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आओ पत्र लिखें

दिसंबर 19, 2016 ओये बांगड़ू
व्यंगकार विनोद पन्त

आज की पीढी को तो मालूम भी नहीं होगा कि एक जमाने में कम्यूनिकेशन का मुख्य साधन होता था पत्र. बच्चों को स्कूल में, घर में स्पेशली पत्र लिखने की ट्रेनिंग दी जाती थी. आज इस पत्र सीखो अभियान में हरिद्वार से विनोद पन्त आपको पत्र लिखने के आकार प्रकार और विधी बतायेंगे. इस पहले खंड में प्रेमी प्रेमिका और हसबेंड वाईफ खतों को लिखने की विधी बताई गयी है.सीखियेगा

ये हमारे जमाने में चलता था एक नाम ‘पत्र’ . तब पत्र लेखन भी एक कला हुवा करती थी. संचार का साधन पत्र ही थे. पत्र डाक के अलावा तब हाथों हाथ भेजे भी जाते थे. जिन्हें दस्ती पत्र कहा जाता था. पत्र कई प्रकार के होते थे.अगर विस्तार से लिखने लगूं तो एकता कपूर का सीरियल बन जाये. बहरहाल मैं आपको अपने जमाने की पत्र लेखन की सबसे खूबसूरत विधा यानि कि प्रेम पत्र के बारे में बताता हूं.

प्रेम पत्र, प्रेमी और प्रेमिका के बीच लिखे जाते थे. वैसे तो पति पत्नी के बीच भी प्रेम पत्र लिखे जाते थे. पर इनमें वो बात नहीं होती थी. ऐसा भी नहीं कि वो बात बिलकुल नहीं होती थी . शादी के शुरुआती वर्षों में तो प्रेमी प्रेमिका से ज्यादा धांसू होते थे ये प्रेम पत्र . धीरे धीरे मोबाईल की बैटरी की तरह इनके प्रेम की तरावट में कमी आ जाती थी .

तब ये डार्लिंग,जानू,स्वीटी,हनी,सोना जैसे आधुनिक लव साहित्य के शब्द चलन में नहीं थे. तब तो प्राणनाथ,प्राणप्यारे, प्राण दुलारे, प्राणप्यारी, प्राणदुलारी जैसे शब्द पत्र की शोभा बढाते थे. ये तो शादीशुदा प्रेमियों के शब्द थे. कुआरे प्रियतम,साजन, सजनी, प्यारी, शब्दों से सम्बोधन करते थे. वैसे शादी शुदा प्रेमी मेरे पप्पू के पापा, मेरे लालमणि के पापा, मेरी झगड़ू की मम्मी या मेरी कम्मो की मम्मी भी लिखते थे. कुछ साहित्यकार टाइप के प्रेमी मेरे सपनों की रानी या मेरी जानेमन का सम्बोधन भी करते थे. कुआंरे लोगों की सम्बोधन के बाद चांद तारे तोड़कर लाने की बातें पत्र में लिखी जाती थी और उसके बाद साथ जीने मरने की बातें होती थी .

फिर महत्वपूर्ण भाग होता था शेरो शायरी का. पता नहीं इन शायरियों का शायर कौन होता था. पर शायरियां होती ये लाजवाब . मसलन ‘टैक्टर के उपर टैक्टर, टैक्टर के उपर कन्डक्टर, मेरा प्रियतम ऐसा जैसे फिल्मी एक्टर’  या ‘चाँदनी चाँद से होती है सितारों से नहीं, प्यार आप जैसे से होता है हजारों से नहीं ‘. फिर अन्त में कहीं मुलाकात का जिक्र होता था . पत्र का उपसंहार एक रिक्वैस्ट के साथ होता था कि – पत्र को पढने के बाद फाड़ दें . किसी के हाथ पड़ गयी तो हमारा पवित्र प्यार बदनाम हो जाऐगा . मजे की बात इस गुजारिश का पालन नहीं होता था . पत्र पकड़ा ही जाता था .

यदि पालन हो गया पत्र फाड़ भी दिया तब भी कुछ छिछोरे प्यार के दुश्मन पत्र के टुकड़े जोड कर प्यार को बदनाम कर ही देते थे. शादी शुदाओ के पत्र का सम्बोधन का भाग होता था – ‘तुम्हारे बिना मन नहीं लग रहा, हर समय तुम्हारी याद में रोती रहती हूं, तुम्हारे बिना दिन में भूख नहीं लगती,  रात को नींद नहीं आती’. फिर कुछ दुनियांदारी की बाते होती थी पत्र में जैसे – ससुर जी की खांसी बढ गयी है . मुन्ना आजकल शैतान हो गया है . गाय का बछड़ा मर गया . घर आते समय मेरे लिए स्वेटर और मांजी के लिए गरम मोजे ले आना . पड़ोस की चुड़ैल कमला का आजकल धोबी के लड़के नन्दू के साथ नैनमटक्का चल रहा है . जल्दी घर आ जाना . पत्र का जवाब लौटती डाक से देना . लेख पर ध्यान न देना . खाना समय पर खा लेना . पत्र के इन्तजार में आपकी मुन्ना की मम्मी .

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