गंभीर अड्डा

राफेल डील क्या है, क्यों बन गया बड़ा चुनावी मुद्दा ?

जनवरी 4, 2019 ओये बांगड़ू

राफेल सबसे बड़ा मुद्दा बनेगा शायद इस चुनाव में,बहुत सारा पैसा तो है ही है इन्वाल्व साथ में कांग्रेस भाजपा दोनों के पास इस मुद्दे पर बोलने के लिए बहुत सारा कंटेंट है,और इनके पास कंटेट खत्म हो जाता है तो फ्रांस से बुलवा देते हैं,आज लोकसभा में में रक्षा मंत्री कांग्रेस पर आरोप लगा रही हैं कल राहुल ने लगाया था . आरोप प्रत्यारोप का खेल खेलने में नेता तो खैर पैदाईशी माहिर होते हैं लेकिन इन्हें ये लगता है जनता की समझ नहीं आ रहा कि सारा मामला है क्या.

अब खुद ही सोचिए आपके जिले में कोइ बिल्डिंग सरकारी ठेकेदार से न बनवाकर प्राईवेट ठेकेदार से बनवाई जायेगी तो आप क्या सोचेंगे,जाहिर है पहला सेंटेंस दिमाग में यही आएगा कि बिक गए हैं डीएम इसलिए प्राईवेट वाले को दिया. ये बड़ी साधारण सी बात है कि सरकारी कम्पनी होने के बावजूद जब खुद सरकार प्राईवेट में इंटरेस्ट दिखाती है तो शक होना लाजिमी है और सरकार जब तक उसका सतुष्टिजनक जवाब नहीं दे देती तब तक शक बना रहता है.

राफेल खरीद पर अभी तक सरकार ने इस बात तक का संतुष्टिदायक जवाब नहीं दिया है कि एचएएल को हटाकर अनिल अम्बानी को क्यों ठेका दिया गया.पैसे कम ज्यादा लगते रहे हैं.मगर कम से कम इतना तो बताना ही चाहिये न कि अनिल अम्बानी को इस कारण से ठेका दिया गया,अलबत्ता अनिल अम्बानी की सफाई  में फ्रासं सरकार के मंत्रियों ने तक बयान दे दिया.

 

इस मामले को जिस तरह से सरकार द्वारा खींचा जा रहा है उससे साफ़ लग रहा है कि कहीं न कहीं कोइ तो गडबड जरूर है. क्योंकि इस मामले के तह में जाइए तो ये शुरू होता है यूपीए की शुरुवात से जब एयरफोर्स को विमानों की सख्त जरूरत थी,मिग लगातार क्रेस हो रहे थे और जहाजी बेड़ा ख़त्म हो रहा था. अब यूपीए की खोज खत्म हुई राफेल पर जाकर, अब खोज कैसे कैसे हुई ये सवाल जाने देते हैं, इसकी खोज करेंगे तो एक और घपला मिलेगा.तो फिलहाल हम बात करते हैं कि खोज खत्म हुई राफेल पर.

तो जनाब यूपीए राफेल खरीदने के लिए सौदेबाजी पर लग गई. फ्रांस की कम्पनी से सौदेबाजी हो रही थी, पैसे वैसे भी फिक्स हो गए, हां ठेका जो है हमारी सरकारी कम्पनी एचएएल को मिलना था. बाकी एयरफोर्स को जहाज मिलने थे, मगर क्या हुआ कि चुनाव आ गए, सौदा टल गया. नई सरकार आई, और उसने आते ही कह दिया जी हमें राफेल पसंद नही हम दूसरा खरीदेंगे. अब ठीक है नई सरकार अपने हिसाब से सोचती है.

नई खोज शुरू हुई, पुराना सौदा केंसल हुआ और उधर एयर फोर्स को टेंशन होने लग गई कि आखिर उसे उसके जहाज कब मिलेंगे. आखिर देश की सुरक्षा में जहाज कम पड़ गए थे, इसीलिए तो नए जहाज खरीदने की बात हुई थी.

तो जनाब नई सरकार को कहा गया कि जहाज चाहिए, अब हुआ यूं कि ये सरकार भी वापस आकर टिकी राफेल पर तो इस सरकार ने राफेल की डील शुरु से शुरू करवा दी, अब खरीदा गया जहाज मगर नए सौदे शुरु किये गए. लेकिन अब कीमत जो थी वह बढ़ गई. यहां तक ठीक था, मगर जहाज का ठेका गया अनिल अम्बानी की कम्पनी को, बस हंगामा शुरू हो गया.

वही हंगामा जनाब अब तक चल रहा है.आज निर्मला सीतारमन उसी का जवाब देने में कांग्रेस को कोस रही थी.अब लगता है ये सब चलेगा चुनाव तक,बोफोर्स के बाद नया हाइलाईटेट घोटाला नजरों में आ रहा है.

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