गंभीर अड्डा

एडजस्ट करने की गुलामी

अगस्त 15, 2018 ओये बांगड़ू

चंकी महाराज आज बता रहे है देश के चौथे स्तंंभ कहे जाने वाले मीडिया और देश में हुए या यूँ कहें न हुए बदलाव की दास्ताँ . चंकी महाराज का कहना है कि  ’15 अगस्त आजादी को महसूस करने के लिए आपको एडजस्ट करने की गुलामी से बाहर आना होता है ‘ तो क्या आप हो सके  एडजस्ट करने की गुलामी  से आजाद.

तू कर कर क्या रहा है? क्यों आया था यहां? ये ऐसे सवाल हैं जो उमड़ते घुमड़ते रहते हैं। आज से 12 साल पहले आज ही के दिन मेरे एक् प्रोफेसर ने मुझे कहा था कि पत्रकारिता तेरे लिए एकदम सही जगह है। मैंने कविता सुनाई थी पिथौरागढ़ की एक जगह के ऊपर अपने हाथ से लिखी हुई। कविता भी खो गयी और मैं भी।

फ्रस्टेशन नही है बस सवाल हैं बहुत ज्यादा खुद से। क्यों आये थे पत्रकारिता करने, क्योंकि पत्रकारिता के बारे में बहुत अच्छी अच्छी बातें बताई गई थी, ये सिखाया गया था कि इस फील्ड में सब कुछ है, समाज सेवा,,घुमक्कड़ी, क्रांति का एहसास, समाज के हर तबके के साथ सीधे बातचीत, 5 स्टार से लेकर झुग्गियों तक के जीवन से करीबी परिचय वगेरह वगेरह। शुरुवाती स्तर में सबने कहा था कि समझौते करते हुए चला करो। फ्यूचर ब्राइट होगा। लेकिन मैं तो आज में जीता हूँ फ्यूचर ब्राइट करके क्या देखना। इसलिए अपनी अकड़ (ऐसा कहा गया सहकर्मियों द्वारा) में रहा। अपने हिसाब से चलने की कोशिश की। प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रोनिक और फिर डिजिटल, मीडिया के वर्तमान में मौजूद सभी संस्करणों में काम किया। हर दिन 15 अगस्त की तरह सेलीब्रेट किया। हर दिन खुद को बताया कि मैं आजाद हूँ, रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक सबको एहसास कराया कि आप सिर्फ 15 अगस्त को आजादी मनाने को बाध्य नही हैं, 364 दिन भी आजादी सेलीब्रेट कर सकते हैं परिणाम स्वरूप 12 नौकरियों को 2 साल के अंदर स्वाहा कर चुका था, गिनीज बुक में जाता तो शायद रिकार्ड बन जाता, नही तो लिम्का बुक में तो बन ही जाता।

पत्रकारिता की मेरी परिभाषा में आजादी सबसे पहले आती है। संस्थान के अंदर हो या बाहर, अनुशासन के नाम पर बहुत लोग नए आये पत्रकारों को बांधे रखना चाहते हैं,अलग अलग तरह से पाबंदियां लगाई जाती हैं मसलन, ये अखबार को मासिक इतना देते हैं इनके बारे में नही लिखना, फलाना अखबार मालिक का दोस्त है, सुबह 12 बजे से 10- 11, 12 बजे तक बैठे रहो, उन दिनों में मेरी हर खबर रिजेक्ट की जाती थी, बहाना होता था कि ऐसे नही लिखते, लिखना नही आता वगेरह वगेरह जबकि वही खबर बाद में हूबहू दूसरी वेबसाइट में बड़ी तारीफ के साथ लगी।

ये पाबंदियां या तो छोड़ने पर मजबूर करती हैं या एडजस्ट करने पर। छोड़ने वाले छोड़ देते हैं और एडजस्ट करने वाले आगे बढते चले जाते हैं। कई लोगों ने छोड़ने को कायरता कहा, हालात से भागना भी बोला गया। लेकिन मेरी परिभाषा में वो सिर्फ एडजस्ट करने से मना करना था।

15 अगस्त आजादी को महसूस करने के लिए आपको एडजस्ट करने की गुलामी से बाहर आना होता है ये मेरा मानना था और कमोबेश आज भी यही मानना है। आप जो करना चाहते हैं, और वो पत्रकारिता के उन मानकों पर खरा है समाज के लिए सही हैं तो आप गलत नही हैं। संस्थानों की मजबूरी मैं समझता हूँ, एम्प्लोयी की सैलरी,संस्थान के छोटे बड़े खर्च, अपनी गाड़ी,बंगला का खर्च सब निकालने के लिए वह एडजस्ट करेगा,लेकिन आप पर इतना बोझ नही है तो आप क्यों उसकी एडजस्ट करने वाली पॉलिसी को फॉलो करेंगे,उसकी अपनी आजादी और आपकी अपनी।

15 अगस्त को अक्सर याद आता है कि हां हम भी शायद आजाद हैं जो जीवन को मशीनों में जी रहे हैं, आजादी मतलब वैसे तो सिर्फ सत्ता भर तक ही रही इस देश मे सफेद ने अपने हाथों के कागजात भूरों को दे दिए और भूरों ने जनता को आजादी के नाम पर लोकतंत्र नाम का झुनझुना पकड़ा दिया जिसमें कहा तो ये गया कि अब अंग्रेजों की तरह आप पर जुल्म नही होगा, लेकिन पुलिस जुल्म के नाम पर सबसे ज्यादा बदनाम रही, आपसे कहा गया कि आप वोट देकर अपना बन्दा चुनोगे, लेकिन वोट के लिए खड़ा वो ही हुआ जो अच्छे पैसे वाला हो, जनता की भलाई के लिए कितने नेता आये पता नही, लेकिन अपनी पावर और ज्यादा बढ़ाने को जीतने पैसे वाले राजनीति में आये उसकी लिस्ट बहुत लंबी है, अंग्रेज् चले गए मगर अंग्रेज बनने की होड़ अभी खत्म नही हुई।

अंग्रेजों ने गुलामी के दिनों में जैसा माहौल बनाया था कमोबेश वैसा ही रहा। आजादी महसूस हुई तो सत्ता में मौजूद लोगों को, अपने हाथ से फैसले लेने की आजादी। अम्बेडकर ने लिखित संविधान बनाया और हम उस संविधान में निहित कानूनों के अंदर रहने को बाध्य कर दिए गए ये आजादी थी। सही मायनों में यही आजादी थी। लेखकों ने खूबसूरत परिभाषा लिखकर आजादी को महिमामन्डित जरूर किया लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों को देखेंगे तो पाएंगे कि चीजों को बड़ा चढा कर लिखा गया।

आजादी के बाद अंग्रेजों ने जिन चीजों से वंचित रखा था अगर उन पर क़ाम किया गया होता तो शायद ये कहते हम कि आजादी है। लेकिन अंग्रेज जैसा छोड़कर गए वैसा ही हमने आगे बढाया। हमको नही फर्क पड़ता कि किसान क्या कर रहे हैं? हां उन किसान से अनाज खरीदकर हमे बेचने वाले लाला की खैर खबर हम जरूर लेते हैं, अंग्रेजों के समय भी यही होता था, अंग्रेज डाक्टर गांवों तक नही पहुंचते थे अब भारतीय डाक्टर भी नही पहुंचते हमें फर्क नही पड़ता। अंग्रेज स्कूल हाई क्लास लोगों के लिए थे और बाकी राम भरोसे, अब सरकारी स्कूल राम भरोसे और कॉन्वेंट प्राइवेट हाई क्लास के लिए आज भी हैं। अंग्रेज के समय मे स्वास्थ शिक्षा और सुरक्षा के जो हाल थे अब भी वैसे ही हैं। अपडेट के नाम पर रंग चूना हुआ बस, बेसिक बदलाव नही किये गए।

15 अगस्त आज़ादी, महसूस कीजियेगा इस बार क्या आप भी वैसा ही सोचते हैं जैसा मैं।

क्या आजादी सच मे आजादी है या सिर्फ नागनाथ के बदले सांपनाथ आकर बैठे, पहले भी अंग्रेज फैसले लेते थे, अब भूरे अंग्रेज लेते हैं, पहले भी हमे नही बताते थे अंग्रेज कि कब क्यों कहाँ कैसे जनता का टेक्स वाला पैसा खर्च हो रहा है, अब भी नही बताया जाता। तब अंग्रेज बूट मारकर भगाते थे अब थोड़ा सभ्य हुए हैं, पुलिस को कहकर जीना हराम कर देते हैं।

 

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