद खा सकता है और चाहे तो बोरी भर के ले जा सकता है। पर मैंने कुछ उत्तर नहीं दिया। उन्होंने बिना कुछ कहे पाँच रुपये का मुड़ा तुड़ा नोट मेरी ऊपर वाली जेब में डाल दिया और चलते बने मैं खुश होता हुआ घर आया पिता आँगन में थे मैंने अंगुली लगाते कहा, “वो जो दाई लोग जा रहे हैं ना उन्हें मैंने अमरूद बेचे ।” पिता एकबएक झटके के साथ उठे और आश्चर्य के साथ बोले, “क्या?” मैंने कहा हाँ मैंने अमरूद बेचे पूरे पाँच रुपये के जेब से मुड़ा-तुड़ा सा पाँच का नोट दिखाया पिता ने चट से पकड़ लिया और आँगन के कोने में जाकर दाई लोगों को आवाज लगाई, “ओ दाई! ओ दाई!” एक दाई ने उत्तर दिया, “हजुरो!” पिता ने कहा कि यहाँ आओ उनमें से दो दाई पास आये एक वही अधेड़ दाई जिसने मुझसे अमरूद बिकाऊ है पूछा था वह भी साथ था पिता ने उनके आँगन में पहुँते ही वो नोट उनके हाथ में रख दिया और बोले, दाई यहाँ अमरूद नहीं बेचते, इस नालायक ने आपको अमरूद बेच दिये, इसलिये अपने पैसे वापस लो और चाय पीते हुए जाओ। चाय तो उन्होंने नहीं पी पर पिता से आग्रह किया कि यह पाँच रुपये हमारी ओर से बच्चे के लिये , पर पिता अखरोट थे फौजी कायदे कानून वाले वे कहाँ मानते, बारहाल दाई ने पैसा अपने जेब रख लिया। मैं किसी अपराध बोध से भर गया कुछ पाँच का नोट हाथ से जाने का ग़म और कुछ कुछ लज्जित सा मैं नजर झुकाये चुपचाप खड़ा रहा । तभी एक कामगार हथेली मेरे नजरों के सामने आयी जिस पर दो दाने अखरोट के थे वो उसी दाई की हथेली थी जिसेे मैंने अमरूद बेचे थे । आज समझता हूँ कि पिता ने उस दिन मुझे बनिया बनने से बचा लिया था। उन अखरोटों की याद अब तक गई नहीं जब भी अखरोट देखता हूँ पिता याद आते है, याद आता वह कालिपारी कामगार दाई-भाईयो का जत्था। लम्बे समय के बाद पलायन पर एक रिसर्च रिपोर्ट के काम के सिलसिले में, मैं पिथौरागढ़ के जौंलजीबी अतंराष्ट्रीय में मेले में जुमला नेपाल के घोड़ा व्यापारियों से मिला, उन्होंने मुझे अपने सबसे युवा घोड़े, जिसका नाम था संतोष; उस पर बैठाया और खूब आत्मीय होकर बातें की, लौटते बेर अंजुरी भर जुमला का कटा हुआ सूखा सेव दिया तो मैंने उन्हें कुमाऊँ और नेपाल दोनों तरफ चर्चित यह मौखिक परंपरा का गीतजोड़ सुनाया
दाँत ले फोड़ी खान्या ओख्खड़ जुमला पारि हुन्छ
अरखा को मन बुझूनै आफि किलै रून्छ ।
(दाँत से फोड़ के खाने वाला अखरोट जुमला के पार पाया जाता है साथी, पर यह तो बता कि दूसरे का मन बहलाने वाला खुद क्यों रोता है।) यह गीत जोड़ सुनके तो जैसे वह चहक पड़े थे और एक अखरोट का दाना लिए वे ही मेहनती हथेली फिर से मेरे सामने थी. मैंने चट से वे अखरोट उठा लिया और एक बार फिर बचपन की स्मृतियों में खो गया । पिता का अखरोटपन देर तक याद आता रहा। आज जब कालीगंगा पर बाँध बनने की तैयारी हो चुकी है विस्थापन की तैयारी को चुकी है काग़जों पर बाँध बनने की सहमति पर दोनों देश की मुहरें लग चुकी हैं तब सोचता हूँ कि भविष्य में क्या काली के आर पार के लोगों में यह प्रेम यह लगाव गतिशील रहेगा या यह भी बाँध की तरह बँध विकास के अन्धे अतल गहराई में खो जयेगा? मुझे यकीन है मनुष्य का हांड़ मांस सरकारें भले विस्थापित कर ले पर सरकारों में इतना दम कहाँ कि आम जन की स्मृतियों और लगावों को भी विस्थापित कर सके।

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अपनी माटी अपना बचपन -2

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