गंभीर अड्डा

इलाज की आख़िरी संभावना नहीं रह गया एम्स

सितंबर 25, 2016 सुचित्रा दलाल

गंभीर रूप से बीमार 75 वर्षीय मोहन चन्द्र को उनके परिवार के सदस्य करीब  11 महीने  पहले एम्स में लेकर आए थे, परिजनों का मानना था कि एम्स में उनका बेहतर और सही इलाज हो सकता है। एम्स के पहले पांच दिन तो उनके ब्लड टेस्ट में गुजर गए, इसके बाद 15 दिन गुजर चुके थे लेकिन एम्स के डाक्टर्स की तरफ से उन्हें सिवाय टेस्ट करवाने के और कोई सलाह नहीं मिली। डॉक्टर का कहना था टेस्ट के बाद ही सही बीमारी का पता चलेगा और तब तक पुराना ट्रीटमेंट चालू रखें (पुराना वह ट्रीटमेंट जिससे फायदा नहीं हो रहा था, जो हल्द्वानी के किसी निजी डॉक्टर का दिया हुआ था )। मरीज के सभी टेस्ट होने में दो महीने से उपर का समय लगना था और मरीज को तुरन्त इलाज की सख्त ज़रूरत थी। डॉक्टर बेबस थे क्योंकि बिना टेस्ट रिपोर्ट जाने वह इलाज शुरू नहीं कर सकते थे। एम्स की तरफ से टेस्ट के लिए सितम्बर की डेट उपलब्ध कराई गयी थी और मोहन चन्द्र की मृत्यु अगस्त में हो गई।

डॉक्टर संजय के छोटे भाई को लीवर से सम्बंधित बीमारी थी। डॉक्टर संजय एक डॉक्टर होने के नाते बीमारी की गंभीरता को समझते थे। इसलिए एम्स में अपने मित्र से बात करके उन्होंने अपने भाई को एम्स में भर्ती करने का फैसला किया। इमरजेंसी में मरीज को लाया तो गया पर बेड खाली न हो पाने के कारण डॉक्टर्स ने एडमिट करने में असमर्थता जता दी। आखिरकार उन्हें मरीज के लिए दूसरे अस्पताल ले जाना पड़ा  जहां उनकी भी मौत हो गई।

उत्तराखंड के पहाड़ों से अधिकतर सीरियस केस दिल्ली के एम्स में ही रेफर किये जाते हैं एसे मेडिकल मामले जिनमे मरीज के बचने की संभावना बहुत कम रहती है उन्हें दिल्ली रेफर कर दिया जाता है. मरीज के परिजन बेहतर इलाज की उम्मीद में आखिरी क्षण तक अपने परिजन को लिए इधर से उधर घुमते रहते हैं मगर उन्हें यहाँ इमरजेंसी तक में दाखिला नहीं मिलता. ये हाल सिर्फ उतराखंड ही नहीं भारत के किसी भी हिस्से से दिल्ली एम्स आने वाले सामन्य मरीजों (जिनके पास कोइ वीवीअईपी जेक ना हो ) के साथ होता है.

ऊपर दिए ये दो अलग-अलग केस एम्स में 2015 में घटित हुए हैं जिनमे  एम्स प्रशासन भी मानता है कि कुछ मजबूरियों के कारण वह मरीज को देख तो सकते हैं पर एडमिट नहीं कर सकते। यह जानते हुए भी कि मरीज का भर्ती होना बहुत ज़रूरी है डॉक्टर हाथ खड़े कर देते हैं।

एम्स के एक अधिकारी बताते हैं, “हमारी वन बेड वन मेन पॉलिसी के कारण हम एक बेड पर एक ही मरीज एडमिट करते हैं। यहां कुल 2500 बेड हैं और हम उतने ही मरीज यहां रख सकते हैं उससे ज्यादा मरीज होने पर हम मजबूरी में उन्हें दूसरे हॉस्पिटल रेफर कर देते हैं।” लेकिन एक कड़वा सच यह भी है कि लगभग 90 प्रतिशत इमरजेंसी के केस एम्स रेफर ही करता है और इस बात से एम्स प्रशासन भी सहमत है। एम्स के एक डॉक्टर बताते हैं, “बाहर से आने वाले मरीज प्रॉपर चैनल के ज़रिए नहीं आते। अगर वो इस तरह आने लगें तो उन्हें रेफर में होने वाली परेशानियों से बचाया जा सकता है।”

पर सवाल यह उठता है कि अंतिम स्टेज पर पहुँच गया आदमी कैसा प्रॉपर चैनल अपनाए. आजकल एम्स का रजिस्ट्रेशन आनलाइन उपलब्ध है लेकिन टेस्ट करवाने के लिए होने वाला इन्तजार अब भी उतना ही है. की बार सीरियस से सीरियस ही है.

एम्स में बाहर से आने वाले इमरजेंसी मरीजों के लिए सही नियम

जब किसी डाक्टर(एम्स से बाहर के ) से मरीज का ट्रीटमेंट नहीं हो पाता तो वह एम्स से कंसल्ट करता है उसके बाद एम्स से उन्हें मरीज को यहां भेजने या इलाज करने के सही तरीके पर बात की जाती है। कई बार मामूली से मामूली बीमारी वाला मरीज भी एम्स रेफर का पर्चा लेकर यहां आ जाता है जिनका इलाज उनके यहां आसानी से हो सकता है। इन छोटे मोटे केस के कारण बड़े और क्रिटिकल केस को एडमिशन नहीं मिल पाता।

एम्स में भेजे जा रहे मरीज के डॉक्टर पहले एम्स प्रशासन को संपर्क कर उन्हें मरीज की स्थिति से अवगत कराएं उसके बाद एम्स की तरफ से उन्हें बताया जाता है कि एम्स एडमिशन करेगा या नहीं। एम्स के डाक्टरों का कहना है, “अधिकतर केस में मृत्युशैय्या (डेडपोजीशन) पर पड़े मरीज को एम्बुलेंस में डालकर एम्स पहुंचा दिया जाता है। उनका डॉक्टर रेफर टू एम्स का पर्चा बना देता है बिना एम्स की सलाह लिए। अब ऐसे में एम्स उन्हें कैसे एडमिट कर सकता है। हम इमरजेंसी में उन्हें प्राथमिक उपचार देकर दूसरे नजदीकी हॉस्पिटल के लिए भेज देते हैं।”

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