यंगिस्तान

अपनी माटी अपना बचपन -5

जून 1, 2017 ओये बांगड़ू

डाक्टर अनिल कार्की कवि हैं लेखक हैं और पहाड़ का मर्म समझने वाले पहाडी हैं, अपने आस पास के ठेठ पहाडी पन को बड़ी ख़ूबसूरती से शब्दों में पिरोते हैं और देश विदेश में बैठे पहाड़ियों को वो फील करवा देते हैं जो वो पहाड़ में रखकर भूल गए हैं. इनके लेखनी के जादू की ये संस्मरण वाली पांचवी किश्त है ‘हा चड़ी हा !” जो आपको आपका बचपन याद दिलायेगी. लीजिये यह पाँचवा पाठ पूर्व के पाठों को आपने खूब पसंद किया जिसके लिए तहेदिल शुक्रिया .

बैलों के साथ लेखक डाक्टर अनिल कार्की

वैसे तो लोक कथाओं में पंछीयों के बहुत जिक्र मिलते हैं। पर बच्चे का पहला परिचय तो गोरैया (गेड़, ग्वींड़, घिनौड़ी घिदुली) से ही होता है। छायावाद के कवि गुसांईपंत ने आह्लादित हो कभी किसी पंछी से पूछा था,

“प्रथम रश्मि का आना रंगिणि! तूने कैसे पहचाना?“
कहाँ? कहाँ हे बाल-विहंगिनि सीखा तूने यह गाना?

हमने उनकी रंगिणि तो देखी नही, पर अंदाजा लगाया कि वह गोरैया (गेड़, ग्वींड़, घिनौड़ी घिदुली) ही रही होगी। बालपन में हमने भी गोरैया (गेड़, ग्वींड़, घिनौड़ी घिदुली) से बहुत अंड-संट पूछा था। पर हम ठेठ गंवारों का बचपन कोमलकान्त पदावली की भाषा में कैसे अटकेगा? इसलिये पंछीयों की याद के लिये मेरे पास कविवर पंत सी कूँली (कोमल) भाषा नहीं है जो आपके अन्तरमन को मस्यार (सहला) सके। हम तो निरा भ्यास ठैरे जिन्हें खरोंचों ने ही गढ़ा-मढ़ा। पहाड़ में पंछियों से जुड़े सैकड़ो किस्से हैं, जो मैंने बड़े बुजुर्गों सयानों से सुने उन्हें धीरे धीरे पूरा लिखूूँगा।
मुझे लगता है गोरैया से लगाव शायद किसी भी बच्चे का पहला लगाव होता होगा। क्योंकी वह घर की पाख पर ही तो रहा करती थी ।
गाँव में खेती बाड़ी थी, काम भी था। घर के हर बढ़े और बच्चों के काम बँटे रहते। छोटे से छोटे काम से लेकर बड़े से बड़े। बचपन में मेरे कुछ काम बँधे थे जो मुझे करने ही होते। उन कामों की लम्बी फेहरिस्त है। उन्हे ठीक-ठीक तो नहीं गिना सकता, पर कुछ काम ऐसे थे जिन्हें करते हुए सचमुच आन्नद आता था। उन्हीं में एक काम था बिस्कुण (सुखने को फैलाये गये अनाज) से चिड़ियां भगाने का।
ठीक ऐसे ही बरसातों में सुबह उठते ही मुझे घोघस्याड़ी (मक्कों के खेत) में, कनिस्तर को रस्सी से ढोल सा बाँध, गले में डाल के बजाते हुए तोते भगाने होते थे। मुँह से, “हा चड़ी हा!” कहना पड़ता था। मैं जब कनिस्तर बजाता तो उस पर छलिया बाजा (एक कुमाऊनी नृत्य का बाजा) बजाने लगता, मुँह से “हा चड़ी हा!” कहना भूल जाता। पिता घर के छज्जे से गरजते “बाजा लगाने को नहीं भेजा है खेत में तुझे! मुँह पर ताला लगा है क्या? हकाहाक कौन लगायेगा? नालायक, बेवकूफ!” और जाने क्या क्या।
जेठ दुपहरों में अनाज मोस्टों में सुखता था। मोस्टे बांस-रिंगाल से बनी मोटी चटाई होती थी। जो नाज सुखाने के अलावा बहुत से और कामों में इस्तेमाल होती। वह चटाई धूप से इतना अकड़ जाती कि मोड़ के गोल करने में टूटने का डर बना रहता था। इसलिये उस पर गाय-बैल का मूत्र बराबर छिड़कना होता था। हमारा एक काम यह भी था कि जैसे ही जानवर गौंतने (मूत्र करने) लगता हम बाल्टी लेकर उसके पीछे खड़े हो जाते। इस प्रक्रिया के दो फायदे थे मोस्टा तो कोमल होता ही था जिससे मोड़ने में आशानी होती थी, साथ में अनाज के लिये भी यह कीटनाशक का काम करता था। हम उन दिनों गाय-बैल चराने जाते तो, जंगल से जानवरों का सूखा कड़क गोबर कट्टे में भर के लाते। आँगन में उसके छोटे-छोटे चट्टे बनाते। उनके बीच जला हुआ छिलुक (चीड़ की तेलीय लकड़ी जिसे पहाड़ में आग जलाने और उजाला करने के काम में लाया जाता है) डाल देते । वह छिलुक धूँ धूँ कर धमतारी में भभक के जलने लगता, कुछ देर में सूखा गोबर राख हो जाता। राख होने के बाद घर का बुजुर्ग उसे छलनी पर छानता और अनाज के ऊपर उस महीन राख को छिड़का जाता। फिर उस फैले बिस्कूण (अनाज) पर कदमों की अजीब, नृत्य भंगिमा से वृताकार घूमा जाता। पैरों के पैताले से अनाज को राख के साथ रगड़ते हुए हम बच्चे घर के बड़े-बूढ़ों के पीछे वृताकार नृत्य सा करते और पैरों के पैताले नाज (अनाज) की कुतकुताली (गुदगुदी) यों लगती कि हम उसकी रंगत में खुश हो नाच करने लगते । यह क्रिया ‘ईटो’ लगाना कहलाती कहीं इसे ’छार लगूँण’ भी कहते हैं। माना जाता था कि, इसको लगाने के बाद अनाज पर कीड़ा नहीं लगता, वह खराब नहीं होता। अनाज को भकारों (लकड़ी के बड़े बक्सेनुमा भंडार) में धरने की अन्तिम प्रक्रिया में हम जगंल से तिमूर (काली मिर्च की एक औषधीय जंगली प्रजाती) के पत्ते ले आते। उसे भकार के तले पर बिछा के अनाज रख देते। यह हमारे पहाड़ के पंरपरागत कीटनाशकों के तरीके थे।
आज सोचता हूँ, बाजार भी क्या अजब चीज है। बाजार ने कभी हमारी इस समझ को कृषि का पंरम्परागत गंवार तरीका कहा। ये वही बाजार था, जिसने हमारी कृषि के तरीकों को अपनढ़ और गवाँर तरीके की कृषि कहके धरती की छाती में राशायनिक खादों के मार्फत जहर भरा। लोगों को अपने परंपरागत जैविक खेती के तरीकों से विमुख किया। आज बाजार वही तरीका अपना कर सभ्य जैविक खेती कर रहा है । अब यह जैविक अनाज खा पाना आमजन के लिये बहुत मंहगा है। मैं इन सब में एक साजिश ही देखता हूँ, कैसे बाजार ने हमारे तरीकों पर कब्जा कर उसे हमारी पहुँच से दूर किया। हमें बदले में राशायनिक युक्त सब्जी-नाज या फिर चाऊमीन, मोमो थमा दिया।
बचपन में जब हम जब सूखाने को धरे गये नाज की रखवाली कर रहे होते थे तो गोरैया को फंसाने के लिये तरह-तरह की तरकीबें ढूँढ़ निकालते । उनमें एक तरीका था, नाज (अनाज) के बीच सूप को सीधा खड़ा उसे एक लकड़ी से टेक दे देते थे । लकड़ी के नीचे जड़ पर एक रस्सी बाँद के दूर छाया में बैठ के उसका शिरा हाथ में ले लेते। लड़की को सूप में यों टेकना होता था कि एक हल्के झटके साथ सूप धप्प से गिरे और गोरैया उस सूप के भीतर कैद हो जाय। एक बार मैंने ऐसे ही कुछ गोरैया पकड़ ली और जिद करने लगा कि इन्हे पिंजरे में पालूँगा।
ईजा ने समझाते हुए कहा, “यह पिंजरे में नहीं रह सकती। मर जायेगी। पिंजरे में तो तोता रहता है।“ मैने हट पकड़ ली, “मैं इन्हें पिंजरे पर ही रखूँगा।” तब ईजा ने एक मार्मिक कहानी सुनाते हुए कहा, “यह तो देवता के दूत होते हैं।” कहानी इस तरह से थी, एक औरत का पति दूर देश नोकरी पर था। वह औरत अपने सास के साथ रहा करती थी। सास बहुत बुरी थी, वह अपनी बहु को प्रताड़ित करने का कोई मौका नहीं छोड़ती। सास के पास प्रताड़ित करने के अनौखे तरीके थे। वह बहु को पानी लेने भेजती तो बिना बर्तन के ही भेजती और कहती, “पानी भर लायेगी तो ही घर लौटना।“ बहु रोती-विलापती और प्रकृति उसकी सहायता के लिये पशु-पक्षीयों को भेज देती। पानी उसके लिये सोल (सेही) अपनी पूँछ पर भर लाता। सास समझ ही नहीं पाती कि वह कैसे पानी भर लाई। घास के लिये बिना दराती और रस्सी के ही भेजती कहती, “अगर घास नहीं लाई तो घर मत लौटना।” बहु जंगल जाती, रोती-विलापती चूहे उसका विलापना सुन के बिलों से बाहर आ के उसके लिये घास काटते। कटी घास को कैसे बाँधे यह सोच के दुखी होती तो बिलों से साँप आके उसके लिये रस्सी बन जाते। इस तरह वह घास घर ले आती। एक बार खूसट सास ने उससे कहा, “तेरा पति घर आने वाला है, उसे साल जमाल (पहाड़ों पर पाये जाने वाली एक धान की प्रजाति जिसके चबेने बनाये जाते है) के खाजे बहुत पसंद है। जा इस साल जमाल को कूट के ला।” वह मन ही मन खुश हुई कि उसका पति आ रहा है। कुछ दिन वह खुशी से बिता सकेगी । सास ने गरज के कहा, “ज्यादा सपने न देख जा इन्हे कूट के ला, बिना मूसल के। न ला पाई तो घर न लौटना।” दुखी औरत ओखल के पास जाकर रोने लगी । तभी गोरैया का एक झुण्ड पास आया और कहा, “तुम रोओ नहीं, हम तुम्हारे धान से चावल निकाल देंगे।” सब धान पर बैठे और कुछ ही समय में उन्होंने उससे चावल निकाल लिये। औरत खुश हो घर लोटी और चावल अपनी सास के आगे फैला दिये। सास इतनी खूसट थी कि वह चावल का एक एक दाना गिनने लगी और एक दाना कम निकल गया । बहु को बुला के कहा गया, “तूने वह चाँवल का दाना खा लिया है। चोर है तू।” बहु रोने लगी उसने गोरैया के झुण्ड को एक चावल का दाना ढ़ूँढ देने को कहा। एक गोरैया ने अपने झुण्ड से कहा, “सब अपने अपने चैंच देखो, कहीं कोई चाँवल का दाना अटका तो नहीं है?” एक बूढ़ी गोरैया के चोंच पर एक दाना मिला, वह उसे लेकर सास के पास गयी और कहा, “मैं चोर नहीं यह है तुम्हारा चांवल।“ ठीक इसी समय उसका पति दूर देश से लौटा। गोरैया का सारा झुण्ड आँगन में आ गया, सेही दौड़ के पहुँचे, साँप रेंगते हुए आये, चूहे फुदकते हुए पहुँचे। सबने सास से पीड़ित औरत की कथा उसके पति को बारी-बारी बताई। यह सुन के पति बहुत दुखी हुआ और अपनी पत्नी को अपने साथ दूर देश ही ले गया।” ईजा ने कहानी खत्म कर कहा, “ये वही गोरैया है। जो सबके दुख दर्द को समझती है।“ आज इस कथा के माईने मेरे लिये विराट है। जो पहाड़ पर स्त्री के बेढप जीवन का ज्वलंत दस्तावेज है। जिसके कई अर्थ निकाले जा सकते हैं। पर तब मुझे पकड़ी हुई गोरैया पर अचनाक से श्रद्वा जाग उठी थी। बाद मैं मैने कहीं पढ़ा, “स्त्री के प्रकृति से साथ पुरूष से ज्यादा गहरे ताल्लुकात रहे हैं। कुछ तो बिल्कुल रहस्यात्मक है।“ तो समझ पाया कि पृतसत्ताक समाजों में स्त्री के दुख सुनने को पुरूषों को फुर्शत ही नहीं होती होगी, स्त्रीयां पंछीयों, पहाड़ों, पत्थरों, पेड़ों से अपने दुख बाँटती होंगी। लोक गायिका शांन्ति कैजा ने एक साक्षात्कार में मुझे एक भावुक बात बताई, जब उनकी नवजात संतान की मृत्यु हुई तो लोगों के लिये यह साधारण बात थी। पर वे कई सालों तक बन्दर को अपना बच्चा कोख में चिपकाये देखती या गोरैया को अपने चूजों को दाना खिलाते, या गाय-बकरी के थनों से मेमने और बछड़ों को लगे देखती तो फफक फफक के रोने लगती थी।
दुनिया का समझदार जीव मनुष्य जरूर है, पर उसे समझदार व संवेदनशील बनाने वाले उसके साथी उसके आस पास क सरल पशु पक्षी और प्रकृति ही तो है जिसके बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं। यह कहानी सुनने के बाद मैने गोरैया को पिंजरे में रखने का निर्णय तत्काल बदल दिया और सूप को उठा के बोला “हा, चड़ी हा!” भुर्रर फुर्र ! एक बाल गीत में कुमाऊँनी कविता के शिखर चारुचन्द्र पाण्डे ने में लिखा भी है कि-

हम गूलेल लै चाड़ नी मारना
ग्यूनौक पोहर कनूँ-चड़ि हा!
जा अपन घर भुर्र घिनौड़ी-
तू हमारो बिस्कूण नी खा!

(हम गूलेल से पंछीयों को नहीं मारेंगे/ गेहूँ के पहरेदार हम कहेंगे हा चड़ि/
जा अपने घर जा फुर्र से उड़ के गोरैया/ तू हमारा अनाज न खा)

डाक्टर अनिल कार्की की पुरानी स्मृती पढने के लिए यहाँ क्लिक करें, हर लेख  के नीचे आपको उनके लेख का एक और लिंक मिलेगा .

आपनी माटी अपना बचपन -4

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