यंगिस्तान

अपनी माटी अपना बचपन -1

मई 16, 2017 ओये बांगड़ू

डाक्टर अनिल कार्की कवि हैं लेखक हैं और पहाड़ का मर्म समझने वाले पहाडी हैं, अपने आस पास के ठेठ पहाडी पन को बड़ी ख़ूबसूरती से शब्दों में पिरोते हैं और देश विदेश में बैठे पहाड़ियों को वो फील करवा देते हैं जो वो पहाड़ में रखकर भूल गए हैं. इनके लेखनी के जादू की ये पहली  संस्मरण वाली किश्त है बचपन पर, जो आपको आपका बचपन याद दिलायेगी.

बैलों के साथ लेखक डाक्टर अनिल कार्की

बचपन में इतवार के दिन हम ग्वाला (गाय चराने) जाते थे . बैल बकरियों के संग झबरीला कुत्ता हमारे पीछे-पीछे चलता। बकरियों को पास बुलाने के लिये जेब में भुने हुए भट्-जों के दाने ठूँसे रहते मन हुआ तो खुद भी वही चबा लेते। गाँव में सबसे ज्यादा उस साथी का रूतबा होता जिसके बैल ऊची कूबड़ वाले और रिभड़ालू (लड़ाकू) होते । स्कूल के समानान्तर जानवर चराने का काम बड़ा रोमंचकारी होता। जाने कितनी ही ऐसी बातें, किस्से, कहानी, लोकगीत हमने जानवर चराते हुए सीखे जो कमसेकम स्कूल तो कभी नहीं सिखा पाते। जिसके बैल सबसे रिभाड़ालू (लड़ाकू) होते वो साथी अपने बैलों की बैलों से लड़ाई के किस्से अजब-गजब शैली में पेश करता।
मेरा बैलों का नाम था मोहना और पनवा। पनवा गुस्सैल किस्म का था पास जाओ तो दूर से ही फूँ फाँ करते हुए डराने लगता। मोहना बहुत सरल था वो मुझे खूब समझता था। पिता सुबह उनके लिये जौं और मंडुवे के दो-दो लड्डु तैयार करते। अक्सर वे लड्डू मैं ही उन्हें खिलाता। इसलिये भी दोनों से कुछ करीबी पहचान थी । बचपन में जब मुझे तैरना नहीं आता था तो रामगंगा के बहाव पर दोनों बैलों को हाँक के चट से मैं मोहना की पीठ पर चढ़ बैठता और रामगंगा पार कर लेता। वे दोनों बैल रामगंगा के आर-पार नदी किनारे की कोमल घास मजे लेकर चुगते और हम दोस्त रेत पर खूूब खेलते, नदी में डुबकी लगाते, जाड़ा लगने पर पत्थरों पर बैठ के घाम तापते। लौटने का समय हो जाये तो सभी बारी-बारी अपने बैलों को रामगंगा में हाँकते और उनके पीठ में चढ़ के नदी वार आ जाते । कभी कोई बैल के पीठ से गिर जाता तो तैरना सीख लेता। वह बहुत रोमांचक बचपन था।
मोहना और पनवा पिता के लिये बड़ी मूल्यवान थे। उनको खरोंच भी आ जाय तो वे हम पर झल्ला उठते। दिपावली से ठीक बाद पडे़वा द्वीतीया के दिन मोहना और पनवा को घी में बने दो दो माड़े (चावल की रोटी) मिलते और उनके माथे पर रैंबांस के फुन्ने लगाये जाते, उनके सींगों पर तिल का तेल मला जाता उनके कूबड़ों की मालिस की जाती। पहाड़ में मान्यता है कि यदि बैल दैं (सींगों से मिट्टी उधेड़ना) खेलते हुए सीगों पर मिट्टी चिपकाए घर आये तो वह किसान के लिये संपन्नता का प्रतीक होता है। मोहना और पनवा अक्सर अपने सीगों में मिट्टी लिये घर लौटते। फुन्ने उनके फिसलनदार सीगों के पीछे से बाँध के उनके माथे पर अटकाये जाते। रैंबास के रेशों से बने वे झालर बहुत अच्छे बनते थे .पड़ोस में लाट्बाब (गूँगेताऊ) थे जो रैबांस के रेशों की अद्भुद कलाकारी करते।
वे ही हमारे ग्वाला मास्टर थे। लगभग सारी खुरापातें उन्होंने ही सिखाई थी या कहें कि व्यहारिक जिन्दगी के सारे फण्ड़े मौज मस्ती के मास्टर थे वे। वे बोल नहीं पाते थे पर इशारों की भाषा में वे माहिर थे। हमने उनके साथ रहते हुए इशारों की भाषा सीखी। वे ही हमारे साथ अक्सर जानवर चराने आते । मोहना और पनवा को ग्वाले की जरूरत कभी नहीं पड़ती वे किल्ले (खूँटी) से खोल दिये जाने के बाद खुद ही चरने चले जाते और ठीक सूरज अस्त होते समय वापस लौटतें। मेरे घर ठीक उपर एक पहाड़ धार है। वे जब तक न लौटते पिता की नजरें उस धार पे अटकी रहती। जैसे ही वे दिखते पिता हकाल मारते “आ रे पनवा मोहना आ रे!” वह दृश्य बड़ा देखने लायक था कल्पना कीजिए कि घाटी से धूप सरक के पहाड़ों की चोटी चढ़ रही हो और और उसी समय किसी पहाड़ पर को कोई बैल सूरज की हल्की रक्तिम रोशनी में अपना सर हवा में उठा के रंभाये, फिर गलघण्टियों को खनखनाते हुए आँगन में आकर ही रूके। यह मेरे देख गये दृश्यों मे सबसे अमिट दृश्य है।
कुछ सालों बाद पिता एक दिन बिन बताये चल बसे बैल उदास हो गये। पिता लिख गये कि बैल उनके कामगार साथी हरवा को दे दिये जाय। हरवा भी उदास हो गया। पिता के मरने के बाद वह ध्याड़ी मजूरी को दिल्ली की तरफ चल दिया। बैल रह गये अकेले। इतवार के दिन मैं ही उन्हें चराया करता और कभी कभार एक आद बार उन्हें जोता भी । एक दिन शाम जंगल से केवल मोहना ही लौटा , पनवा न लौटा। सबको लगा कि पनवा कुछ गुस्सैल है कहीं रह गया होगा या किसी के जानवरों के संग दूसरे गाँव चल दिया होगा। सुबह ईजा ने दराती पकड़ी और हम पनवा की खोज में जंगल की और चल दिये। ईजा को एक जगह कुछ टूटे हुए पेड़ और कच्चे रास्ते का धंसा हुआ किनारा दिखा । ईजा किसाी अनहोनी को भांपते हुए बोली, “पनवा को बाघ ने खा दिया शायद।” हम उसी को सुराख मान कर उन टूटे पेड़ों के समान्तर चलते हुए घाटी की तलहटी पर उतरे तो देखा पनवा इस छोटी नदी में पसरा पड़ा था एक दम चित्त। उसके गले से बहता खून अभी ताजा था जो धीरे-घीरे रिसता हुआ पानी में मिल रहा था। मैंने रूवाँसा हो कहा, “ईजा अब क्या करें हम” ईजा ने अपने आँसू पोछे मुझे कहा, “वह मर गया है ।” वहाँ से निकले से पहले ईजा ने कहा, “उसके गले की वह घण्टी और रस्सी खोल दे“ मैने भावुक होकर प्रतिरोध करते हुए सवाल किया “क्यों खोलें वो उसकी घण्टी है” ईजा ने तब कहा था “शिबो उसे भी मुक्त कर देना चाहिए अब । अगर गले में यह घण्टी बंधी रही तो अगले जन्म में वह फिर से बैल ही बनेगा। घण्टी खुल जाय तो क्या पता यह पनवा अगली बार आदिम बन के हमारे ही परिवार में जन्म ले इसलिये खोल दे।” मै बिना कुछ बोले गले की रस्सी खोलने को झुका, पर गले में लगी रस्सी जिस पर घण्टी थी उसकी मार गाँठ खून से लतपथ हो चुकी थी। ईजा ने दराती दी और मैंने वह ढोरी काट दी । वह घण्टी अन्तिम बार एक पल के लिये बजी और फिर मौन हो गई।
आज जब मैं सुनता हूँ कि “किसी काम नहीं तो जानवर हाँकेगा” तो अनायास मुझे यह विद्यालय याद आता है जिसमें मैंने मनुष्यता के सांस लेते जीते जागते पाठ पड़े थे। जिसमें पनवा था और मोहना भी।

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