यंगिस्तान

A फार? किस्सा शिक्षा का

जुलाई 28, 2017 ओये बांगड़ू

विनोद उप्रेती कहते हैं कि वो लेखक नहीं हुए, लेकिन लिख एसा डालते हैं कि लेखकों को खुद को लेखक कहने में शर्म आ जाए. ये उनका पहला लेख है हमारे साथ. बांगडू एक बात को सिद्दत से नोट कर रहा है कि खुद को लेखक न मानने वाले लोग अच्छे खासे लेखकों से अच्छा लिख कर देते हैं.फिलहाल ये संस्मरण है.

लेखक विनोद उप्रेती

मैं पहाड़ के जिस छोटे से कस्बे में रहता हूँ वह अपने जैसे बाकी कस्बों से बहुत अलग नहीं है. हर क़स्बा अपने आस पास के गाँवों के लिए प्रथम पलायन स्थल होता है. दूसरा पलायन स्थल होता है जिला मुख्यालय और अधिकतर का तीसरा होता है हल्द्वानी (गढवाल के लोगों के लिए देहरादून). मतलब यह कि गांव जो हर लिहाज से असुविधा के दलदल हैं,चकोर की तरह कस्बों की ओर ताकते रहते हैं, और मौका मिलते ही इनकी ओर रड़ आते हैं. सुविधाओं के नाम पर अक्सर दो दलीलें दी जाती हैं स्वास्थ और शिक्षा. लिहाजा इन कस्बों में स्वास्थ के लिए एक अदद बंगाली डॉक्टर होता है जो दांत से लेकर आंत तक हर चीज का शर्तिया इलाज कर सकता है. कैंसर को बोरोलीन लगाकर ठीक करने में दक्ष ये डॉक्टर कभी भी अपने हुनर पर घमंड करते नहीं दिखते हैं. डॉक्टर से जिन दो ही चीजों की कामना की जाती, मीठी जुबान और कड़वी गोली, ये दोनों उनके पास मिल जातीं हैं.

दूसरी चीज बची शिक्षा- इन कस्बों में इसकी भी कोई कमी नहीं है. बेरोजगारों के अतिउत्पादन के फलस्वरूप हर कस्बे में एक आध दर्जन ऐसे “इंग्लिस इस्कूल” हैं जहाँ टू एकम टू, टू दूना फॉर, टू तियाँ सिक्स का कोरस पहाड़ों की धुन में बड़ी शिद्दत से गाया जाता है. इन स्कूलों में ‘लक्ष्मी एक अध्ययन’ रट कर “गुड सेकिन” श्रेणी में स्नातक और दूर मेरठ, गाजियाबाद या कभी- कभी भोपाल और औरंगाबाद से जुटाई गयी बीएड- बीपीएड डिग्री धारी युवक युवतियां सरकारी नौकरी की आशा में “टीचिंग” करते पाए जाते हैं. कभी-कभी ग्राम प्रधान की बीए पास बहू या स्कूल मालिक का इंटर फेल लड़का भी टीचर की भूमिका कपड़ों में तेज धार वाली इस्तरी लगाकर पूरी करते हैं.

यदा कदा कोई कर्मकांड वाले पंडिज्जी भी “बच्चे पालने ठैरे हो !!” की दलील के साथ कपाल में हल्दी का पिठ्यां (टीका) लगाये, संहिताओं और शास्त्रों द्वारा अपने लिए तय किये गए इस काम को बखूबी अंजाम देते हैं. इन स्कूलों के मालिक अक्सर रिटायर्ड टीचर, ब्लाक स्तर के नेता या खड़िया- रेता व्यवसायी होते हैं. ऐसे लोग अक्सर बड़ी भौकाली गाड़ियों में सफर करते हैं. कभी-कभी तो पानी की कमी के चलते ये लोग इन गाड़ियों में पानी ढोते हुए देखे गए हैं. बहरहाल इस वैभवशाली जीवनशैली वाले ये “सामाजिक कार्यकर्त्ता और शिक्षाविद” कहलाने वाले लोग शोषण करने में ईस्ट इण्डिया कंपनी के लिए नील की खेती करवाने वाले जमीदारों को भी पीछे छोड़ देते हैं.

सुबह साढ़े सात से शाम साढ़े तीन बजे तक कोल्हू के बैलों की तरह खटने के बाद इन टीचर्स को दो या तीन हजार रूपये में गुजारा करना पड़ता है. बाजार से ज्यादा ग्राहक बटोरने का दबाव इतना होता है कि बेचारों को “स्वीण चेपने” (डरावना सपना जिसमें देखने वाले का गला कोई घोंट रहा होता है) लगते हैं. स्कूल चलने वाले इन शिक्षाविदों कि शैक्षिक समझ इतनी जबरदस्त है कि एजुकेशन का बड़े से बड़ा जानकार भी पानी पानी होकर नाली में बह जाय. पहली कक्षा में पांच और पांचवीं में बारह विषय पढ़ा देते हैं. एनसीईआरटी और एनसीएफ जाएँ भैंस के गोबर में. ज्यादा विषय का मतलब ज्यादा किताबें, ज्यादा कापियां, ज्यादा सब कुछ इसलिए ज्यादा ‘मुनाफा’. ड्रेस के नाम पर इलास्टिक वाली टाई जो नाक पोछने के काम आती है. सोमवार मंगलवार वृहस्पतिवार के व्रत के अंदाज में नीली लाल पीली टी- शर्ट और निक्कर भी हैं. हाँ स्कूल का लोगो और नाम छपी हिमेश रेशमियाई टोपी को भी शामिल कर लीजिए तो कुल मिला कर इनकी दुकान में टोपी से लेकर जुराब तक सब उपलब्ध है. इनके बारे मे बाकी फिर कभी….
बात हो रही थी गांव से कस्बों की ओर पलायन की. मानव सभ्यता में पलायन कोई नयी बात नहीं. संभवतया महान परिवर्तन महान पलायनों की उपज रहे हैं. हर पलायन की कोई भौतिक वजह होती है यथा आर्यों ने चारागाहों की तलाश में यूरेशिया के मैदानों से खैबर के पार तक पलायन किया था और गंगा की घाटी को आबाद किया. यहाँ भी पलायन की बड़ी ठोस वजह है और उस वजह को “बाल सुधार” नाम दिया जा सकता है. गांव की अर्थव्यवस्था में नौकरी के महत्व के बढ़ने के साथ खेती में लोगों की रूचि लगभग खत्म हो गयी है. ऐसे में गांव में रहने का कोई आकर्षण बचा नहीं. सेना में या दिल्ली बम्बई में छोटी प्राइवेट नौकरी करने वालों के परिवार अक्सर उनके साथ नहीं रहते. प्रैक्टिकल वजहों से उन्हें अपने बीबी बच्चे गांव में बूढ़े माता पिता के साथ छोड़ने पड़ते हैं. गांव में स्कूल के नाम पर सरकारी प्रायमरी है और स्वास्थ के नाम पर घणेलिया, या जगरिया (झाड़ फूंक वाले). वक्त के साथ दोनों ही अपनी साख गँवा रहे हैं. तो ऐसे में उस नौकरीशुदा युवक की ग्रामवासिनी पत्नी के मन में अपने बच्चों के भविष्य की चिंता होना लाजमी है. इसके अलावा कई बार दादा -दादी अपने पोतों स्नेह की चाशनी में को कुछ ज्यादा ही डुबा देते हैं जिससे उनके “सर में चढ़ने” की प्रायिकता बहुत बढ़ जाती है.

जब बच्चों के बिगड़ने की भयंकर संभावनाएं हों तो उनको सुधारना हर माता पिता का नैसर्गिक कर्तव्य है. इसी भावना से प्रेरित ग्रामवासिनी अपने परदेस वासी पति को चिट्ठी लिखती है (माफ कीजिये अब चिट्ठी नहीं फोन करती है) कि हे स्वामी समय आ गया है कि बच्चों को सुधारने हेतु निकट के नगर में प्रवास किया जाय. इस प्रक्रिया में आपकी इस दासी को गाय के गोबर और बकरी की लेंडी से कुछ मुक्ति मिलेगी और आप जब अवकाश में घर पधारेंगे तो आपके द्वारा लाए गए फेयर लबली किरीम का भी कुछ उपयोग हो पायेगा…. रही बात सास ससुर की तो वे गाँव में गाय भैंस पाल लेंगे ताकि उनके जिगर के टुकड़े दूध दही गटकते हुए आराम से सुधरें. वैसे भी ससुर जी दिन भर बोर होते हैं, इसलिए उनसे कह देंगे की कुछ बकरियां पाल लो, चराते रहना “हपूर बजाणी धुरा…
यह प्रक्रिया सदा ही लागू हो जरूरी नहीं, बहुत बार गांव की विपन्नता लोगों को वहां से भागने पर मजबूर करती है पर इससे पलायन के कारण पर कोई फर्क नहीं पड़ता. पलायन का मुख्य कारण और तर्क होता है “बच्चे सुधारने हैं” जैसे कि बच्चे नहीं बजाज स्कूटर हों. खैर नब्बे के दशक में आर्थिक उदारवाद की आंधी तेजी से फैली उसका असर दूर दराज के गांवों में भी दिखने लगा. सहस्राब्दी जाते- जाते नई सोच हर दिमाग में घुसपैठ करने में सफल रही और अपने बच्चों को हैसियतदार बनाने का सपना हर माँ बाप देखने लगे. धीरे- धीरे कस्बे उन प्रवासियों से भर गए जो बच्चों को सुधारने के लिए यहाँ आ रहे थे.
शिक्षा का माध्यम क्या हो इस पर बड़े बड़े विद्वान बड़ी- बड़ी बातें कहते देखे जा सकते हैं इस पर मेरी तुच्छ बुद्धि का कुछ कहना ऐसा ही है जैसे कच्छे में इस्तरी करना. बात जहाँ से शुरू हुई वहां तक पहुचाई जाय.
स्थान- एक पहाड़ी क़स्बा, कोइंसीडेंटली तहसील मुख्यालय.
समय- जाड़ों की एक धूप भरी दोपहर, दर्शक दीर्घा में होटल का चहा सुड़कते हम लोग.
पात्र- बाल सुधार आंदोलन की मुखर हिमायती एक माता और सुधारा जा रहा एक बच्चा.
एक प्रवासी ग्रामवासिनी माता अपने बेटे को धाम में बैठाए कुछ पढ़ा रही है और खुद कुछ बुन भी रही है. ऊन का गोला बच्चे के पैर से सटा हुआ है और उसका ध्यान बार- बार वहां जा रहा है. ध्यान भटकने पर वह बच्चे की पीठ में धौल भी जमा रही है. अपने दांये हाथ में पेन्सिल थामे बच्चा कुछ हैरान कुछ परेशान है. ठण्ड का असर बच्चे पर साफ़ दिख रहा है. उसके गाल फटे हुए हैं और नाक में रह- रह कर एक बुलबुला बन रहा है जिसे वह अपनी बाँई आस्तीन से पोंछ रहा है. जिससे उसकी आस्तीन पहाड़ी नदी की मछली जैसी चमकने लगी है.
माँ देखती है कि पड़ोस की कुछ माताएं भी अपनी-अपनी छतों मे आ गयी हैं और तेजी से बनियान बुन रही हैं. जिस तरह छब्बीस जनवरी को देश पूरी दुनिया के सामने शक्ति प्रदर्शन करता है उसी तरह यह माँ भी अपने बेटे से जोर से पूछती है- “ए माने कि हुँछ ?” (A माने क्या होता है). बच्चा हडबड़ाता है और जवाब नहीं दे पाता. वह सवाल दोहराती है , ए माने कि हुंछ ? बच्चा शायद सवाल समझ नहीं पाया. बच्चे की चुप्पी माँ को परेशान करती है. आस पास की बाकी माताएं उसे ऐसी हिकारत देखती हैं जैसे कार में बैठे लोग बस का इन्तजार कर रहे मुसाफिरों को देखते हैं. जब तीसरी बार पूछने पर भी बच्चे ने कुछ नही बताया तो माता बच्चे की पीठ पर जोरदार धौल जमाते हुए बोली “न कै सकनैई सेब… कपड़क्यूनकी दाना क दान चाईनन” (नहीं बोल सकता क्या सेव… चबाने के लिए तो दाने के दाने चाहिए तुझे)
दर्शक दीर्घा को प्रवासिनी माता का सवाल अब समझ में आया कि वह शायद वह A फॉर Apple की उम्मीद लगा रही थी. बच्चा चिढ़ कर ऊन के गोले को लात मारता है और उसकी नाक से बड़ा सा बुलबुला निकल कर फूट जाता है. जाड़े की धूप में उसकी बायीं आस्तीन फिर से मछली जैसी चमकती है. चाय समाप्त होती है और पर्दा गिरता है.

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