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सरकारी नीतियों का हादसा- धूमाकोट

जुलाई 5, 2018 ओये बांगड़ू

बीते रविवार उत्तराखंड के पौड़ी के नैनीकांडा विकासखड में धुमाकोट के पास एक बस दुर्घटना घटी. जिसमें 48 यात्रियों की मौत हो चुकी है. उत्तराखंड में सड़क दुर्घटना अब एक आम-बात हो चुकी है. इतनी आम की जब तक किसी की तत्काल मौत ना हो तब तक मीडिया तक इसे छोटी खबर मान कर ही चलता है. ओए बांगडू आज आपको धूमाकोट में हुई घटना की पूरी पड़ताल दे रहा है.

घटना बीते 1 जुलाई रविवार की है, एक प्राइवेट 28 सीट वाली बस 60 यात्रियों को लेकर रामनगर को निकलती है. स्कूलो में ग्रीष्मावकाश समाप्त होने कारण इस दिन यात्रियों की अचानक बड़ी भीड़ थी. जिसके विषय में जिला प्रशासन को पूर्व जानकारी होनी चाहिये थी. जल्दबाजी यात्रियों की भी एक गलती है.

पिपली-भौन मोटर मार्ग पर ग्वीन गांव के पास बस सडक पर एक गड्डा आता है जिससे बचने के प्रयास में वाहन अनियंत्रित हो जाता है और बस दुर्घटना घटित हो जाती है. यहां यह बताना जरुरी है कि प्रत्येक वर्ष उत्तराखंड सरकार द्वारा मानसून के मौसम में सड़क के गढ्ढे भरने हेतु अतिरिक्त धन आवंटित किया जाता है जो कि इस वर्ष नहीं किया गया है.    

सडक हादसे के बाद जो बचाव दल घटना स्थल पर खाली हाथ पहुचता है उसके पास न स्ट्रेचर था, न सेटेलाइट फोन था ही आयरन कटर. दुख की बात यह है कि राहत दल शवों हेतु कवर बैग तक अपने साथ नहीं लाई. मृत व्यक्तियों को एक कफन तक नसीब नहीं हुआ. लाल पीले फटे कपड़ों में शवों को लपेटा गया.

इस सब के बीच घायलों की सहायता के लिये सरकार को सहस्त्रधारा हैलीपैड पर कम्पनियों को उड़ान भरने के मनाने में 3.30 घंटे लग गये. किसी भी सड़क दुर्घटना में पहला घंटा सबसे महत्तवपूर्ण माना जाता है यहां सरकार ने 3.30 घंटे खा लिये. ध्यान देने योग्य बात यह है कि उत्तराखंड विमान प्राधिकरण मंत्रालय स्वयं मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के पास है. सरकार ने इस घटना की जाँच की बात की है मतलब त्रिवेंद्र ही त्रिवेंद्र की जांच करेंगे? वर्तमान में केंद्र सरकार ने हेरिटेज एविएशन कंपनी से जवाब तलब किया है.

इस घटना के बाद सरकार ने दोषियों के खिलाफ कारवाई के नाम पर एआरटीओ और धूमाकोट के थानेदार को सस्पेंड कर दिया. लेकिन जो जिलाधिकारी दस घंटे की देरी से पहुँचा जो एस-एस.पी 3.30 बजे पहुँचा वो कारवाई से बच गये. इस बीच सरकार ने मृतक की कीमत दो लाख व घायल की कीमत पचास हजार आंकी.

सवाल है कि इस पूरी दुर्घटना के असल दोषी सरकार की नितिगत कमियां हैं. मुख्यमंत्री जब अपने जिम्मे का विभाग नहीं संभाल पा रहे तो अन्य मंत्रियों से क्या उम्मीद की जाये? नैतिकता के आधार पर जहां मुख्यमंत्री ने स्वयं इस्तीफा देना चाहिये था वहां वे छोटे अधिकारियों को बलि का बकरा बनाकर मामले में लिपा-पोती ही कर रहे हैं.

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