यंगिस्तान

अपनी माटी अपना बचपन 13

जुलाई 31, 2017 ओये बांगड़ू

डाक्टर अनिल कार्की के अपनी माटी अपना बचपन की यह 13वीं किश्त ‘दूधभाषा’ आपकी अपनी निजी भाषा और इसके इतिहास को लेकर है,हम अपनी दुधबोली को ही किस तरह नकारते आ रहे हैं उसकी एक बानगी है पढ़िए

लेखक अनिल कार्की

संसार में सबके पास अपनी भाषा है। किसी के पास एक, किसी के पास दो, किसी के पास तीन या इससे भी अधिक। हम खुशकिस्मत हैं कि हम तीन से ज्यादा भाषा बोल लेते हैं। भारत भाषा समुदाय की दृष्टी से सपन्न है। हमारी भाषाएं हमारे मौखिक इतिहास और स्मृतियों की शब्दकोश है। अपनी माटी और उससे लगााव मेें भाषा का भी अपना एक महत्वपूर्ण पक्ष है। हम जिस परिवेश में पले बढ़े और तुतलाना सीखा, दरअसल उसी परिवेश की भाषा ने हमें पहले पहल अपने आस पास की दुनिया से संवाद कर सकने की क्षमता प्रदान की। मैं भी हम उम्र बच्चों की तरह हजारों शब्दों को लेकर और सैकड़ों भाव भंगिमाओं को सीख के स्कूल पहुँचा। पर यह क्या पहले ही दिन मुझे अपनी भाषा से अलगाव करवाया गया। पहले दिन मैंने अपनी प्राथमिक शाला में मासाप पूरन सिंह से बाथरूम जाने के लिये आज्ञा ली। आज्ञा इस तरह से थी, “मासाप-मासाप मुतन करने जाऊँ?” हमारे सारे बड़े विद्यार्थी हँस पड़े। मासाप भी अपनी हंसी न रोक सके । सच में उसी दिन से मेरे भीतर अपनी भाषा को लेकर विश्वास डगमगाने लगा। पहली बार मुझे लगने लगा कि जो भाषा मैने बोली वह गंवारों की भाषा थी जिसे समझने के बजाय जिस पर केवल हंसा जा सकता है। यह महज एक घटना नहीं थी, यह मेरी भाषा के साथ की गई पहली क्रूरता थी। जिसकी छाया मेरे जीवन भर मेरा पीछा करने वाली थी। अंग्रेजी को छोड़ दीजिये जिस हिंदी ने शुरूआती दौर में लोकभाषाओं से अपना घर भरा वह तक एक समय बाद लोक भाषा से ऐसा छुआछूत करने लगी कि पूछिये मत । हमारी अपनी भाषाओं को दबाने में थोंपी गई हिंदी की भी कम भूमिका नहीं है। मैंने बचपन में ठ से ठठेरा पढ़ा था। कई सालों तक मैने ठठेरा नहीं देखा, बस उसका चित्र भर हमारी किताब में था जिसमें वह हथौड़े से कुछ ठोक रहा होता था। एक बार मैने अपने मासाप से पूछा, क्या ठठेरा और हमारे गाँव के ल्वार एक ही ठैरे मासाप? मासाप ने बुरी तरह से डाँट दिया, “नहीं! ठ माने ठठेरा और ल माने ल्वार।” जबकि ल माने लट्टू होता था, जिसे हम धुर्या करते थे जो जंगली बेल को भीतर से कोर के बनाया करते थे। बड़ा गज्जब यंत्र बनाते थे बेल को कोरने के लिये । एक लोहे के तार का मुँह पिचका के एक तरफ पंचकस की तरह सीधा छोड़ देते और दूसरे और इसी पेंचकस को मोड़ देते। एक से बेल के दोनों शिरों पर छेद करते और दूसरे से उसके भीतर का गूदा साफ करते। फिर एक पाया बनाते उसे बेल के दोनों शिरों से आर पार करते थे। जड़ की तरफ जहाँ बेल टहनी में लगा रहता उस तरफ पाया छोड़ देते और ऊपर के शिरे के बराबर उसे पाये को काट देते । पाॅलेथीन जला के उस पाये को बेल में यों चिपका देते की भीतर हवा न जाये, बेल के बीच में एक छेद करते । तब एक रस्सी से जो पाटके जो कि एक लकड़ी का होता उस पाए पर धागा गोल मोड़ के जोर से खींचते और बेल का लट्टु जब नाचता तो गज्जब नाचता था। गति के साथ ही वह ज्यों ज्यों तेज से धीमा होता जाता हवा के संग उससे अलग अलग ध्वनि निकलती थी। जिस लट्टु या धुर्या नचाने वाले के घुर्या से तीन या पाँच अलग अलग ध्वनि निकलती हम उसे सबसे अच्छा घुर्याबाज माना करते। मेरा एक घुर्या पाँच भकिया (ध्वनि) वाला था । जिस लट्टु को हमने किताब में पढ़ा हमें लगता था कि वह भी घुर्या जैसा ही होता होगा। एक बार मैंने अपने मासाप से पूछा, “क्या? घुर्या और लट्टू एक ही हुए।“ वे ठहाका लगा के हँस गये? फिर मैंने उनसे कभी दुबारा नहीं पूछा। बहुत दिनों तक मैं मानता रहा कि घुर्या अलग चीज है और लट्टु अलग चीज। पर एक बार थल कौतिक (मेले) एक खिलौने वाला चिल्लाया कि लट्टु ले लो। मैं उसके पास दौड़ा सा गया, देखा वह बेल के घुर्या सा ही था पर अन्तर यह था कि उससे गति के साथ हवा पाकर तरह तरह की आवाजें नहीं आती थीं। केवल भुर्रराता भर था। यह देखने में एक सामान्य घटना थी पर यह घटना आज भी जस कि तस है। आज भी भाषा को हम दर्शन और फिलाॅसफी की तरह नहीं देखते। उसे जटिल और भयानक व्याकरण के नियमों में बाँध देते है। आज समझता हूँ कि शायद उस समय मैं अपने आस पास के परिवेश से इतना गहन जुड़ा था कि शिक्षा का मतलब मेरे लिये शायद अपने आस पास की चीजों को और बेहतर जानना रहा हो। अपने आस पास की चीजों को किताब से जोड़ने की लालसा मुझमें बहुत बलवती थी, बालमन कि अपनी जिज्ञासाएं थी। मैं अपनी दुधबोली (मातृभाषा) कुमाऊनी में केवल गर्व नहीं करता बलकि उसमें जो स्मृतियां हैं जो कोश है उससे संवाद करता हुआ अपनी जड़ों तक पहुँचता हूँ। मैं अपने परिवेश से अलग के नामों जानवरों और पंछीयों को अपनी मातृभाषा के बोध से नहीं जानता। जैसे घड़ियाल, ह्व्ेालमछली, हाथी इनको मेरे बचपन ने जैसा पढ़ा वैसा ही कल्पना करता रहा। मुझे लगता है कि हम भाषा के नाम पर कभी बच्चों के साथ न्याय नहीं कर पाते। इस विषय में चाहता हूँ कि पहले हम न्गुगी वा थ्योंगो के इस कथन को पढ़ें। “किसी भाषा के संप्रेषक पक्ष को उसके सांस्कृतिक प्रतीकों से अलग नहीं किया सकता । अंग्रेजी भाषा को टेम्स (एक नदी) से , ऐफिल टाॅवर को फ्रेंच से, इतावली को पीजा की मीनार से, अरबी को मक्का से, किस्वाहिली को मोम्बासा से अलग नहीं किया जा सकता । किसी भाषा को उसकी संस्कृति में जानना उन लोगों के प्रति सच्ची श्रद्धांजली है जिनकी यह भाषा है यह अच्छी बात है। हम लोगों के लिये जो भूतपूर्व उपनिवेशों के हैं, भाषाओं के साथ के स्वाभाविक संबन्ध विकसित करने में गड़बड़ी इस तथ्य ने की है कि यूरोप की भाषा को , या अंग्रेजी को इस तरह हमें पढ़ाया गया जैसे यह हमारी अपनी भाषा हो, इस तरह पढ़ाया गया गोया जैसे अफ्रिका के पास साम्राज्यवादियों द्वारा लाई गई भाषा के अलावा अपनी कोई खुद की ज़ुबान ही न हो।” इसको पढ़ने के बाद मैं समझ पाया कि हमारी कुमाऊनी या गढवाली के साथ अन्य भाषाएं ऐसे मिली जैसे वे उनसे बड़ी हो और गंवारपन में मुक्त हो, उसने हमें पग पग यह यह एहसास करवाया कि नहीं हमारी भाषा गंवारों की भाषा है। कुमाऊँनी अभिजात तपके के लोगों को हमारी भाषा तो छोड़िये हमसे भी बदूबू महसूस करते रहे । अभी हाल हाल के वर्षों तक तो हमारी मातृभाषा को हमारा ही अभिजात तपका भनमजुओं की मातृभाषा कहा करता था। मेरे प्रिय कथाकार शेखर जोशी की कहानी दाज्यू का नया पाठ भाषा के उस अभिजात की हिंसा है जो जिसमें दाज्यू कहने वाले पहाड़ से आये एक होटल वेटर पर अत्याचार किया और दाज्यू शब्द को अपनी प्रेस्टीज सम्मान पर दाग की तरह देखा। यह कितनी भयावह स्थिति है। मैं जब काॅमर्स की पढाई कर रहा था तो गाँव के लोग कहा करते थे काॅमर्स से पढ़ रहा लड़का होशियार है पर जैसे ही मैंने हिन्दी में दाखिला लिया तो कहने लगे हिंदी भी कोई विषय है। मेरा मजाक बनने लगा । यह माजरा क्या है? कौन से वे मनोवैज्ञानिक कारण हैं जो भाषा के नाम पर अंग्रेजी के अलावा कुछ और कभी स्वीकार ही नहीं करते। कुछ लोग कहते हैं कि भाषा वह जिसकी वर्णमाला हो, भाषा वह जिसकी अपनी लिपि हो, भाषा वह जिसका व्याकरण हो, कई लोग तो यह इस भ्रम में रहते हैं कि वे मातृभाषा का मतलब ही नहीं जानते। आईये आज अपनी माटी अपनी बचपन में भाषा पर बात करते हैं एक बच्चे की भाषा । भाषा के मामले में किसी बुजुर्ग से बच्चा ज्यादा संवेदनशील होता है। हम भाषा को हमेशा कमतर आँकते हैं। अब तो जैसे वह कोई नग्ण्य चीज हो गई हैं। कभी कभी मुझे लगता है कि हम भाषा के नाम पर अपने छोटे छोटे बच्चों की जुब़ाने छीन लेने को अमादा हो जाते है। हिंदी का विद्यार्थी होते हुए मैने महसूस किया कि हिन्दी में अपने रूचि से बहुत कम आते हैं। बाकि वे होते है जिन्हें कहीं प्रवेश नहीं मिलता। क्या हम भाषा के नाम पर बच्चों के साथ अन्याय नहीं करते? मैं कई बार सुनता हूँ कि इस दौर की सबसे बड़ी कमी खुद को व्यक्त न कर पाना है। जो तनाव की मुख्य वजह है। क्या इसके मूल में भाषा नहीं? हमारा बचपन गाँव में बीता हमने मूर्त और अमूर्त में भाषा के सभी रूप ध्वनि, संकेत, भंगिमाओं को हू बहू नकल करता अपने आस पास से सीखा। हम धीरे धीरे एक सुपरिभाषित मानक भाषा तक पहुँचे है। मैं बचपन में कई जानवरों की आवाजें निकाल लेता था। जिसमें बकरी, कुत्ता, मुर्गा, कुछ एक पंछी भी शामिल थे। भाषाओं की विविधताओं को लेकर रसूल हमजातोव कका ने अपनी किताब में लिखा, “मेरे लिये विभिन्न जातियों की भाषा आकाश में सितारों की तरह हैं। मैं यह नहीं चाहता कि सभी सितारे आधे आकाश को घेर लेने वाले अतिकाय सितारे में मिल जाएं। इसके लिए सूरज है। मगर सितारों को भी तो चमकते रहना चहिए। हर व्यक्ति का अपना सितारा होना चाहिए। मैं अपने सितारे अपनी आवार भाषा से प्यार करता हूँ। मैं उन भूतत्ववेत्ताओं पर विश्वास करता हूँ। जो कहतें हैं कि छोटे से पहाड़ में भी बहुत सा सोना हो सकता है।“ जैसे दागिस्तानी पहाड़ में जु़बान को लेकर किस्से और गालियाँ है वैसे ही हमारे पहाड़ में जुबान की महत्ता और नीचता पर सैकड़ों गालियाँ, कहावत, किस्से मिल जायेंगे पहला उदाहरण तो एक दम साधारण है, “खाप से कौन जीता।“ मतलब कि बोलने वाले से कौन जीता। तेरी खाप फोड़ी द्यूँल (तेंरी जुबान फोड़ दूँगा) इसी तरह से बुरी जुबान या जुबान चलाने वालों के लिये, ’तेरी खाप में किड़ पड़ि ज्यून’ (तेरी जुबान में कीड़े पड़ें) या कि झूठ बोलने वालों के लिये ’तेर जिबड़ सड़ि जो’ (तेरी जीभ सड़ जाये)। “चिफली खाप” (फिसलनदार जुबांन जो मता ले बहला फुसला ले)। कुछ तो भाषा की पूरी महत्ता को बता जाते हैं जैसे यह कहावत, ”जैकि खाप चली वीक नौ हल बल्द चलै“ (जिसकी जुबान चलती है उसे कोई (सामाजिक राजनैतिक) कमी नहीं होती नहीं, उसके खेतों में को नौ जोडे बैलों से जुताई होती है)। इसी तरह से एक और कहावत है “लाख लखपति क घर में या ठगपतिक मुँख में।” (लाख रूपये या तो लख पति के घर होते है। या उस वाचल चतुर ठगने वाले के जुबान में)। जुबान यानि कि संवाद क्या अज्जब चीज है उसके महत्व को लेकर जितने पुराने कथा किस्से जुबान पर पाये जाते हैं उतने मनुष्य के किसी भी अंग में नहीं मिलते।
अपनी दुधबोली आना या आने को लेकर जब मै अपने नई पीढ़ी या अपने से उम्र में छोटे (मैं मानता हूँ कि कोई किसी से छोटा बड़ा नहीं होता) लोगों से पूछता हूँ क्या तुम्हें अपनी दुधबोली मातृभाषा आती है? तो हमारी पीढ़ी के साथियों का जवाब अजीब होता है वे कहते हैं, “समझ तो जाता/जाती हूँ पर बोलनी नहीं आती। घर में मम्मी पापा बोलते हैं कभी कभी तो हम सब समझ लेते हैं।” ये बड़ा हास्यास्पद जवाब होता है जिस भाषा को आप समझ लेते हो उसे बोल भी सकते हो। यह तो ऐसा ही है कि जैसे कोई कहता हो मुझे मालूम तो है धरती पर बीज बोने से वह पौध बन उग आता है मुझे उगा हुआ पेड़ तो दिखता है पर उसकी जड़ नहीं दिखती। अरे भुला/भुली/दगड़्यो ( भाई, बहन और दोस्तो) आप लोग कोशिश तो करो आपके भीातर पूरा हिमाल है उसकी जड़ें खण्ड , खण्ड, रोम रोम है। अपनी भाषा में संवाद करने का मतलब किसी की भाषा का अपमान नहीं है । अपनी दुधबोली में बतियाते फसिकियाते हुए हम दूसरे की भाषा का सम्मान करें । वो भाषा हिंसक है जो दूसरे की दुधबोली का मजाक बनाती है। अपनी भाषा में बतियाते हुए हम अपनी जड़ों से बतिया सकते है। अपने पहाड़ से फसक-छुईं-कुराकानि लगा सकते हैं। जैसे किसी घाटी में खुद को आवाज देने पर पहाड़ हमें हमारी आवाज में हमें दोहराता है ठीक वैसे ही। . बारहाल बुजुर्गों ने एक सटीक बात कही है “काल ग्यो कहावत रै ग्ये“ (समय बीत गया कहावतें रह गई) वह भी छूट जायेगा जो कहना है जो जानना है। पर सबसे पहले खुद को जानना जरूरी है खुद को जानने का पहला चरण ही खुद की भाषा को जानना है। समय बीता कहावत रह गई मैंने कही कहीं पढ़ा था कि भाषा मनुष्य की सबसे चम्तकारिक खोज थी। हमारी भाषा हमारी शब्दकोश है स्मृतिकोश है इसे हमारे पुरखों ने अपार ज्ञानमय और इस कहावत की तरह बनाया है “आपनी आपनी क्ये ग्या चार दिन रै भेर न्ये ग्या।” (अपना अपना अनुभव इसे दे गये। अपनी अपनी गाथा कह गये और चार दिन इस संसार में रह के फिर चल बसे।) पूरे हिमालय में करीब तीन सौ भाषाओं के बोले जाने के प्रमाण मिलते हैं जिनमें से 52 भाषाएं अभी जीवित हालातों में मिलती है। इधर भले ही कुमाऊनी के नाम पर केवल खास परज्या (मुख्य शहर अल्मोड़ा और उसके आस पास बोली जोने वाली) को ही केन्द्र में मान लिया गया है। परन्तु खासपरज्या हमारी केवल एक पहचान है पूरी पहचान नहीं। कुमाऊँ और गढ़वाल जौनसार में बहुत सी भाषाएं बोली जाती है। वे सभी बोली जाने वाली भाषाएं दरअसल हमारी पहचान है और एक जीती जागती स्मृतिकोश भी। हमको सोचना चाहिए कि सबकी ठसक को कैसे जिन्दा रखें। सरकारें बाजार की भाषा बोतली हैं आओ हम मनुष्यता की भाषा अपनी दुधबोली बोलें । अपनी दूधबोली के साथ ही दुनिया की तमाम भाषाओं के संग जुड़ें। दुनिया का रास्ता अपनी जन्मभूमि अपने गाँव की पंगडंडी से ही होकर आगे बड़ता है हमारी दूधबोलियाँ भी हमें अपनी पहचान के साथ दुनिया की और भाषाओं से मिलवा देंगी। बस उन्हें बराबरी में देखे जाने की जरूरत है।

अनिल कार्की द्वारा रचित अपनी माटी अपना बचपन के पुराने अंश पढने के लिए यहाँ क्लिक करें 

अपनी माटी अपना बचपन भाग -12

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