यंगिस्तान

अपनी माटी अपना बचपन भाग-11

जुलाई 9, 2017 ओये बांगड़ू

डाक्टर अनिल कार्की कहते हैं कि पिछली दस किश्तों के बाद यह ग्यारहवीं किश्त उन सभी भले बुरे गुरुओं के नाम जिन्होंने जिन्दगी में कुछ ना कुछ सिखाया . इसका शीर्षक ‘स्कूल मास्टर और एक झन्नाटेदार थप्पड़।’

लेखक अनिल कार्की

मैं जिस दिन पहली बार स्कूल गया मेरा नाम लिखवाने मेरे घर से कोई नहीं आया। मैं पड़ोस के एक बड़े लड़के के साथ गाँव के प्राथमिक स्कूल में गया था और नाम लिखवा दिया गया। ईजा ने घास काटते जाते हुए मुझे स्कूल के लिये विदा किया। पहले ही दिन स्कूल में घटी घटना के बाद मैं सहम गया। उस दिन जब सुबह की प्रार्थना हो रही थी तो मासाप ने किसी बात पर बड़ी क्लास के बच्चों को बुरी तरह धून दिया था। मैं दूसरे दिन से काफर हो गया। स्कूल भेजने के लिये रोज ईजा मुझे मार-मार के भेजती। कुछ ही दिनों में मार-वार इन सबकी आदत हो गई।
उन दिनों में सोचता था कि अगर कहीं स्कूल बनाने वाला मिल जाता तो मैं उसका कत्ल कर देता । बात सन् 1995-96 की है, मैं मायल नाम की एक जगह अपने जीजा के स्कूल में कक्षा तीन का विद्यार्थी था । रोज घर से लगभग छः किलोमीटर पैदल उस स्कूल में जाना होता था। उस समय मेरे साथी थे दूसरे गाँव के चार बच्चे गोपुली, बबल्या, कपिल, काली (कलावती) और मनोज, हम सब में गोपुली पाँच में थी बबल्या चार में। काली, मेरी व मनोज की कक्षा समान थी। कपिल एक में पढ़ता था। हम सब में एक बात समान थी हम सब मास्टर (जो मेरे जीजा भी थे) के नज़रों में निहायत कमजोर और बुद्धु थे। शायद यही हमारी दोस्ती का कारण रहा होगा। मैं जब तीन किलोमीटर चल के अपने इन साथियों के गाँव पहुँचता तो वे रोज सुबह मेरा इन्तजार कर रहे होते थे। हम लोग उनके गाँव से रास्ते भर खेल करते हुए स्कूल पहुँते थे। स्कूल पहुँचने में देर हुई तो घण्टी बजाने वाले हथौड़े से मास्टर जीजा सर बजा डालते थे।
सारे दोस्तों में भी सबसे ज्यादा मेरा ही सर बजता था। सारी दुनिया एक तरफ जोरू का भाई एक तरफ वाली कहावत मेरे साथ इसी रूप में घटी। एक बार तो सर ही सूज गया। मेरे लिये उस समय स्कूल भी एक मानव जनित आपदा ही थी। उस दौर में विद्यार्थीयों को शिक्षकों के हाथ पिटना आम बात थी । शायद यही कारण है कि हमारी पीढ़ी अब भी शिक्षक नाम से थोड़ा बहुत घबरा जाती है। तब आज की तरह नहीं था कि माँ बाप बच्चे को हाथ लगाने पर भी मास्टर से झगड़ने स्कूल ही पहुँच जाय। बल्कि अगर घर में पता चलता कि हमने आज स्कूल में मार खाई है तो वे भी दो चार और मार देते और मास्टरों को घर वाले कहे रहते कि इसको पढ़ना नहीं आयेगा तो अच्छे से कुटक्या (धून) देना। इसलिये मार वाली बात घर में बता के कौन दुबारा पिटे। शायद यही बात थी आज भी स्कूल नाम की चीज से मुझे डर लगने लगता है। कई स्कूलों में आज भी फ़ालतू की औपचारिकताओं में जोर दिया जाता है। मास्टर वे नहीं होते जो वे होते हैं तमाम थोथे आदर्श ओढ़े बैठे रहते हैं। एक बार ऐन्थ्रोपोलाॅजी के फील्डवर्क 2012 जनवरी में, मैं सीमान्त के प्राथमिक स्कूल के पास किसी परिवार में रूका था। सामने स्कूल था मैं रोज छोटे बच्चों को देखता था। मासाप उन्हें बिल्कुल जानवरों की तरह हाँका करते थे। लेकिन एक दिन 26 जनवरी आ गई। मैं जहाँ रूका था वे रिटायर सैनिक थे। हर साल झण्डा फहराने का ठेेका उन्हीं रिटायर कका का था। वे इससे तंग आ चुके थे। उस दिन भी मासाप आये उन्होंने कहा “सर एक बार आ दो, झण्डा फहरा के बच्चों को दो बोल कुछ भाषण कह दो।” रिटायर फौजी मेरी ओर अंगुली लगा के बोले, “इस बार इनसे झण्डा फहरवाओ, कमाल के आदमी हैं।“ मैं दाँत माँझ रहा था वे पास आये बोले, “सर नमस्ते! आज आप हमारे अथिति है।“ मैंने कहा धन्यवाद पर मैं झण्डा नहीं फहराऊँगा मैं तो बेरोजगार स्काॅलर हूँ, झण्डा तो नेता मंत्री बड़े लोग फहराते हैं, मैं तो अभी ही उठ के मैं दाँत मल रहा हूँ पता नहीं नहा धो कर तैयार होने में कितना टायम और लग जायेगा। आपका झण्डा फहराने का समय निकल जायेगा। इसलिए कका को की ले जाओ सयाने आदमी ठेहरे!” वे कहाँ मानने वाले थे। जिनके यहाँ रूका हुआ था उन्होंने कहा, यहीं आँगन से लगा स्कूल तो है एक चक्कर जा के फहरा दो नहा-धो बाद लेना। मुझे मजबूरन उनका कहना मानना पड़ा। मुझे मंच में बैठाने से पहले मासाप ने बच्चों के सामने भूमिका बाँधी। जिससे छोटे बच्चों को कोई मतलब नहीं था। बच्चे 26 जनवरी के नाम पर मुझे और मेरा अजीबो- गरीब परिचय झेले जा रहे थे। मासाप ने उन बच्चों को, जिनका ध्यान कहीं का कहीं था, आजादी के बारे में बताया। उस आजादी के बारे में बताते हुए उन्होने महात्मा गाँधी के साथ देश के तमाम् नेताओं के नाम लिये और उनकी बातों को दोहराया। पर बच्चों को इस सबसे कोई मतलब नहीं था। उन्हे असल आजादी की जरूरत थी । मैंने महसूस किया कि उस दिन मासाप एक दिन के लिये बच्चों को आप कह कर बात कर रहे थे। जबकि मैं उन्हें पिछले दिनों से की सामान्य कक्षाओं में देख रहा था तो वे बच्चों को हाँका लगा रहे थे।
बारहाल मेरा नम्बर आया। मेरे हाथ में झण्डे की डोरी आयी और मैंने उसे खींचा झंडा फहर गया, फूल गिरे बच्चों ने ताली बजाई। मासाप बोले, “अब मुख्य अथिति आजादी को लेकर आप सब बच्चों के सामने दो बात रखेंगे।” मैंने उनका मुँह देखा वे ठण्ड में बैठे कुड़क रहे थे। सो मैंने अपनी दुधभाषा में कहा, “मासाप ने आजादी के बारे बता दिया। मैं यह बताऊँगा कि कैसा हो स्कूल हमारा।“ मैने उन्हे जन कवि गिर्दा की कविता सुनाई-

जहाँ न बस्ता कंधा तोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहाँ न पटरी माथा फोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहाँ न अक्षर कान उखाड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहाँ न भाषा जख्म उघाड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा
कैसा हो स्कूल हमारा?
जहाँ अंक सच-सच बतलाए, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहाँ प्रश्न हल तक पहुंचाए, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहाँ न हो झूठ का दिखावा, ऐसा हो स्कूल हमारा

जहाँ न सूट-बूट का हव्वा, ऐसा हो स्कूल हमारा
कैसा हो स्कूल हमारा?
जहाँ किताबें निर्भय बोले, ऐसा हो स्कूल हमारा
मन के पन्ने-पन्ने खोले, ऐसा हो स्कूल हमारा

उन नन्हे दोस्तों को यह कविता बहुत पंसद आयी । उनके चेहरे में एक मुस्कान खिल गई मुझे लगा असल झण्डा तो अब फहरा है। आजकल सत्तायें मास्टरों के सूट बूट पर उलझी हुई है । लम्बे डण्डे में झण्डा फहराने से कुछ नहीं होगा असल झण्डा मन में फहरना चहिए । ज्ञान और एकता का । स्कूल ऐसा होना चाहिए जो मन के पन्ने पन्ने खोल दे। उस दिन उन बच्चों को देख के मैं एक बार फिर अपने बचपन के दिनों में खो गया था। बचपन में मैंने इतनी मार खाई कि मैं निकट भविष्य में और ज्यादा बिगड़ता गया, ढीट होता गया और मार से निडर हो गया। पहले मैं जीजा के साथ ही रहा था पर शिक्षा को लेके वे बड़े मुल्लावादी थे। दिन भर किताब में बैठा दिया करते । शिक्षा को लेकर वे निहायत दोयम दर्जे की सोच रखते थे। हालाकि वे पूरे क्षेत्र के सबसे कद्दावर मास्टर माने जाते थे। लोग कहते थे उनके बच्चे जीजा की वजह से सुधर गये हैं। एक किसी दिन मैं उनके घर से भाग गया था और अपने घर वापस आ गया । वापस आने की एक निजी वजह यह भी थी कि कभी कभार वे बहुत पुरूषपने ढंग से दीदी से लड़ने लगते कि बात बहुत बढ़ जाती। जो लोग समझते है कि बच्चे कुछ नहीं जानते उन्हें अपना यह अपनी यह ग़लती ठीक कर लेनी चाहिए। बच्चे कई बार बुजुर्गों से ज्यादा जानते हैं और उन्हे हिंसा कतई पसन्द नहीं होती। वे हिंसक हुए हैं तो इसके लिए उनका अग्रज समाज जिम्मदार है न कि वे। बच्चों को रट्टू बनाने वाला मास्टर मेरी नजरों में आज भी सबसे घटिया मास्टर है। इससे अच्छा वह पढ़ाये ही नहीं तो बच्चा खुद ही अपने आस-पास से बहुत कुछ और सीख लेगा। कई माँ बाप अपने बच्चों को अपने रिश्तेदारों के यहाँ भेज कर सुधारने में यकीन रखते है। पर मेरा मनना है, वह वहाँ कुछ भी नहीं सीख सकता। दूसरे घर में लाख अपनत्व के बाद भी एक बेगानापन और झेंप हमेशा मन में रहती ही है। हो सके तो छोटे बच्चों को मातृत्व सुख और परिवार से कभी अलग ना करें मैं इस त्रासदी को बहुत करीब से जानता हूँ। जो अपने माता पिता के साथ आजादी है वह कहीं और सम्भव नहीं चाहे वे कितने ही करीबी रिश्तेदार क्यों नहीं। ज्ञान या नाॅलेज सर के सफेद बालों में नही होता। उम्र के पास बेशक सूचनाएं हो सकती है, पर विचार, विजन व सोच उम्र की मोहताज कभी नहीं होती। कभी-कभी बच्चों से भी सीखने की कोशिश जरूर शिक्षक को करनी चाहिए। मैं जब भी नई कक्षा में जाता था पहले ही दिन मासाप यों व्यहार करते जैसे अब तक मैं निरा बुद्धु था, अब वे ही मेरे जीवन में प्रकाश भर देंगे। यह क्रम काॅलेज पहुँचने तक चलता रहा। जब भी नई कक्षा में जाओ पहले दिन ये महसूस कराया जाता कि अब तक का सब बेकार था। यह ऐसा ही था जैसा कि गर्म खौलता पानी को शीशे के गिलाश में डाल दिया हो मेरा मन हर बार चट्ट से चटक जाता था। मैं दुबारा बनता था चटक चटक के बनने के लिए । मैं आज तक जिन्दगी में कभी आगे की सीट पर नहीं बैठा। हमारे समय में आगे मास्टरों के चहेते बच्चे बैठा करते थे या फिर वे जो उनकी नजरों में जो होशियार बच्चे थे। फिर उन बच्चों के साथ कौन बैठता, उन्हें हम किताबों के कीड़े कह कर हंसी का पात्र. बनाया करते थे। वे हमें बुद्धू कहके । हमें रात दिन रटन्त लगाने वाले साथी हमें बड़े निरस और डरपोक लगते थे। वे चुगलखोर किस्म के होते थे। हमारे बस्ते में क्या है क्या नहीं हम में से कौन हल्ला करता है वे सब मास्टरों को बताया करते थे। मास्टर भी अजब-गजब थे, हमसे स्कूल न आने का दण्ड लिया करते और फिर उसकी चाय पीते थे। एक बार हमारे प्राथमिक विद्यालय में मास्टनी बहनजी ने पीतल का पूरा लौटा खिरीजों से भर दिया था। हमारे कुछ दोस्तों ने उससे एक-एक दो-दो रुपये ले के चने खाने शुरू किये और एक दिन पूरा लौटा ही खत्म कर दिया। मासाप अपने बच्चों को कभीकभार स्कूल लाते तो हम सोचते काश यह हमारे साथ खेलता । हमारे मन में पहले से यह धारणा होती थी कि शिक्षकों के बच्चे बहुत होशियार होते हैं, वे केवल होशियार लोगों से ही दोस्ती करते हैं। उन दिनों मार खाने के पैमाने निर्धारित थे जैसे कि भारतीय दण्ड संहिता की धाराएं हों, कम गलती में एक धोल सर में पड़ती थी। कुछ ज्यादा गलती में कान उमेठे जाते और कान के बगल मे बाल यों खींचे जाते कि पूछिये मत, आँसू ही निकल आते और फिर एक थप्पड़ । इससे ज्यादा में जब हाथ थक जाते तो सिपका (लचकदार संटी) मंगाया जाता और फिर सुल्टी हथेलियों में मार पड़ती थी। इससे भी जघन्य अपराध जिसमें स्कूल से भागना शामिल था उल्टे हाथ में बेंत पड़ती थी। इस सजा में भी तब्दीलियाँ हुआ करती थी कभी अंगुलियों में लकड़ी वाली स्केल फंसा के भी मार पड़ती थी। बाद के बरसों में जब में पिथौरागढ़ पढ़ने आया तो वहाँ एक मास्टर जी को जब गुस्सा आता तो वे कहते, “ए! माॅनीटर जा बेंत ले के आ।” बेंत लाया जाता वे नाप तोल के मारा करते थे । पीठ के बीच में जहाँ खुजलाने को हाथ नहीं पहुँता था। मिशन स्कूल में इण्टर में अंग्रेजी के एक प्रवक्ता थे वे बाल पकड़ के सर की जलेबी बनाने में सिद्धहस्त माने जाते थे। सर दो तीन दिन तक चक्राते रहता था। वहीं एक जोशी मासाप थे जो थप्पड़ लगाने से पहले अपना दाहीना हाथ यों लचका के कुछ देर ढीला छोड़ और फिर तेजी से कान के नीचे दे मारते थे इस जन्नाटेदार थप्पड़ का असर यों होता था कि दो दिन तक कान के कनजड़ें (कानों के नीचे) दर्द करते रहते थे। हम लोग रामगंगा पार रहते हैं हमारी ईजाएं (माएं) रामगंगा को गाली देती कि वह उनके किशोर बच्चों को बिगाड़ देती है। क्योंकी बच्चा बचपन से नदी से घुल-मिल जाता है और मच्छीमार के जेब खर्चा भी निकाल लेता है। हमारे बड़े भाई लोग इन्टर काॅलेज के पीटीआई मास्टर से इतना डरते थे कि वह आधे रास्ते तक आ के फिर स्कूल जाने का इरादा टाल नदी किनारे रिवाड़ों पर दिन भर खेलते रहते। अब ईजा (माँ) बेचारी क्या जाने शैक्षिक नवाचार की बात। वह नदी से ही तो झगड़ सकती है सो झगड़ती थी। मसाप लोगों रोज सुबह हमारी शाला में पार तरफ सड़क से आया करते थे। हम लोग उन्हें टकटकी लगाये रहते अगर किसी दिन हम गृहकार्य न करके लाये हों और उस दिन वे मासाप न आयें तो हम सोचते आज भगवान ने हमारी सुन ली। जैसे ही वे दिखते हम लोग झाड़ू लगा के कक्षायें चमका देते और बाल्टी के हत्थे में बाँस का लठ्ठा फंसा के पानी दो लोग कन्धे में रख के भर लाते । पानी भरने वाले कौन होंगे यह मासाप लोग खुद तय करते थे। पानी भरने के लिये जाति विशेष के बच्चे ही जाते थे वे ही चाय भी बनाते थे। अब यह मांनसिकताएं कम हो गई यह देखकर अच्छा लगता है। उस दौर में सच में बहुत भेद भाव था मेरे पिता प्रारम्भ में सर्वोदय रहे तो उन्होंने मेरे स्कूली नाम के पीछे कुमार लिखवाया था। इसलिए बहुत बार मैं स्वयं भी पाखण्ड की उस हेयता से परिचित हो पाता था जो आदर्शाें के भीतर ओढ़ी जाती है। यह सब भी चलता रहा और बचपन भी समझदार होता रहा। पाँच तक आने पर मैं समझ गया कि काम भी करो और मजे भी करो। मैं, फटाफट अपने काम ईमानदारी से निपटाता और मौज मस्ती भी किया करता था। जो अब भी मेरा स्वभाव है। पिता चाहते थे कि मैं कैंसर सर्जन बनूँ यह बड़ी बात थी। पर मेरे आठ पास करने से पहले ही वे चल बसे। मैं, कैसेर का सर्जन तो क्या ही बनता हिंदी वाला डाॅक्टर बन गया। आठ के बाद फिर एक बार मास्टर जीजा से पाला पड़ा तब वे थल में पढ़ाने लगे थे। मेरे पिता के मरने के बाद ईजा को लगा कि बच्चा बिगड़ जायेगा वे मुझे वहाँ छोड़ आये फिर वही ढाक के तीन पात। कुछ माह जैसे-तैसे झेलने के बाद एक दिन मैं वहाँ से भी भाग गया। वापस घर आ घर से ही कभी पैदल तो कभी गाड़ी में दस किलोमीटर दूर स्कूल आने जाने लगा। इस बीच चड़ा गाड़ी में लटकने का चस्का और छत में चढ़ने का चस्का। किसका स्कूल कभी-कभी चले जाता था। सड़क के चाय होटलों रेस्त्रां से ही मैंने खाना बनाना सीखा। खाना बनाना मेरा प्रमुख रूचि का विषय आज भी है। कभी कभार स्कूल की किताब पढ़ लिया करता, उन्हीं दिनों मैंने पहली बार कुछ पढ़ना (स्कूली किताब नही साहित्य, कहानी, कविता) लिखना-विखना सिखा था। गाड़ियों और कमाण्डर जीपों में चिपकाई सायरी की चिटों से यह पहले-पहल का परिचय था। जो मुझे कविता तक ले आया। इससे पहले जिस मास्टर की छवि मेरे मन में अमिट है वह है घश्याम पाठक मसाप की। क्या मासप थे वे हिन्दी के। उन्होंने मुझे सोवियत संघ मास्को से प्रकाशित एक रसियन कहानियों का संग्रह दिया था जिसमें एक कहानी थी ’काकेशश का कैदी’ वह कहानी सैनिक जीवन पर लिखी गई बन्दी सैनिक की कहानी थी। मैं उस कहानी से जुड़ पाया कि मेरा परिवेश और परिवार सैनिक जीवन के करीब था। उसके बाद ही मेरा किताबों की ओर मन हुआ था। वरना तो कब छुट्टी हो और कब घर भागें होती थी। स्कूल में छुट्टी से पहले पहाड़े पढ़ने होते थे, मैं रोज पहाड़ों के वक्त या तो दसवें नम्बर पर बैठता या फिर उस क्रम में जिसमें सबसे सरल पहाड़ा आता । एक दिन मरी चोरी पकड़ी गई और मुझे अगले बहुत दिनों तक उस क्रम बैठाया गया जो जिस क्रम के पहाड़े मुझे आते ही नहीं थे। मर-तर पहाड़े याद किये। थल जाने के बाद गोल इन्टर कालेज में दाखिला लिया गया। वहाँ तब हमारे प्रधानाचार्य भारती हुआ करते थे उनसे एक प्रवक्ता जो शायद अंग्रेजी के थे, उनका नाम था शर्मा जी, प्रधानाचार्य से बहुत चिढ़े रहते किसी दिन वो भारती जी को प्रर्थाना के समय ही गाली गलौंच कर बैठते थे। हम लोग यह देख कर मजे लेते थे पर बहुत देर में जा के पता चला कि मामला क्या था। तब थल गोल में ही मुझे एक मास्टर मिले वे जन्तुविज्ञान के प्रवक्ता थे। पाण्डे सर (यहाँ में सर वाला हो गया था) क्या अद्भुद व्यतित्व था उनका। चित्रकार थे कार्टून बनाते थे। खादी का चोगा पहनते थे वैसा मास्टर मैंने अब तक के जीवन में दुबारा नहीं देखा। बहुत कम बालते थे। हाथ में चार-पाँच पैसिल गठ्ठड़ पकड़े रहते और गत्ते में उसे घिसते रहते। जन्तुविज्ञान की शुरूआती समझ उन्ही की वजह से पैदा हुई। पर कक्षा 9 में यह कहकर मुझे मेरे किसी अपने ने फेल करवा दिया, मैं बोर्ड परीक्षा के लिये कमजोर पड़ जाऊँगा लिहाजा मुझे कक्षा 9 में ही रोक दिया जाय। सो महाराज हम हो गये फेल, होने का भी अपना मजा है। मुझे इसका कोई ग़म नहीं । वर्तमान को देखकर सोचता हूँ एक दिन जब दुनिया केवल पास होना जानेगी तब फेल होना बड़ी बात हो जायेगी। फेल होने के बाद मैंने सोचा अब खेतों पर लौटा जाय फौज भर्ती में जाने का मन नहीं था जबकि उस समय हमारे सीमान्त में आठ पास की भर्ती चलती थी। अपने सैनिक परिवार के उलट मैंने सोचा कि बैल-बकरियाँ पाली जाय और ग्वाला बना जाय। कहीं किसी धार में बैठ के मरूली की तान रनकाई जाय। उन दिनों मैं कल्पना करता, “मैं सुबह सुबह खेत जोतूँगा और मेरी सुवा (प्रिया) मेरे लिये खाना कलेवा ले कर खेत आया करेगी।” हुलस के कहेगी, “थक गये होगे मेरे किसान! आओ साथ में कलेवा कर लेते हैं।“ मैं हल रोक दूँगा और रोटी नमक के साथ छाँछ पीने लगूँगा।

बैलों के साथ लेखक डाक्टर अनिल कार्की

अन्तिम बची रोटी को बारबर कर दोनों बैलों के मुँह में दूँगा और सुवा को आज्ञा दूँगा, “तू जा घर। मैं बैल चराकर लौटूँगा तू भात पकाये रखना।” मैंने एक हल बैल (बोहड़ों) की बना ली और हल भी लगवा लिया। कुछ दिनों बाद ईजा के मन में पता नहीं क्या आया होगा कि एक दिन कहा, “जा पिथौरागढ़।” पिथौरागढ़ में मेरी बहनें पढ़ा करती थीं काॅलेज, मैं पहली बार उनके लिए साग-सब्जी पहुँचाने आया था। हाथ में मच्छीयों की लड़ी और कन्धे में तुमड़ा लौकी रख के। पिथौरागढ़ के सिनेमालाईन में कुछ लोगों ने मुझे रोक के पूछा कि क्या मछली और साग बिकाऊ है? मैं घबरा गया और बिना कुछ बोले तेज कदमों से आगे निकल गया । वे बोले, “शायद गाँव से किसी के लिये सामान पहुँचाने आया है।“ बाद में उनके साथ ही रहने आ गया। मेरा गंवारपन जिस पर मुझे गर्व है वह कभी न छूटा। मेरी बड़ी बहनें मुझे समझाते समझाते थक गईं। मेरे मुँह में जबरन हिंन्दी भरी जाती और निवेदन किया जाता कि मैं साफ बोलूँ दोस्तों में उनकी बेज्जत होती है। मैं कोशिश करता । शुरूआती एक माह तो मैंने नहाया ही नहीं। गर्मी की दुपहरों में, मैं आँगन पर आड़ू़ के पेड़ के नीचे छाया में फर्श पर मिट्टी में लामतूम-लमपसर सो जाता। हद तो तब हो गई जब मैंने जिद पकड़ ली कि जब गाँव जाऊँगा तभी नदी में नहाऊँगा। एक महीने बाद मैं जब घर गया तो जाते ही नदी को दौड़ लगा दी। दूसरी बार जिद् काम नहीं आयी मुझे जबरन पकड़ के पानी के कोलतार वाले ड्रम में डाल दिया गया। आज सोचता हूँ वह भी क्या दुनिया जो सभ्य होने के लिये भी हिंसक रास्तों से गुजरती है। तब मेरा प्रवेश मिशन इण्टर कालेज में किया गया। कक्षा 9 अ जिसे वहाँ नाईन्थ ए कहते थे। बमुश्किल प्रवेश मिला था। पहले दिन क्लास गया तो विमल फिल्पि सर हाजरी लेने आये बड़ा हँस मुख चेहरा डाँटते नहीं थे। अगर हल्ला हुआ तो अपना ही कान बाँये हाथ से पकड़ते और दाहीने हाथ की अंगुली से अपने होंठ बन्द कर देते। सभी बच्चे यही दोहराते थे और कक्षा में चुप्पी छा जाती थी।
मिशन में गये दो दिन ही हुए थे कि एक अंग्रेजी के मास्टर आये और आते ही एक झन्नाटेदार झापड़ लहरा के मेरे कान पर पड़ा, मैं कुछ समझ पाता कि क्या गलती हो गई तो मास्टर जी ने पूछा, “क्यों मारा पता चला कुछ?“ मैंने गाल पर हाथ रखे मुण्डी हिलाई, “नहीं” मासाप बोले “कहाँ से आया है?” मैंने कहा, “थल मुवानी से।” तो कड़कते हुए कहा, “जानता था। किसी गाड़ गधेरे से ही आया होगा। चल अपनी कमीज़ पेंट के अन्दर ठीक से कर।” तब मेरे समझ आया कि ओह मेरी स्कूली कमीज का एक कोना पेंट से बाहर निकल आया था। उस दिन मुझे पता चला कि मैं जिस रामगंगा को मैं अपनी दूसरी ईजा समझता रहा वह इस मास्टर के लिये गाड़-गधेरा थी। मुझे बहुत बुरा एहसास हुआ। मैं पहली बार शहर और गाँव की खाई से परिचित हुआ। यह दूसरी बार हुआ था जब मुझे लगा कि मैं जहाँ पैदा हुआ वह गाड़ गधेरा था। आज भी जब किसी पहाड़ी नौजवान को अपनी भाषा और माटी से कटा हुआ देखता हूँ तो करूणा में मन भर जाता है। सोचता हूँ किसी मोड़ पर उसे भी जरूर इसी तरह सभ्य कहे-समझे जाने वाले समाजों ने अपनी माटी और भाषा से अलगाया होगा। वह पहाड़ी युवा क्या जाने कि किसने उसे जड़ों से काट दिया वह तो बस अंग्रेजीयत और शहरीयत दिखाता हुआ जब गाँव लौटता है। जो अलगाव अपनी माटी से अपनी भाषा से कभी उसे करवाया गया था वह उसे क्रूरता से बचे कुचे ग्रामीणों तक हस्तांतरित कर देता है। उस दिन स्कूल में घटी घटना के बाद मैं डर गया। भाग के पहुँचा संस्कृत के पाण्डे मासाप के पास, उन्होंने कक्षा में मुझे और एक बच्चे मोहन राम को देखा तो खड़ा किया, “बताओ रे। अपना अपना नाम।” मैंने बताया, “अनिल कुमार” चैंक गये बोले कि यहाँ कोई जगह नहीं है। फिर कुछ सोचा पिता का नाम पूछा। मैने बताया तो पिता के नाम के पीछे सिंह पाकर शायद उन्हें अधतसल्ली हुईं। पर मोहन राम को बुरी तरह हड़काया गया । मोहन राम दुबारा कक्षा में आया नहीं अलग-थलक रहा। मैं भी दोमन हो कहाँ जो जाऊँ कि स्थिति में आ गया । अब मोहन राम पिथौरागढ़ की एक प्रेस में काम करता है। जब पिथौरागढ़ जाना होता उससे मिलता हूँ तो पहले अंग्रेजी का वह क्रूर मास्टर याद आता है, फिर संस्कृत का वह दकियानूस जो विषय पढ़ाने से पहले जाति पूछा करता था। कहा करता था कि तुम्हारे खून में नहीं संस्कृत पढ़ना। उस दिन मैने महसूस किया कि संस्कृत और अंग्रेजी में एक ही तरह का छुवाछूत भरा पड़ा है। मुझे याद आता है मिसन इण्टर कालेज का रशायन शास्त्र का वह प्रवक्ता जो जो बच्चों से कहा करता था, “अब हलिया (हलवाहे) के लड़के भी रशायन शास्त्र पढ़ेंगे।” प्रेस कि कालिख में सना मोहन राम मेरा बाल सखा है उसके हाथों की कालिख दरअसल इस समाज के सबसे महान पेशे पर लगी कालिख है। जो मेरे मन से कभी नहीं मिटने वाली। मैने खुद शिक्षण का पेशा चुना इसलिये नहीं कि मैं, मेरे साथ घटी घटनाओं को दुहराओं बल्कि इसलिए कि मैं फिर किसी मोहन के हाथों में कालिख न लगने दूँ। मेरी इन सब बातों का मतलब किसी पेशे को बदनाम करने की मकसद कतई नहीं है। मेरे कुछ अनुभव व स्मृतियाँ है जो मन में गहरे बैठ गयी हैं। बाद के वर्षों में मुझे दुनिया के सबसे बेहतरीन शिक्षक मिले। जिन्होने बुरे शिक्षकों की बुरी स्मृतियों को फिर से नये संन्दर्भों के साथ परखने की समझ दी । मैं जहाँ हूँ उस जगह तक पहुँचा पाया कहना इतना है कि मैं उन सब अच्छे-बुरे शिक्षकों का ऋणी हूँ जिनकी बाबदौलत मैंने जीना सीखा।

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अपनी माटी अपना बचपन- 10

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