यंगिस्तान

अपना बचपन अपनी माटी 14

जनवरी 30, 2019 ओये बांगड़ू

डाक्टर अनिल कार्की इस किश्त में बता रहे हैं कि कैसे एक बच्चा एक जगह से दुसरे जगह एक पौधे की तरह शिफ्ट कर दिया गया “बिन से सार की तैयारी”
(पौंधशाला से उखड़ कर दूसरी जगह बोये जाने की तैयारी )

लेखक अनिल कार्की

उन दिनों पिथौरागढ़ का टिकट मुवानी मेरे गांव से 14 रूपये था . पिथौरागढ़ हमारे लिए किसी भी बड़े शहर जैसा था . मैंने सुना था कि वहां हमारा घर है (देखा नहीं था) एक बार इजा ने बताया था कि वहां तो सर के ऊपर से ही हवाईजैहाज उड़ते हुए जाते हैं . पिता तब धरती पर ही थे . वे ही रमगाड़ (रम वाली छोटी नदी यहाँ सैनिकों को रम मिलता था इसलिए इस नदी का नाम ही रमगाड़ रख दिया गया था) आते जाते थे. लेकिन जिस दिन वे रमगाड़ जाते घर में लगा मलेट्री शासन अचानक से लोकतंत्र में बदल जाता था . हम भाई बहनों की धमाचौकड़ी शुरू हो जाती थी.
गोठ में दो भैसें थी, बकरियां थी .मैं दूध अब नहीं पीता . पर मुझे हमेशा से ताज़ा दूध पसंद रहा है. जब दूध निकाला जाता और झाग बाल्टी के मुंह तक आता वह मै जरुर पीता था . उन्हीं दिनों अचानक पिता को लगा कि मै गांव में बिगड़ गया हूँ बिगड़ने के शुरूआती लक्षण मुझमें बहुत छोटी सी उम्र में दिखने लगे थे जिन्होंने फिर कभी साथ नहीं छोड़ा .सो वे मुझे सुधारने के जतन करने लगे . जब मैं कक्षा तीन में था उन्होंने मुझे मेरे जीजा के पास भेज दिया . मै करीब एक साल बहुत घुटता रहा उसका किस्सा मै पहले बता चुका हूँ . ईजा से विछोह मुझे अब भी मंजूर नहीं है . एक साल बाद वापस लाया गया तो मैं वापस अपनी ही ग्राम सभा के स्कूल में आ गया . उसी लाल माटी में जहाँ मुझे मेरे जीवन की पहली पाठशाला मिली. वहां राम गंगा भी तो थी.

छुट्टी के बाद बस्ता फेंक सीधे नदी की गोद में जा बैठते. ग्वाला जाते धमाल मचाते थे. लेकिन दो एक साल बाद फिर पिता को लगने लगा कि मेरे बिगड़ने के लक्षण घट नहीं रहे बल्कि बढ़ रहे हैं . फिर तुगलकी फरमान जारी हुआ कि इसे पिथौरागढ़ ले जाओ . मैंने रोना धोना शुरू किया, ईजा ने पिता से कहा भी, होने वाला लड़का कहीं भी हो जाता है. क्यों भेजना हो रा शहर . बाद में तो इसे परदेश ही जाना है (परदेश मतलब सेना )अभी से क्यों वनबास दे रे.
लेकिन पिता कहाँ मानते सो उन्होंने मेरी बहन से जो पिथौरागढ़ से ही एम ए कर रही थी उसके साथ भेज दिया . तब जाकर मैंने पहली बार पिथौरागढ़ वाला घर देखा. अरे साहब गाड़ियाँ देखी, लोग देखे आप इसे इस तरह से समझिए कि कोई मृगछोना आचानक से कहीं शहर में भटक गया हो भय और रोमांच से लबरेज, आँखे ततेरता हुआ, कान चौकन्ने किए हुए और कदमों में सदापन, मानो अपना गंवार होना छुपाते हुए भी जहार हो जा रा हो . उस बार मैं पिथौरागढ़ दो महीने रहा तो सार जैसी आ गयी . पहले पहले टीवी देखने कि रफत जैसी थी तो कुछ दिनों मन लगा . खाने के लिए बहुत चटर पटर चीजें तो नहीं थी उन दिनों पर फिर भी ‘गुप्ता समोसे’ बड़ी फेमस चीज थी. लोगों का कहना था कि वह समोसे में आलू के अलावा क्या क्या डालता है जाने. उस चोराह का नाम भी गुप्ता चोराहा है . धन्य है वह समोसाची कि उसे उसके हुनर ने उसे अमर कर दिया.

देश में नाम बदलो नाम रखो अभियान चल रहा पर दुनिया में जगहों के नाम यों ही नहीं चल पड़ते. बारहाल हम पे ये किसने हरा रंग डाला वाली बात हममे कभी नहीं रही .दो माह का तिलिस्म झटके में टूट गया और शहर-ए- सौर से मन उचट गया
जबकि वहां के स्कूल में प्रवेश कि लगभग कवायद पूरी हो चुकी थी. घर से मुझे तरह तरह के प्रलोभन दिए जा रहे थे. बहनें कहती थी तू बाद में बहुत बड़ा आदमी बनेगा . कभी वह सड़क पर चलती कारें दिखाती कहती तेरे पास भी ऐसी ही कार होगी. कभी वह दिखाती बड़े-बड़े घर जिनके गेट पर लिखा होता था कुत्तों से सवाधान! बावजूद इसके मुझे वह शहर पहले पहल तो नहीं अच्छा लगा. हाँ मुझे यहाँ पहला प्यार हुआ मारुती 800 से जिसे मैंने नाम दिया ‘डाब जसि गाड़ी’ (डिबिया जैसी गाड़ी) पर रामगंगा पार तो सड़क ही अब 2019 में कटनी शुरू हुयी हैं. इस ‘डाब जसि गाड़ी’ का वहां उस समय क्या काम था. बांकी घर तो आज भी मुझे चाख और दुपखिया ही पंसद है बरसात में जिसकी बन्धार गिरती हो लरक-तरक, जिसमें गायों के ओबरे और भैसों के दान हो, बकरियों के खोड़ हो , गोरैया के ख्यो और मधुमख्खी के जाले .जिसमें देवताओं से लेकर मसाण तक की जगह हो .

आनाज से लेकर दूध दही और शराब रखने की जगह हो . जिसमें जगह हो बटोहियों के लिए, राहगीरों के लिए जिसके आंगन में पानी का मटका हो और पेड़ की छाँव हो . कुत्तों से सावधान वाले घर बड़े एक्लु बानरों के घर लगते हैं मुझे.
लेकिन भाग कहें या हालात जो भी कहें मुझे अनुभव की तिजोरी भरने का मौका फिर से एक बार जिन्दगी ने दिया . मैं लौट आया अपने गाँव और फिर वहीं रहा . इसी दौरान एक दिन पिता ने धरती को अलविदा कह दिया और मेरी दुनिया अचानक से बदल गयी …..

गतांक से आगे ………………………

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अपनी माटी अपना बचपन 13

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