गंभीर अड्डा

इतना भोला समाज है

सितंबर 22, 2018 ओये बांगड़ू

कभी कभी असली बांगडू भी लिख देते हैं कुछ

हमारे समाज के लोग बहुत भोले हैं, खासकर कथित उच्च वर्ग। व्हाट्सअप फेसबुक पर लगातार दलितों से जुड़े मेसेज आ रहे हैं, जिनका सार ये है कि दलित वर्ग किसी भी बात पर आप पर एससी एसटी एक्ट लगा देगा। पहले इन दोनों को समझना जरूरी है क्या एससी है और क्या एसटी।
एससी वो है जिसे लेकर आप लोग आज भी भद्दे शब्द इस्तेमाल करते हैं, हो सकता है आप उनमे नही होगे लेकिन आप सिर्फ एक् हैं देश मे 134 करोड़ लोग रहते हैं।
आपने अपना गांव मोहल्ला जिला देखा होगा जो बिल्कुल अच्छा है इस मामले में और आप उसके आधार पर पूरे देश का आंकलन कर देते हैं।
ओये चमार की तरह हरकत मत कर, साला भंगी, अबे नहाता नही है डूम, ये कुछ वो वाक्य हैं जो चाहे अनचाहे आपकी जुबान पर आ जाते हैं, किसी के लिए भी, आप भी जानते हैं कि ये सिर्फ जातियों का नाम नही है समय के साथ साथ एक् सामाजिक गाली है जो कथित उच्च वर्ग बहुदा इस्तेमाल करता है सामने वाले को नीचा दिखाने के लिए। आपको लगता है आपने गलत कहा ही नही। सामाजिक रूप से देखें तो संविधान ने इसी सोच को खत्म करने के लिए और सामाजिक बराबरी लाने के लिए आरक्षण का रास्ता चुना।
आप सामाजिक बराबरी पर ध्यान नही देते, आप ध्यान देते हैं आर्थिक कमजोरी या मजबूती पर। कोई भी दलित यूं ही किसी पर आरोप नही लगाता। एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिपोर्ट ब्यूरो) जो देश भर में दर्ज हुए मामलों की जांच करता है उसका भी मानना है कि अधिकतर मामले सही होते हैं। आप दबंग छुटभय्ये नेताओं के मुंह से अक्सर जातिसूचक शब्द सुनते होंगे। अबे शुक्ला, ओये दूबे, ओये बामन, अबे ठाकुर कहना गाली नही है सामाजिक स्तर पर लेकिन वहीं अब चमार, भंगी साला, डूमडा वगेरह वगेरह जैसे शब्द सामाजिक स्तर पर गाली के लिए ही प्रयुक्त होते हैं। ये जाती भले ही हैं लेकिन आपके पुरखों ने इन्हें इस तरह से इस्तेमाल किया कि ये गाली बनकर रह गए। जैसे चूतिया का शाब्दिक अर्थ मूर्ख होता है मगर वो गाली के रूप में ही प्रयोग किया जाता है।
आपको लगता है कि दलित यूं ही आरोप लगा देगा, शहरों से निकलकर गांवों का रुख कीजिये अधिकतर गांवों में आज भी वह सामाजिक बराबरी के हकदार तक नही हुए हैं, साथ मे बैठना तो दूर खड़े तक नही होने दिया जाता। बाकी दलित की बरात घोड़े में नही निकलने दी जैसी खबर आपने पढी ही होंगी। वो विरोध कर भी दे, तो ऐसा सामाजिक बहिष्कार होता है कि पलट कर वापस विरोध करने की हिम्मत नही होती उसकी।ये आपकी सामाजिक ताकत और उसकी कमजोरी है और इसी को बराबरी पर लाने के लिए आरक्षण लाया गया। आप इस बात को रोते हैं कि कट ऑफ में उनके लिए 29 नम्बर और आपके लिए 70 क्यों। आप ये नही देखते कि आपके समाज मे आप ही के साथ पढ़ने वाला क्यों आखिर अच्छे नम्बर नही ला पाया, आप कह देते हैं कि दिमाग कम होता है इन सालों में, लेकिन वास्तविकता ये है कि इतने सालों की घुटन आज भी जिंदा है।
अब आते हैं एसटी पर यानी शेड्यूल ट्राइब जनजाति। आज भी 60 प्रतिशत से ज्यादा जनजातियां जंगलों में ही निवास कर रही हैं। उन्हें अपना परिवेश ही प्यारा है वो आपके सो कॉल्ड मुख्य धारा में नही आना चाहते। झारखंड का निर्माण भले ही आदिवासीयों के नाम पर करवा दिया मगर, झारखंड में भी सिर्फ नेताओं का विकास हुआ है। आदिवासी वहीं हैं जहां थे।
आप बहुत सारे चुटकुले जोक्स मेम्स बनाकर कथित उच्च वर्ग को भड़काने का काम तो बहुत खूबसूरती से कर रहे हैं लेकिन आप खुद को सुधारने की थोड़ी सी भी कोशिश नही कर रहे।
आपका राष्ट्रपति आर्थिक रूप से मजबूत हुआ, देश का पहला नागरिक बना, मगर आज भी मंदिरों में उसके वही हाल हैं जो बाकी लोगों के हैं।
सामाजिक पिछड़ापन आप नही सुधारना चाहते । आज की पीढ़ी कहती है कि हमने तो कभी नही किया भेदभाव, हम उनके घर खाते हैं, उनके घर रहते हैं, उनसे हमारी दोस्ती है । बहुत अच्छी बात है लेकिन ये उनसे और उनके भी हटाना है वो भी आप ही के जैसे हैं । और वही सामाजिक बराबरी है।
सामाजिक बराबरी आने तक कोशिश जारी रहनी चाहिए।

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