यंगिस्तान

अपनी माटी अपना बचपन- 10

जून 28, 2017 ओये बांगड़ू

डाक्टर अनिल कार्की कहते हैं कि अपनी माटी अपना बचपन की यह 10वीं किश्त’भोटिया-भोट जुमली-जुमला’आप सब लोगों के लिए

बैलों के साथ लेखक डाक्टर अनिल कार्की

मेरा गाँव पूर्वी रामगंगा के किनारे ऐसी जगह है जहाँ से एक सड़क सीधे मुनस्यार की तरफ चली जाती है और थल से कुछ किलोमीटर आगे गौचर से एक संड़क डीडीहाट अस्कोट की ओर चली जती है। गौचर से जो सड़क मुनस्यार की तरफ को जाती है उसका नाम महान अनवेषक पण्डित नैनसिंह के नाम पर रखा गया है। जो रामगंगा के किनारे आगे बढ़ती है। जाकुला के किनारे से होते हुए विर्थी खोला (झरना) जिस पर इधर सैकड़ो के गीत है कुछ प्रचानी और कुछ आधुनिक । सबसे पुराना गीत जोड़ नाथमथ के नयाक गंगनाथ और उसकी प्रमिका भाना पर है

बिर्थी खोला पानी बग्यो कुलूनी
भाना कि जंजीर जोगी गालूनी।

(यानि कि बिर्थी झरने का पानी गूल छोटी नहरों में बहने लगा है।
और भाना(गंगनाथ की प्रेमिका) की माला जोगी गंगनाथ में गले में दिख रही हैं)

दूसरी सड़क जो डीडीहाट और अस्कोट की तरफ जाती है हुई ओगला के पास धारचूला सड़क पर मिलती है वह काली के किनारे किनारे चली जाती है। धारचूला की तरफ चली जाती है। दोंनों ही इलाकों से हमारे गहरे तालुक़ात रहे हैं। हुमला-जुमला के घोड़े और सीमान्त की भेड़ बकरियाँ दन, थुलमा, नमक, स्वाग। सौका की तरह जुमली भी व्यापारी है। जुमली एक तरह से हिमालय के माल वाहक घोड़ो और खच्चरों का बड़ा व्यापारी है। जुमली लगभग पच्चीस दिन की पैदल व्यापरिक यात्रा पार करता हुआ जोंलजीबी के अतंराष्ट्रीय व्यापारिक मेले तक आता है। पूर्व में जुमला के जुमली घोड़ों के संग व भौट के व्यापारी अपने दन, थुलमा नमक, स्वाग अपना हस्तशिल्प बेचने को अपने भेड़ रेवड़ों चप्पुओं के संग नीचे पहाड़ उतरा करते थे। पिथौरागढ़ के ठुलथल का मेले और बागेश्वर के उतरायणी मेले, स्यालदे के कौतिकों तक आता था। उनके देऊड़ा गीतों में इन क्षोत्रों में खूब तोड़ मिलते हैं। मुझे मेरे मित्र धर्मराज जो नेपाल के धनगढ़ी परिसर में अग्रेंजी के प्राध्यापक है उन्होंने एक बार जुमली और अल्मोड़े के लालाओं के बीच सौदे की रोमांचक कथा सुनाई, एक बार एक जुमली व्यापारी अल्मोड़े बाजार में अपने घोड़ों से संग पहुँचा। जुमली व्यापारी की खाशियत होती है कि वह बहुत बना ठना नहीं रहता। देखने से कोई अन्दाजा भी नहीं लगा सकता कि वह इतना बड़ा व्यापारी होगा। अब तो उनके परम्परा गत व्यापार का तरीका कुछ बदल सा गया है, पर पूर्व में वह कई जगहों पैबन्द लगे दंगेली जिसे भोट्टा कहा जाता है उसे ही पहना करता था, और वह भी बहुत मैला कुचैला सा। ऐसे ही रूप में एक जुमली व्यापारी अल्मोड़े के बाजार पहुँचा। ताँबे के वर्तनों की एक दुकान में जुमली ने बीस नाली के गुरुतोल कूणे (बड़ा सा भगौना) का मूल्य पूछा। लाला ने उसे पहले सर ले के पैर तक घूरा और पिर कहा, “ दो रुपये का है दे सकेगा?“ जुमली बड़े व्यवहार कुशल और खब्तुलहवासी मगर सचेत व्यापारी होते हैं। जुमली व्यापारी ने फिर से पूछा, “हजुरो ठीक ठीक बताओ कितने का दिया?“ लाला बाजार के लाला ने जुमली पर रौब झाड़ते हुए कहा, “सुना नहीं डोटियाल (डोटी नाम के स्थान पर रहने वाले) दो रुपये का है देखा है कभी दो रुपया?“ इस पर जुमली ने फिर कहा, “साँची कहा हजुर कि द्वी रुपये का है?“ लाला बाजार का लाला तो झन्ना ही उठा और चीख पड़ा, “दलिद्र कहीं का कालीपारी। कहाँ से आ गया सुबह-सुबह जब कह दिया दो रुपये का है तो है।“ तब जुमली ने लाला के सामने ही अपने देंगेली भोट्टे (वाॅसकट) का एक पैंबन्द फाड़ा और नोटों की गड्डी के बीच से दो रुपये का नोट निकाल के लाला के हाथ में रख दिया और बोला, “अब जुबान से मत मुकरना। जा लाद दे मेरे घोड़े में यह तोला।“ लाला बाजार का लाला खिस्या गया और कहने लगा, “मैं तो मजाक कर रहा था।“ जुमली कहाँ मानता उसने अगल बगल के लोगों को बुलाया और पंचायत हुई निर्णय जुमली के पक्ष में आया। जुमली दो रुपये में बड़ा सा गुरुतोला (भगौना) अपने घोड़े में लाद के कालीपार चल दिया।
यहाँ मनाये जाने जाने वाले मेले कौतिक विशुद्ध रूप से धार्मिक मेले नहीं थे, वे जितने धार्मिक थे उतने ही व्यापारि व पहाड़ की अलग-अलग संस्कृतियों के मेल मिलाप के मेले-कौतिक भी थे । यही नहीं यहाँ मंदिर कई बार प्रेमी प्रेमिकाओं के मिलने के साधन हुआ करते । मेले कौतिकों में प्रेम पनपने के कई लोक गीत व किस्से आज भी सुने जा सकते हैं। हम बचपन में ठुल थल के मेले में जाने को लालायित रहते थे। थल में एक पेड़ा मिलता था सफेद चूने सा ढेड़ा मेड़ा उसका स्वाद अब तक याद है। पड़ोस की दादी बताया करती थी उनके पुरखे कहते थे, गंगनाथ अल्मोड़े से लेकर पूरे कुमाऊँ का देवता इसलिए बन पाया कि इन मेलों में दनपुरिये और डोटी के लोग आया करते थे और वे मनमोहक रूप से गंगनाथ की चरितगाथा गाया करते थे और उनसे प्रभावित होकर बांकि के कुमाऊँ के लोग भी उसे गाने लगे और और इस तरह से गंगनाथ का गायन कुमाऊँ के घर घर तक फैल गया। मैं नही जानता इसमें कितनी सत्यता होगी पर मैं इतना जरूर अन्दाजा लगा सकता हूँ कि यह मेले केवल मेले नहीं थे। यहाँ पुराने सन्त-फकीर और अलग अलग मतों को मानने वाले भी अपने मतों को प्रचार किया करते होंगे। दूसरा यह कि मंदीरों में प्रेमी प्रेमिकाओं के मिलने खूब उदाहरण यहाँ भी है। भगवान की नाक नीचे प्रेमियों के मिलने के जिक्र शेष दुनिया की तरह यहाँ भी चलन में हैं। यह सुखद है कि प्रेमियों ने युगों से सत्ताओं को चुनौतियां ही दी है फिर वह ईश्वरीय सत्ता ही क्यों न हो। कितने ही फसानों और मुहब्बतों के किस्से पहाड़ों पर चलन में है कि किसी अमीर मलजात महिला का मन अचानक किसी ग्वाले अहिर में पर अटक जाता है। और प्रेम का किस्सा बन जाता। पहाड़ों की प्रेम कथाओं में अमूमन खलनायक सवर्ण वर्ग से आते है उसमें में नब्बे प्रतिशत सवर्ण ही हैं ।

तेर गाला मूँगे कि माला मेर गाल जंजीर
तेरी मेरी भेट होली देवी का मंदिर

कौतिक्या शब्द खूब मौज मस्ती करने वाले पहाड़ी के लिये आज भी चलन में है। कौतिक पर एक एक किस्सा, एक बार एक कौतिक्या औरत सुबह कौतिक जाऊँगी करके दिन भर काम करती रही और रात को उसे कौतिक के बारे में सोचते हुए नींद ही नहीं आई। देर रात उसने अन्दाजा लगाया कि अब बस सुबह होने ही वाली है वह धम्म से उठी और नहा धो कर श्रृंगार में लग गई। सजधज होने के बाद जब उसे ठण्ड महसूस हुुई तो वह आग के पास बैठ गई। गुनगुनी बांज के कोयलों की राफ (हल्की आँच) जब उसको सहलाने लगी तो कहीं दूर कौतिक की कल्पनाओं में खोई आँखों को खयाल आया कि आज वे सोई ही नहीं। शरीर सोने कि जिद करता रहा और मन कहता रहा कि सुबह देर हो गई तो साथी कौतिक्यार चले जायेंगे और वह पीछे ही छूट जायेगी। उस महिला ने खुद को सोने नहीं दिया। नींद और मन की लड़ाई में उसे कई बार झपकियाँ आती रही। जैसे ही उसे झपकियाँ आती शरीर लुड़कने को होता वह उसे सम्भालती और उस सम्भालने में उसका हाथेली चुल्हे के ऊपर रखे उल्टे रखे तवे के पर जा लगता, वह झटपट खुद को सम्भालती कि कहीं उसकी शान-मिजात (फैशन- अदा) गड़बड़ तो नहीं हो गई होगी। इस चक्कर में उसके चेहरे पर बार-बार कालिख लगती जाती। झुकमुक (मुँह अन्धेरे) सुबह उसे साथी कौतिक्यारों ने चलने कि आवाज लगाई तो सभी चल पड़ी वह औरत जत्थे में सबसे आगे चल रही थी। जिस भी गाँव से गुजरती लोग उस हँसते हुए कहते, “आजक् कौतिक मोलपोसी (चितरौव जौ हनी बेजर की प्रजाती का पहाड़ी जीव है) सैणी“ महिला भी हँसते हुए अभिवादन में यही दोहराती। बहुत देर में उसे यह बात समझ आई कि वो अभी तक खुद पर हँस रही थी।

मैंने वह खूब दिन देखे है जब हम ठुलथल (पिथौरागढ़ में रामगंगा के किनारे) के मेले में जाते थे। शिवमन्दिर के प्रांगण में दूर दराज ब्याही गई बुआएं, बहनें, बेटीयाँ आयी रहती थी। वे सब आपस में गले-लग, मन भर रोया करती थीं। जी भर दुख सुख बाँटती थी। माँएं तरह-तरह के खान-पान, पकवान बना के उनके लिये ले जाये रहती। सब आपास में बैठते और खाते थे। यह केवल स्त्रियों के मिलन के कौतिक ही नहीं थे, बूढ़े-खग्गाड़ कलाकारों, वाद्कों के त्यौहार भी थे। बड़े-बड़े दमुवे रिंगाते (नगाड़े घुमाते) वे खग्गाड़ बीड़ीबाज कलाकार मेरी स्मृतियों में जस के तस हैं। भगनौल गायन में हाजिर जवाबी के लिये अलग से मण्डली जुटती थी। एक गायक यों शुरू करता
हे ऽ ऽ झंगरै की घान, रहट की तान,
धोइनी लुकुड़ी रैगे, खैंचीनी कमान,
कां उसा मनख रैगें, कां उसो इमान,
दुनियां दोरंङ है गे, बखत बेमान।
नालि कुटि छै माना हुंछी, उ दिन न्है ग्यान,
(अरे ओ झौगरें की घान (अखोल में कूटने के बाराबर) रहट की तान, घुली हुए कपड़े रह गये , खैंची गई कमान, आहा कहाँ वैसे मनुष्य रह गये कहाँ वैसे ईमान, दुनिया दुरंगी हो गई, बख़त हुआ बेमान, नाली (पहाड़ में अनाज मापने का मापक) कूटो तो छ माना (पाव) होते थे वे दिन चले गये।) इस तरह से वे अपना गयान शुरू करते और चैपाल में यह गीत खिंचता जाता। लोकगायक भगनौलिया त्वरित आसुकविता कर उसके पीछे नये-नये बन्ध और नये समाकालीन तंज कसा करते थे। यह कबीर पंथी और नाथमती चैपालें थीं, जहाँ ऊँच-नीच जाति-पाति लगभग नग्णय था। कलाकार की कद्र भगनौल की पहली शर्त होती जो जितना बड़ा आशुकवि वह उतना सम्मानित। राज्य बनने के बाद भगनौल-बैर व पारम्परिक गीत और उनके मूल गायक मंच से बाहर कर दिये गये, यह काम बड़ी चुप्पी से किया गया। जो संस्थाएं सरकारी मान्यताएं रखती थी उनके चैं-फौं भौं-पों करते भाँड क्रीम, पाऊडर, काजल घिस के मंत्री नेताओं और आला अधिकारियों के आगे पीछे केवल नाचते ही नहीं उन पर कसीदे कड़ते हुए गीत गाते हैं। मूल लोक कलाकर नेपथ्य में ही मर खप गये हैं, अब उनकी अन्तिम पीढ़ी ही पहाड़ में रह गयी है, वह भी जल्द खत्म हो जायेगी। हम जब बच्चे थे प्रेमचन्द के हमीद तो नहीं थे पर उससे कम भी नहीं थे। ईदगाह का चिमटा हमारे ख़यालों में जरूर रहा करता था। हम इस दुकान से उस दुकान खूब घूमते। पैसे से क्या करना कभी-कभी देखने भर से आन्नद आने लगता। थल में गज्जब हस्तकाला और दस्तकारी की दूकानें सजती थी। घर के बड़े-बुजुर्ग साल भर के मसाले , ढोके, डालिया (घास-गोबर के लिये) नाज के चटाई का इन्तजाम यहीे से करते। दन, थुल्में, ऊनी पंखी वैगेरह। वर्तनों में बड़े-बडे़ पीतल-ताँबे के तोले, लोहे की जाम (कढ़ाई) भड्डू (दालें और मांस पकाने के लिये) इसके साथ ही लकड़ियों के वर्तन बिन्डा (छांछ बनाने वाला ) ठेकी (दही जमाने के लिये) पाल्ले (नमक रखने लिये ) बिसौटा (मसालादान) यहीं से खरीदते थे। तरह-तरह के हिमालयी लोग, तरह-तरह के चेहेरे। हमारे मनवीय अन्तर्संबन्धों के उत्सव थे वे कौतिक। जिसे बाजार पूरी तरह निगल गया और सरकारें उन्हें संरक्षित करने के नाम पर टैंट लगाकर फूहड़ कलाकारों की जमातें भर एकठ्ठा करती रही और सरकारी बजटों को गटकते रही। पहाड़ में तीन आदिम प्रजातियों में सबसे पुराने आदिम समूहों के लोग भी थे। विविध धर्माें के साथ ही यहाँ आदिम प्राचीन बौनपा धर्म के प्रमाण भी हैं और कुछ समुदाय ऐसे भी हैं जो धर्माें के जंजाल से बचे रहे वे धर्म को जानते तक नहीं। कुछ ऐसे हैं जो अभी तक तय नहीं कर सके कि वे बौद्ध है या हिंदू। इस सभी विविधताओं का सम्मश्रिण ही यह मेले त्यौहार-कौतिक थे। निसंदेह इनमें झगड़े भी थे, इनके नायक भी थे और खलनायक भी। पर वे अतिमानव कतई नहीं थे। हमारे परिवार से एक शौका परिवार की मित्राम (मित्रता) थी वे थल से दन, थुलमा बेचने आया करते थे। कभी कभी स्वाग और मसाले भी ले आते। मैं उन्हे शौकाबू (शोकादादा) कहा करता था। जब वे आते तो मैं उनसे डर जाता। वे पिता के साथ खूब बातें किया करते थे। मैं खूब खुचुर-बुचुर किया करता था। ईजा कि तर्ज पर कहूँ तो मेरे हाथ-पैर एक जगह नहीं रहते थे। पिता कहते, “तुझे हम शौकाबू को दे देगें तू उनके भेड़ चरायेगा।“ मैं खुश हो कहता, “हाँ! आज ही देदो मुझे शौकाबू को।“ शौका बू कहते “चल नाती तुझे कड़बछ में डाल के ले जाऊँगा।“ मेरे दिमाग में उनका कड़बछ शब्द आज भी घूमा करता है। पड़ोस के लोग भी मुझे मेरी आँखों की वजह से शौका कहा करते थे। आँखे तो हमारे परिवार में सबकी ही डबडब और छोटी ही थी गोरखाओं जैसी, जैसा कि हम उनके सहवंशी खस थे भी। पर मेरा चेहरा भरा होने के कारण वो ज्यादा ही छोटी थी। बाद के वर्षाें में जब में इन्हीं बूबू के घर गोल (एक स्थान जिसका नाम गोल है) में किराये में रहा तो खूब भोटिया महिलाएं कहती यह तो हमारा ही बच्चा है। वे बहुत स्नेहिल थी। शोकाबू की आमा (दादी) दिन भर दन बुना करती। अंगुलियों से जाल पर ऊन फसाते हुए, फिर एक छोटी दराती नुमा जिसमें उल्टी तरफ धार होती हैं उससे वह वह ऊन के रेशे काटती रहती थी , एक कैंची से उसे बराबर करती। ऊन रगंती और खूबसूरत नक्काशी में बदल देती थी। यह जिन्दगी की कविता थी। मैं उनकी बुनाई को देखता रहता । पर मैंने उनके हाथ कभी नहीं देखे, एक दिन अनायास उनके हाथ देखे तो चैंक पड़ा, उनकी अंगुलियाँ इस काम में घिस चुकी थी। मैने कहा, “आमा आपकी अंगुलियों को क्या हुआ है?” वे बोली, “नाती बचपन से यही काम किया बच्चों को दन, थुलमा बेच कर ही पढ़ाया, अब वे पढ़ गये, नोकरी लग जायेंगे तो ही इन हाथों को आराम मिलेगा। आज भी जब किसी बूढ़ी सौका महिला को देखता हूँ तो गोल की आमा (दादी) याद आती है। कोई ऊन दन थुलमा की बात करता है तो वे हाथ अनायास ही आँखों के आगे तैर जाते है। एक दिन जब मैं नैनीताल आ चुका था, थल में आमा मिली तो झट से पहचान लिया कहा, “चल पार चल (रामगंगा के पार) आज वहीं रहेगा।“ रोने लगीं कहा, “तू तो हमारा ही बच्चा है। अब मुझे भूल गया शायद।“ उस दिन पता चला कि अब आमा दन नहीं बुनती और शौकाबू भी चल बसा है। बच्चे भी सब बाहर नौकरी को चले गये है। आमा वहाँ अकेली रहती है जैसे मेरी ईजा। अब मैं देखता हूँ कि इधर लगातार हमारे पहाड़ों में इन घनिष्ट रिश्तों में भी बड़ी खटास आनी शुरू हुई है। मुझे आश्चर्य तब हुआ कि जब पछिले साल मुझे एक ’रं’ (चैंदास, ब्यांस, दरमा घाटी के शौका) मित्र ने बताया कि पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय में उसके चहेरे और आँखों में फब्तियाँ कसी गई जिससे उसे बहुत बुरा लगा । मैं इसे अपनी छोटी आँखों की वजह से मसूहस कर सकता हूँ कि यह कितना अमानवीय है। मैं जब कहीं आता जाता हूँ तो स्वयं पहाड़ी भी मेरी आँखों को लेकर अजीब से सवाल करते हैं। एक बार एक परिवार में गया तो उस परिवार के लोगों ने जो स्वयं भी पहाड़ी थे मुझसे कहा कि तुम्हारी आँखें छोटी क्यों है? यह अजीब सवाल था जिसका मैं कई बार सामना करता हूँ। पहले कुछ असहज हो जाता था अब गर्व से कहता हूँ, “मैं हिमालय का रहवासी हूँ अपने चेहरे में अपना भूगोल लेके चलता हूँ, जो इस वैश्विक होते समय में सबको बताता है कि यह मैं हूँ। मेरी पहचान है आपका कोई दिक्कत?“ लेकिन जब मैंने सुना कि ’रं’ साथी के चेहरे-मुहरे पर पिथौरागढ़ में फब्तियाँ उछाली गई तो मैं और दुखी हो गया। पिथौरागढ़ जैसे सीमान्त जिले में वे ही नौजवान लोग इस तरह की नश्लीय टिप्पणी कर सकते हैं जो अपनी जड़ों से कटे हुए हैं। जिन्हे हमारे अन्तर्संबन्धो के बारे में कभी बताया ही नहीं गया। जिन्होंने कत्यूर राजा मालूशाही और भोट (गोरी नदी की शीर्ष उपत्यका मल्लाजोहार तथा रामगंगा की शीर्ष उपत्यका तल्ला तहसील मुनस्यारी) सुन्दरी राजुला की मार्मीक प्रेम की लोक कथा को सुना ही नहीं। निसंदेह दुनिया बहुत आगे पहुँच चुकी है पर शान्ति और भाईचारे को बनाये रखने के लिये आयातित विचारों से कुछ असर नहीं पड़ने वाला । नई पीढ़ी तक अपनी इन भावनात्मक लगावों के किस्से जरूर पहुँचाने होंगे। मैंने एक बार एक गीत सुना था शायद भारत से लगे पश्चिमी नेपाल के सीमान्त इलाके में । गीत इस तरह से था,
एल भौटिया भौट रै ग्यो
नून दिनै कौ छै ना
(इस बार भौटिया भौटान्तिक में रह गया अब नमक कौन देगा)
भोटान्तिक प्रदेश को शेरिंग 1906, स्मिथ 1030 आदि ने इस तरह व्याख्यातित किया यदि कपकोट और अस्कोट के बीच एक सीधी रेखा खींच दी जाय तो इस रेखा के उत्तरपूर्व का क्षेत्र भोटप्रदेश कहलायेगा। यह गीत बहुत पुराना गीत रहा होगा जो हमारी रोजमर्रा की जरूरत के साथी थे, उनके लिए यह केवल गीत ही नहीं है बल्कि उस मौखिक इतिहास का ज्वलन्त दास्तावेज है जिसे चारण और चाटुकार व राजा और सेनापति हजम कर गये। मेरे गाँव ऊपर से गंगोली का क्षेत्र है। ठीक रामगंगापार सिरयाली क्षेत्र जहाँ कभी प्राचीन सीराराज्य होने का प्रमाण मिलता है हाल फिलहाल मेरे अग्रज लोकविद् प्रयाग जोशी ने सीराराज्य की बहियों के आधार पर उस क्षेत्र के इतिहास को खोलने के नये प्रस्थान बिन्दु को हमारे समाने रखा है। अगर हमने पहाड़ बचाने है तो उसके इन संबन्धों की संवेदनशीलता को बनाये रखना होगा। हमारी विविधता में ही हमारी रंगचंगिली संस्कृति का इन्द्रधनुष हिमाल के आर पार काली के आर पार तन सकेगा यही हमारी पहचान है। मैं उम्मीद करता हूँ कि हमारे रिश्तो की लावण्यता (नमक) बची रहेगी, बचा रहेगा ढूंगछा(नमक)

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4 thoughts on “अपनी माटी अपना बचपन- 10”

  1. पंन्त जी बहुत बढ़िया समय मिलने पर आपकी पूरी पोस्ट पडुंगा.

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