यंगिस्तान

जोहान्सबर्ग से चिट्ठी

अक्टूबर 14, 2016 ओये बांगड़ू

बनारस के विनय कुमार दक्षिण अफ्रीका से हमारे लिए एक ख़त रोज भेजते हैं अपनी अमूल्य जोहान्सबर्ग डायरी से . आज डायरी का दूसरा पन्ना आया है चिट्ठी के रूप में

पहले आपने पढ़ा कि किस तरह बनारस से मै जोहान्सबर्ग पहुंचा अब उससे आगे , होटल के रास्ते में सड़कें भी बिलकुल चमकती हुई और ट्रैफिक भी एकदम संयत, बहुत अच्छा लग रहा था देखकर| लेकिन एक आश्चर्य और भी हुआ, इतनी गाड़ियां थीं, कभी कभी रास्ता जाम भी था, लेकिन किसी ने न तो ओवरटेक करने की कोशिश की और न ही किसी ने हॉर्न ही बजाया| ऐसा लग रहा था जैसे किसी को कोई भी जल्दी नहीं है| आने वाले दिनों में ये बात पता चली कि यहाँ के लोग ट्रैफिक नियमों का पागलपन की हद तक पालन करते हैं और हॉर्न बजाना तो बहुत बड़ी असभ्यता मानी जाती है| लेकिन अगर किसी ने हॉर्न बजाया है तो इसके यहाँ बस दो मतलब हैं , या तो सामने वाला कोई गलती कर रहा है, जैसे कि वो बिना अपनी बारी के निकल रहा है, या आगे सिग्नल हरा हो गया है और आगे वाला आगे नहीं बढ़ रहा है|

ट्रैफिक नियमों के पालन का आलम तो ये है यहाँ पर कि लाल बत्ती तो शायद ही कोई पार करता हो, यहाँ तक कि रात में भी (हालाँकि रात में ये सलाह भी दी जाती है कि अगर बहुत सुनसान क्षेत्र हो तो लाल बत्ती की परवाह मत करिये, क्योंकि अपनी सुरक्षा सबसे जरुरी है)| अगर खुदा न ख़ास्ता ट्रैफिक की बत्ती ख़राब है तो हर चौराहे पर लोग बेहद अनुसाशित तरीके से एक के बाद एक निकलते हैं (चौराहे पर चारों तरफ से एक एक कार जाएगी बारी बारी से और एक चक्र पूरा होने पर फिर से वही चक्र चलेगा)| इसमें तभी गड़बड़ होती है जब कोई एशियाई मूल का व्यक्ति अपनी बारी के बिना ही निकलने का प्रयास करेगा और उस स्थिति में दूसरा व्यक्ति हॉर्न बजाकर उसको उसकी गलती का एहसास कराएगा| लोग सड़क पर एक दूसरे की भावनाओं का खूब आदर करते हैं और कोई भी व्यक्ति अगर अपनी लेन बदलने के लिए इंडिकेटर दे रहा है तो पीछे वाला अमूमन रुक कर उसे आगे जाने का मौका दे देता है| मुझे कई महीने लगे इन सब आदतों को सीखने में लेकिन अब लगता है कि बिना चिल्ल पों के सड़क पर चलना कितना सुकूनदायी है| पिछले तीन वर्षों में मैंने भी सड़क पर शायद 4  या 5  बार ही हॉर्न बजाया होगा|

खैर कुछ देर बाद होटल पहुंचे जहाँ पर भी सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम थे| बाहरी दीवारों पर ऊपर बिजली के तारों की लड़ी थी और गेट भी बंद था जिसे इंटरकॉम पर फोन करने पर खोला गया| अंदर रिसेप्शन पर एक और आश्चर्य मेरा इंतज़ार कर रहा था जिसके बारे में भी मैंने कभी सोचा नहीं था|

 

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