बांगड़ूनामा

आखिरी शाम

दिसंबर 3, 2017 ओये बांगड़ू

शाम के कुछ ६ बजे होंगे, सूरज ढले १५ मिनट बीत चुके थे, सिमलगैर मार्किट में युवओं की चहल पहल अभी उस दिन के लिए चरम सीमा पर थी. ये साल का वो समय था जब लोकल के L.S.M.P.G और S.I.T के स्टूडेंट्स से ज्यादा NRP (non residential pithoragarhites) सिमलगैर बाज़ार को अपने बाहरी ढंग के भिन्न-भिन्न माहौल से चकाचौध कर रहे थे. अलग अलग टुकड़ीयों में कुछ इस तरह की बातें चल रहीं है कि “पिथोरागढ़ में रात जल्दी हो जाती है यार”, और “हाँ पहाड़ में अँधेरे का ऐसा ही सीन है, अभी पूरा सन्नाटा हो जायेगा यार”.

वो नगरपालिका हाल के पास सिमलगैर के एक छोर पर अपने फौजी अफसर लड़के के साथ खड़ी आंटी से नज़रे चुरा रहा था..उन्हें नज़रंदाज़ करते हुए वो कुछ सोच ही रहा था कि पीछे से उसकी पीठ पर एक थपकी पड़ी,

“जानता है ना तू उसे ?”

“हाँ यार ! कौन नी जानता… अबे इतनी देर लगा दी.. कहाँ था तू? चल पहले चिकन सूप पिला हॉट काठी  से”

“कभी तो रहम कर साले,कितन पतला हो गया है वैसे ”

“देख साल मै बस ३ ही बार आता हूँ, तू तो यही का ठैरा”

“हाँ-हाँ चल यार, डंडा मत कर… ग्रेजुएशन भी बस पूरा ही हो गया है.. मै भी चलाए जाऊंगा फिर”

“कुछ नहीं रखा है भाई बाहर, कभी कभी तोह खाने के वांदे भी पद जाते है”

दोनों दोस्त गरमा गरम सूप की प्लास्टिक वाली डिस्पोजल अपने हाथों में लिए बाहर दुकान की सीड़ियों में बैठ गए.

“माल कितना पी रहा है आजकल और कितनी भरती दौड़ा बे”

“कहाँ यार, ईजा ने पकड़ लिया एक दिन.. वो तो तू आया है करके इतनी देर तक बाहर हूँ”

निराशा का भाव उसके शब्दों में साफ़ झलक रहा था.. मेरा फ़र्ज़ ठे ये बोलना सो मै हर बार की तरह बोल दिया…

“छोड़ दे यार ये गन्दी चीज़े…भर्ती निकल अब एक बार में”

…कुछ देर के लिए सन्नाटा सा रहा और वो बोला,

“अच्छा वो छोड़ ..तू ध्यान से जाना वो भी दिख रही थी अभी.. आई है क्या वो…”

वो खिन्नता से जवाब देता है  “मेरेको क्या मालूम भाई, मै तो जा ही रहा हूँ वैसे भी कल को”

वे दोनों एक ही रेल के दो साथी बोगी से थे जो किसी एक स्टेशन की वजह से अलग हो चुके थे.. दोनों दोस्त कुछ देर और उस जगह बैठे इधर-उधर लोगों को गुज़रते देखते है और इस बार भी  राहगीरों की तरह एक दुसरे से अलविदा लेते है..

उसके चले जाने के बाद वो ठहरता है और सिमलगैर बाज़ार को वो एकटक निगाहों से देख रहा है. भीड़ की एक बात होती है कि उसमे कहीं पहुचने की होड़ होती है..सब कुछ किसी एक दिशा में बहता हुआ…लेकिन सिमलगैर की भीड़ अलग थी..उस भीड़ में स्थिरता थी.. तभी,उस भीड़ में उसे कोई अपना सा दिखता है.. हाय! क्या नज़ारा है..कतई जादुई ..काश के वो उसी श्रण में ठहर जायें. काश के दुनिया कुछ ऐसे ही गुज़र जाये. संसार में ऐसा ही होता है क्या?

खैर, वो हकीक़त से पुनः टकराता है..उसे एहसास होता है कि अगर वो कुछ देर और वहां रुक गया तो कुछ न कुछ गड़बड़ ज़रूर हो जाएगी.

उस लड़की को अपने सामने से गुज़र,एवरर्फ्रेश  बेकरी में घुसते हुए देख जैसे कई हजार यादों की एक रील उसके दिमाग में एक बार में दौड़ती चली जाती है. कुछ अजीब सा था उस पल में.. हकीक़त कुछ बहुत उसके अतीत सी ही थी… ऐसी की जिसे वो देख तो सकता था लेकिन छू नहीं सकता…. और उसकी सोचने एवम् समझने की श्यम्ताओं में कुछ देर के लिए ठहराव लग जाता है. हांलाकि उसे वहां से उलटे पैर दौड़ निकल लेना चाहिए था लेकिन वो उस वाकिये की गंभीरता को ना समझते हुए वहीं रुकता है और उसे एक दूरी से तकता है..

वो उसे बेकरी में पेस्ट्री चुनते हुए देख सोचता है कि क्या अदा है इसकी हर हरक़त में.. दुकानदार को पैसे पकड़ाते हुए भी नखरें दिखाए हैं… दिल भी क्या नज़ाक़त से तोडती है.. क्या ही है ये सीन भी… किसी अज्ञान बालक की तरह कितना कुछ अभी तक उसने यूँ ही जाने दिया था.. जैसे कि उसने पहली बार अपनी आँखें खोली थी..

*देखिये, मैंने नहीं बोला था की ये कोई भावुक कर देने वाला लेख होगा, ना ही इसमें कोई ख़ास आरजू है.. लेकिन आप मान लीजिये कि ये रोचक होने वाला है.*

फिर कुछ ऐसा हो जाता है जो आप लोगो के सोच के परे है और वो सहमा सा,दुनिया से कटे रहने वला लड़का कैसे भी करके उसके पास जा पहुचता है…

“इतनी शाम को भी लोग मिल सकते हैं क्या ?” वो मजाकिया ढंग से पूछता है.

वो हँसते हुए जवाब देती है, “अरे मामा के घर रुक रही हूँ, बर्थडे है छोटी का.. कैसा है तू ?”

“कैसा दिख रहा हूँ? ठीक ही हूँ वैसे.”

ताना मारते हुए वो कहती है, “पतलू, खाना नहीं मिलता क्या वहां?”

क्या पता ये मुलाक़ात और ये बातें सारी अनुपयुक्त ही थी तो आखिरकार वो बोल ही देती है,

“Excuse me, isn’t it really awkward?  तुमने मुझसे ३ साल से बात नहीं की है, न मिलने की इच्छा जाहिर की… और आज तुम यहाँ कहीं से भी प्रकट होकर एकदम ये पूछते हो कि, इतनी शाम को भी लोग मिल सकते हैं क्या.. हो क्या गया है तुम्हे ?

हँसते हुए वो जवाब देता है ,“I’m UNPRIDICTABLE, you know… क्या कहीं बैठ के बात कर सकते है ?”

और वे दोनों उस श्रण की गंभीरता को हंसी में उड़ाते हुए पैदल चल पड़ते है दूसरी छोर की ओर.. उस शाम नगरपालिका की रौनक कुछ बड़ी बड़ी सी थी…

 

लेखक परिचय -अभिजीत कलाकोटी जर्नलिज्म के छात्र हैं और लखनऊ से अपनी पढाई कर रहे हैं,उत्तराखंड में इनकी जड़ें हैं इसलिए इनकी कहानियों में उतराखंड दिखाई देता है.

 

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